कम पानी में बेहतर उत्पादन और फसल तैयार होने से पहले ही बाजार का भरोसा—गुजरात के किसान खेती में इसी मॉडल पर काम कर रहे हैं। गांधीनगर और बनासकांठा के किसान ड्रिप, स्प्रिंकलर और रेज्ड बेड जैसी तकनीकों के साथ कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग को जोड़कर मूंगफली और प्रोसेसिंग-ग्रेड आलू की खेती कर रहे हैं। इससे एक तरफ सिंचाई और खेती की लागत को बेहतर तरीके से संभालने में मदद मिल रही है, तो दूसरी तरफ फसल बेचने के लिए बाजार की अनिश्चितता भी कम हो रही है।

प्रोसेसिंग-ग्रेड आलू से कमाई
गुजरात में किसान चिप्स और फ्रेंच फ्राइज बनाने के लिए इस्तेमाल होने वाले प्रोसेसिंग-ग्रेड आलू की कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग कर रहे हैं। इस व्यवस्था में कंपनियां किसानों से तय शर्तों पर फसल खरीदती हैं, जिससे किसान को फसल तैयार होने के बाद बाजार तलाशने की चिंता कम रहती है।
इस खेती में LR किस्म के बीज का इस्तेमाल किया जाता है। बीज की कीमत करीब ₹1,300-1,400 प्रति 50 किलो बैग बताई गई है और एक बीघा में करीब 17-18 बैग बीज की जरूरत पड़ती है। कुछ मामलों में किसानों को करीब ₹250 प्रति 20 किलो, यानी ₹12.5 प्रति किलो का खरीद भाव मिलता है।

ड्रिप और स्प्रिंकलर से सिंचाई का स्मार्ट इस्तेमाल
किसान सिंचाई के लिए ड्रिप और स्प्रिंकलर जैसी माइक्रो-इरिगेशन तकनीकों का इस्तेमाल कर रहे हैं। इससे फसल को जरूरत के मुताबिक पानी देना आसान होता है और पानी की बर्बादी कम की जा सकती है।
ड्रिप के जरिए खाद देने यानी फर्टिगेशन से उर्वरकों को भी सीधे फसल की जड़ों तक पहुंचाया जाता है। इससे पानी और खाद दोनों के बेहतर इस्तेमाल में मदद मिलती है।

रेज्ड बेड पर मूंगफली की खेती
मूंगफली की खेती में किसान रेज्ड बेड तकनीक अपना रहे हैं। इसमें करीब 60 इंच चौड़े बेड पर चार लाइनें लगाई जाती हैं और लाइनों के बीच लगभग 12 इंच की दूरी रखी जाती है।
ड्रिप सिंचाई के साथ इस तकनीक से मूंगफली की पैदावार में करीब 10 मन यानी 200 किलो प्रति बीघा तक बढ़ोतरी का दावा किया गया है।

बारिश का इंतजार कम, बुवाई समय पर
माइक्रो-इरिगेशन की सुविधा होने से किसान बारिश का इंतजार किए बिना समय से पहले बुवाई कर सकते हैं। इससे फसल करीब एक महीने पहले तैयार होने की संभावना रहती है। इसका फायदा यह है कि किसान मानसून की देरी से होने वाली परेशानी से बच सकते हैं और बाजार में जल्दी फसल पहुंचा सकते हैं।

गुजरात में बढ़ी प्रोसेसिंग आलू की खेती
गुजरात में प्रोसेसिंग-ग्रेड आलू की खेती का रकबा पिछले दो दशकों में तेजी से बढ़ा है। करीब 20 साल पहले इसकी खेती लगभग 4,000 हेक्टेयर में होती थी और उत्पादन एक लाख टन से कम था। अब इसका क्षेत्र बढ़कर करीब 37,000 हेक्टेयर और उत्पादन लगभग 11.5 लाख टन तक पहुंच गया है।

खेती में तकनीक और बाजार का मेल
गुजरात के किसानों का यह मॉडल बताता है कि खेती में सिर्फ उत्पादन बढ़ाना ही जरूरी नहीं है। सही फसल का चुनाव, पानी की बचत करने वाली तकनीक और बाजार से पहले से जुड़ाव भी कमाई बढ़ाने में अहम भूमिका निभाते हैं।
कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग किसानों को बाजार से जोड़ती है, जबकि ड्रिप, स्प्रिंकलर और रेज्ड बेड जैसी तकनीकें पानी और संसाधनों के बेहतर इस्तेमाल में मदद करती हैं। यही वजह है कि गुजरात का यह मॉडल किसानों के लिए तकनीक और बाजार को साथ लेकर चलने वाली खेती की मिसाल बन रहा है।
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