पन्ना/धार/इंदौर। भले ही वैश्विक बाज़ार में जैविक कपास की माँग बढ़ रही है, लेकिन इसे उगाने से लेकर बेचने तक की राह में इतने काँटे हैं कि इस फ़सल के लिए मशहूर मध्य प्रदेश में किसान इस से मुँह मोड़ रहे हैं।
मध्य प्रदेश सरकार के अनुसार विश्व का 24% और देश का 40% जैविक कपास इस राज्य में उगता है। कपास की खेती और उस से संबंधित उद्योगों को बढ़ावा देने के लिए केंद्र सरकार ₹1,660 करोड़ की लागत से राज्य में एक टेक्सटाइल पार्क का निर्माण कर रही है। सरकार का कहना है कि धार जिले में 2,177 एकड़ में बन रहे इस पी.एम. मित्रा पार्क में कपास से धागा व धागे से कपड़ा तो बनाया ही जाएगा, साथ ही साथ उस कपड़े की बिक्री और निर्यात का भी संचालन होगा।
दूसरी तरफ़ राज्य में जैविक कपास का उत्पादन पिछले कुछ वर्षों से लगातार गिर रहा है। वर्ष 2022-23 में उत्पादन 8.78 लाख मेट्रिक टन था; 2023-24 में यह घट कर 6.3 लाख मेट्रिक टन हुआ; और 2024-25 में 5.6 लाख मेट्रिक टन।
किसानों, व्यापारियों, और विशेषज्ञों ने मोंगाबे हिंदी को इस गिरते उत्पादन के कई कारण बताए। जैविक कपास की प्रति एकड़ उपज कम हो रही है और दाम भी ऊँचे नहीं, बल्कि सामान्य कपास जितने ही मिल रहे हैं। ना फसल के जैविक होने का प्रमाण पत्र सरलता से मिलता है और ना ही बीज। रोग-प्रतिरोधक क्षमता कम हो रही है और फलस्वरूप कीटनाशक पर खर्च भी बढ़ रहा है।
इन व्यावहारिक और आर्थिक समस्याओं से हताश हो कर किसान जैविक कपास की खेती छोड़ रहे हैं। ऐसे ही एक किसान, धार जिले के अजंदा गाँव के प्रवीण पाटीदार, ने मोंगाबे हिंदी को बताया कि 2023 में उनके 17 एकड़ खेत में बस जैविक कपास लगी थी, लेकिन अब वह पूरी तरह से रासायनिक खेती पर लौट आये हैं।

“जैविक कपास के किसानों पर दोहरी मार पड़ने लगी—जब रोगों का प्रकोप बढ़ा तो पूरी की पूरी फसल बर्बाद होने लगी और बचाने में ज़्यादा पैसे खर्च करने पड़े। बी.टी. कपास की तुलना में पैदावार तो घटी ही थी, लागत भी बढ़ गई। इसने किसानों का मोह भंग कर दिया,” उन्होंने कहा।
पाटीदार अब 7 एकड़ में कपास लगाते हैं और बाकी ज़मीन पर मक्का और सब्ज़ियाँ उगाते हैं। वह कहते हैं कि वर्ष 2016 में जब उन्होंने पहली बार जैविक कपास लगाया तो पैदावार अच्छी थी, लेकिन यह धीरे-धीरे कम होने लगी। “पत्ते पीले पड़ने लगे और बीमारी बढ़ने लगी। बचाव के सभी जैविक फ़ॉर्मूले भी फ़ेल हो गये, और अंत में मैंने 2024 में पूरी तरह जैविक खेती से हटने का फैसला लिया।”
“भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के पूर्व निदेशक और कपास पर रिसर्च में शामिल रहे मुक्ति साधन बासु ने मोंगाबे हिंदी को बताया कि भारत में औसतन प्रतिवर्ष लगभग 650 टन उच्च गुणवत्ता वाले देसी कपास के बीज की आवश्यकता होती है, लेकिन किसानों को 30–40% बीज ही मिल पा रहे हैं। उन्होंने कहा कि वर्षा-आधारित खेती के लिए उपयुक्त देसी आर्बोरियम और हर्बेसियम किस्मों की भारी कमी है।

अजंदा गाँव के ही कृष्णा पाटीदार पिछले साल तक 6 एकड़ में जैविक कपास लगाते थे लेकिन अब बस एक एकड़ में कपास लगाते हैं, इसमें भी आधी फसल जैविक और आधी बी.टी. कपास है।
उन्होंने बताया कि जैविक कीटनाशक शुरू में ज़रूर प्रभावशाली था पर अब लगभग बेअसर हो गया है, जिसकी वजह से उन्हें महँगी रासायनिक दवाओं का छिड़काव करना ही पड़ रहा है। “कपास की खेती बिना रासायनिक दवाओं के संभव ही नहीं है,” वह कहते हैं।
किसानों के लिए जैविक खेती का एक आकर्षण था रासायनिक कीटनाशक एवं खाद से मुक्ति, जिससे खेती का खर्चा कम हो। रासायनिक तत्वों के निरंतर प्रयोग से उनके स्वास्थ्य पर भी दुष्प्रभाव पड़ता था। जैविक खेती अपनाने के बावजूद अब यह महँगे और हानिकारक पदार्थ किसानों के लिए पुनः अपरिहार्य बन चुके हैं।
कैसे बोएँ बीज बिना?
अजंदा के इन दोनों किसानों ने बताया कि जैविक कपास के बीज ही बड़ी मुश्किल से मिलते हैं। कृष्णा पाटीदार ने कहा कि बीजों की अनुपलब्धता भी एक कारण है जिसके चलते उन्हें जैविक कपास की खेती कम करनी पड़ी। इन्होंने और प्रवीण पाटीदार ने जैविक के नाम पर मिलने वाले बीजों की गुणवत्ता पर भी सवाल उठाया।
“सरकारी बीज केंद्रों पर हमेशा कमी बनी रहती है। यहां तक की बी.टी. कपास के लिए भी सीज़न में कई बार लंबी लाइन में लगना पड़ता है, फिर जैविक कपास के बीज के बारे में सोचकर देखिए। बाहर जैविक कपास के नाम पर बहुत से बीज मिलते हैं, ज़्यादातर किसान उन्हें ही खरीद लेते हैं लेकिन उनकी विश्वसनीयता नहीं है,” प्रवीण पाटीदार ने कहा।
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के पूर्व निदेशक और कपास पर रिसर्च में शामिल रहे मुक्ति साधन बासु ने मोंगाबे हिंदी को बताया कि भारत में औसतन प्रतिवर्ष लगभग 650 टन उच्च गुणवत्ता वाले देसी कपास के बीज की आवश्यकता होती है, लेकिन किसानों को 30–40% बीज ही मिल पा रहे हैं। उन्होंने कहा कि वर्षा-आधारित खेती के लिए उपयुक्त देसी आर्बोरियम और हर्बेसियम किस्मों की भारी कमी है।

साथ ही, उन्होंने बताया कि निजी बीज कंपनियाँ देसी बीज में ज़्यादा रुचि नहीं दिखाती और सरकार के राज्य बीज निगम और राष्ट्रीय स्तर की एजेंसियाँ भी गैर-बी.टी. किस्मों पर बहुत काम नहीं कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि यह एक उल्लेखनीय विडंबना है कि जैविक कपास की खेती के लिए प्रसिद्ध मध्य प्रदेश में भी किसान प्रमाणित, उच्च शुद्धता वाले गैर-बी.टी. कपास के बीजों की भारी कमी का सामना कर रहे हैं।
कागज़ी कठिनाइयाँ
इन सब समस्याओं से जूझ कर जो किसान जैविक कपास ऊगाते हैं, उन्हें फिर फसल के जैविक होने का प्रमाण पत्र प्राप्त करने के लिए नए सिरे से मशक्कत करनी पड़ती है। जैविक उत्पादों को प्रमाणित करने के लिए केंद्र सरकार ने दो मुख्य प्रणालियाँ बनायी हैं। पहली है नैशनल प्रोग्राम फ़ॉर ऑर्गेनिक प्रोडक्शन, जिसका काम है निर्यात के लिए जैविक उत्पादों को प्रमाणित करना। इसमें आम तौर पर थर्ड-पार्टी सर्टिफिकेशन होता है, यानी किसान और सर्टिफिकेशन देने वाली संस्था के बीच एक स्वतंत्र प्रमाणन एजेंसी होती है।
छोटे किसानों को थर्ड-पार्टी सर्टिफिकेशन के झंझट और खर्चे से बचाने के लिए सरकार ने एक और विकल्प दिया है—पार्टीसिपेटरी गारंटी सिस्टम। इसका मुख्य काम घरेलू बाज़ार के जैविक उत्पादों का प्रमाणन करना है। इसके अंतर्गत किसान, किसानों के समूह, और स्थानीय स्तर पर जुड़े लोग एक-दूसरे की जैविक खेती की प्रक्रिया को सत्यापित करते हैं।
इस व्यवस्था में भी व्यावहारिक दिक्कतें हैं। मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से लगभग 350 किलोमीटर दूर बड़वानी में बसे किसान सुरेश मुकाती इसके गवाह हैं। उन्होंने 2021 में छः किसानों के साथ मिलकर एक समूह बनाया और जैविक कपास की खेती शुरू की, पर 2023 में नुकसान के चलते तीन किसानों ने समूह छोड़ दिया और वापस बी.टी. कपास की तरफ चले गये।
“उनकी स्थिति देखकर दूसरे किसान तैयार ही नहीं हुए। हमने बहुत कोशिश की। ऐसे में समूह चलाना मुश्किल हो गया तो उसे बँद करने का फैसला लिया। इसके बाद अकेले सर्टिफिकेट लेने की बड़ी कोशिश की, लेकिन ले नहीं पाया। नियम और शर्तें इतनी ज्यादा थीं और महँगी भी। ऐसे में हार माननी पड़ी,” उन्होंने मोंगाबे हिंदी को बताया।
मुकाती ने बताया कि जैविक कृषि अपनाने वाले किसान शुरू में कुछ वर्षों तक प्रमाणन के लिए अमान्य होते हैं क्योंकि उन्हें परिवर्तनशील किसानों की श्रेणी में रखा जाता है। इस दौरान उनको उपज का सामान्य भाव मिलता है। ऐसे में किसानों पर दोहरी मार पड़ती है—उत्पादन कम और आमदनी भी।

“शुरुआती वर्षों के लिए सरकार को किसानों को नुकसान से बचाने की पहल करनी होगी। किसानों को वैसे भी नुकसान ही होता है, प्रयोग करके वह और नुकसान क्यों उठायेगा,” वह पूछते हैं।
उन्होंने कहा कि प्रमाण पत्र मिल जाने पर भी गारंटी नहीं है कि किसान अपनी फसल जैविक के तौर पर बेच पाएगा, क्योंकि इसके लिए उसे एक ट्रांज़ैक्शन सर्टिफिकेट और राष्ट्रीय जैविक एवं प्राकृतिक खेती केंद्र विभाग से अप्रूवल भी लेना पड़ता है और इन सब में बहुत समय लग जाता है।
रेटिंग एजेंसी क्रिसिल की एक रिपोर्ट बताती है कि भारत में लगभग 38% जैविक उत्पाद सामान्य उत्पाद के रूप में बिकते हैं। ऐसे में उन्हें भाव भी सामान्य उत्पादों के ही मिलते हैं।
मुकाती ने 2025 में जैविक कपास की खेती बंद कर दी और वापस बी.टी. कपास लगाने लगे। “एक बात यह भी थी कि जैविक कपास का भाव ऐसा नहीं था कि बहुत ज़्यादा मिल रहा था। कई बार खुद व्यापारियों से मिला, कपास दिखाया, तो उन्होंने कहा कि भाव सामान्य कपास का ही मिलेगा। ऐसे में छोड़ने में बहुत पछतावा नहीं हुआ।”
इंदौर के 56-वर्षीय व्यापारी अमीन पटेल निमाड़ के जिलों से जैविक कपास खरीदते हैं। उन्होंने पुष्टि की कि किसानों को फसल का सही दाम नहीं मिल पाता है। उन्होंने कहा कि किसान ये साबित नहीं कर पाते हैं कि उनका कपास जैविक है।
“बाहर से माँग है, लेकिन जैविक कपास की आवक लगातार कम हो रही है।”
साथ ही पटेल ने बताया कि जलवायु परिवर्तन की वजह से जैविक कपास भी रोगों से अछूता नहीं रहा, और इन बीमारियों के चलते रेशों का रंग फीका पड़ जाता है, जिस कारण फसल का उचित दाम नहीं मिलता।
उन्होंने कहा कि एक दिक्कत यह भी है कि जैविक उत्पादों के लिए अलग से कोई मंडी नहीं है।
बेचें तो कहाँ?
मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव ने जून 2025 में घोषणा की थी कि राज्य की मंडियों में जैविक व प्राकृतिक उत्पादों की बिक्री के लिए अलग व्यवस्था की जाएगी। हालाँकि, इस संवाददाता ने पाया कि राज्य की अधिकतर मंडियों में अभी तक इसकी शुरुआत नहीं हुई है।
राज्य कृषि विपणन (मंडी) बोर्ड के इंदौर संभाग के आंचलिक उप-संचालक प्रवीण वर्मा इस आकलन से असहमत हैं। उन्होंने बताया मंडियों में जैविक उत्पादों के लिए बाकायदा अलग से टिन शेड लगाए गए हैं। हालाँकि, उन्होंने कहा कि जैविक कपास उगाने वाले किसान मंडी आते ही नहीं हैं, वह स्वतः ही व्यापारियों से संपर्क करके मंडी के बाहर अपनी उपज बेच देते हैं।

पन्ना जिले के किसान गणेश कुमार ने पिछले सीज़न में प्रयोग के तौर पर पहली बार लगभग आधे एकड़ में जैविक कपास की खेती की थी। वे रकबा बढ़ाना चाहते हैं लेकिन आशंकित हैं।
“उत्पादन तो अच्छा हुआ था, लेकिन भाव नहीं मिला। मंडी में कोई व्यवस्था नहीं थी। अगर अच्छा भाव मिले और सरकार थोड़े नियमों में ढील दे तो जैविक कपास की तरफ किसानों का रुख बढ़ सकता है।”
भारत में पहले पारंपरिक रूप से कपास के देसी बीज ही बोए जाते थे, लेकिन फिर फसल में अमेरिकी बॉलवर्म कीट लगने लगे। इन से बचाव के लिए 2002 में भारत में बी.टी. कॉटन लाया गया। शुरू के वर्षों में इसका असर दिखा, पैदावार बढ़ी और रोग भी कम हुए। पर अगले डेढ़ दशक में कीटों में रोग-प्रतिरोधक क्षमता विकसित हुई और बी.टी. कॉटन की फसलें पिंक बॉलवर्म का शिकार होने लगीं। पिंक बॉलवर्म कपास की पूरी फसल को बर्बाद कर सकता है। 2016–17 के बाद पिंक बॉलवर्म के कारण मध्य प्रदेश, कर्नाटका, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना जैसे राज्यों में कपास का उत्पादन 30% तक कम होने लगा।
ऐसे में सरकार, कृषि विश्वविद्यालयों, व गैर-सरकारी संस्थाओं ने गैर-बी.टी. कपास की ऊँची पैदावार वाली किस्में विकसित की जिनमें स्थानीय कीटों व रोगों से निपटने की क्षमता तो थी ही, साथ ही उन्हें खाद की आवश्यकता भी कम थी। कीटों से निपटने के दूसरे गुर भी किसानों को सिखाए गए, और जैविक खेती को एक कम खर्च मगर ऊँची पैदावार वाली तकनीक के रूप में पेश किया गया।
कपास उत्पादकता मिशन का लक्ष्य 2031 तक देश में कपास के उत्पादन को 84.7 लाख मेट्रिक टन तक बढ़ाने का है लेकिन देश में एवं कपास के गढ़ मध्य प्रदेश में इसका उत्पादन (जैविक व बी.टी. दोनों का) पिछले कुछ वर्षों से निरंतर गिरता ही जा रहा है।
यह स्टोरी न्यूज़ पोटली और मोंगाबे-हिंदी की साझेदारी के तहत सह-प्रकाशित की गई है। इस साझेदारी का उद्देश्य पर्यावरण, कृषि और ग्रामीण समुदायों से जुड़े कम रिपोर्ट किए गए मुद्दों को सामने लाना है जिससे उन विषयों पर सरकार, नीति निर्माताओं, शोधकर्ताओं और विशेषज्ञों, और आम जनता के बीच चर्चा हो सके।





