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ब‍िजली का दावा और जमीनी हकीकत: ग्रामीण मह‍िलाओं पर दोहरी मार

देश में लगभग हर घर तक बिजली पहुंचने के सरकारी दावों के बावजूद, ग्रामीण भारत के कई इलाकों में आज भी भरोसेमंद बिजली आपूर्ति एक चुनौती है। ग्रामीण भारत में 82.1% महिलाएं बिना वेतन वाले घरेलू काम करती हैं और रोजाना औसतन 301 मिनट इसमें बिताती हैं। ऐसे में बढ़ती गर्मी के बीच बिजली की कमी का सबसे बड़ा बोझ उन्हीं महिलाओं पर पड़ता है, जिनका अधिकांश समय घर के कामों में गुजरता है।

Jayant Mishra

Jayant Mishra·Multimedia Journalist·27 Jul 2026

उमस भरी गर्मी के बीच चूल्हे पर खाना बनाती सीतापुर जिले के टॉपरपुरवा गाँव की सोनी देवी।

उमस भरी गर्मी के बीच चूल्हे पर खाना बनाती सीतापुर जिले के टॉपरपुरवा गाँव की सोनी देवी।

एक हाथ से सोनी चावल में से कंकड़ चुन रही हैं, दूसरे हाथ से लगातार बैना झल (बांस से बना हाथ से चलने वाला पंखा) रही हैं। शाम के पांच बज चुके हैं, लेकिन उनकी रसोई किसी भट्टी की तरह तप रही है।

तारीख थी छह जुलाई। एक दिन पहले हुई बारिश ने उमस बढ़ा दी थी। तापमान करीब 37 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया था। आसमान साफ था, लेकिन ढलता सूरज पूरी तपिश के साथ चमक रहा था।

सीतापुर जिले की लहरपुर तहसील के धनपुरिया गांव के मजरा टॉपरपुरवा में रहने वालीं सोनी देवी अपने दो बच्चों, सास और पति के लिए खाना बनाने की तैयारी कर रही हैं।

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"आज गर्मी ज़्यादा है, इसलिए दाल-चावल बनेगा।" सोनी बताती हैं।

घर की रसोई एक छोटा-सा कमरा है। एक कोने में मिट्टी का चूल्हा है, दूसरी तरफ सीमेंट की तीन रैक, जिन पर बर्तन और घर का बाकी सामान रखा है। चूल्हे की आग और बाहर की उमस मिलकर कमरे को और भी तपा देती है। कमरे में कोई पंखा नहीं है। सोनी बार-बार बैना झलती हैं, लेकिन राहत नाममात्र की मिलती है। उनके माथे से पसीने की बूंदें टपककर चावल में गिरने लगती हैं।

वजह सिर्फ गर्मी नहीं है। टॉपरपुरवा में पिछले 26 वर्षों से बिजली नहीं है।

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"दिन में इतनी गर्मी होती है कि घर में बैठना मुश्किल हो जाता है। चूल्हे के सामने खाना बनाना सबसे कठिन काम लगता है। रात में भी ठीक से नींद नहीं आती। बच्चों को भी बैना झलते-झलते सुलाना पड़ता है।”

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“मुश्किल से चार-पांच घंटे की नींद हो पाती है। अगर गांव में बिजली आ जाए, तो सबसे पहले चैन की नींद मिले।" चावल साफ करते हुए सोनी कहती हैं।

यह सिर्फ एक दिन की कहानी नहीं है। टॉपरपुरवा के करीब 40 परिवार करीब 2 दशकों से गर्मी इसी तरह गुज़ारते हैं। दिन में तपिश और उमस से जूझते हैं, रात में बिना पंखे के करवटें बदलते हैं।

26 साल से बिजली का इंतजार, खंभे हैं लेकिन तार नहीं

सरकार की ओर से हर घर तक बिजली पहुंचाने के दावों के बीच सीतापुर जिले के इस गांव में बिजली के खंभे और ट्रांसफॉर्मर तो वर्षों पहले लगा दिए गए, लेकिन आज तक बिजली आपूर्ति शुरू नहीं हो सकी है।

बिजली न होना सिर्फ एक सुविधा की कमी नहीं है। इसका सबसे ज़्यादा असर महिलाओं पर रहा। खाना बनाना हो, बच्चों की देखभाल हो या गर्मी में बिना पंखे के रात काटना, बिजली की कमी उनके हर दिन को और कठिन बना देती है। इसकी कीमत बच्चे भी हर दिन चुका रहे हैं।

सीतापुर के टॉपरपुरवा गांव में उमस भरी गर्मी के बीच उर्मिला अपनी बेटी को पढ़ाई के दौरान बैना झलकर हवा कर रही हैं।
सीतापुर के टॉपरपुरवा गांव में उमस भरी गर्मी के बीच उर्मिला अपनी बेटी को पढ़ाई के दौरान बैना झलकर हवा कर रही हैं।

गांव की 36 वर्षीय उर्मिला अपनी चारपाई पर बैठी हैं। उनके बगल में कक्षा आठ में पढ़ने वाली बेटी किताब खोलकर पाठ पढ़ने का अभ्यास कर रही है। उर्मिला के हाथ में लकड़ी का बैना है। जैसे ही उनका हाथ कुछ पल के लिए रुकता है, बेटी पढ़ना छोड़कर माथे का पसीना पोंछने लगती है। यह देखकर उर्मिला फिर पहले से तेज़ी से बैना झलने लगती हैं।

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"गांव में बिजली नहीं है, इसलिए बच्चों की नींद भी पूरी नहीं होती। पढ़ाई छोटी बैटरी की रोशनी में होती है। गर्मी इतनी होती है कि हाथ से पंखा झलते-झलते ही रात निकल जाती है।" उर्मिला कहती हैं।

सोनी और उर्मिला जैसी महिलाओं की परेशानी केवल असुविधा भर नहीं है। सिम्बायोसिस इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी, पुणे में जलवायु परिवर्तन एवं सतत विकास अध्ययन विभाग के सहायक प्रोफेसर मनोरंजन घोष कहते हैं कि बढ़ती गर्मी के दौर में भरोसेमंद बिजली आपूर्ति महिलाओं के स्वास्थ्य से भी जुड़ा मुद्दा बन चुकी है।

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"ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाएं कई घंटे चूल्हे के सामने या गर्मी में घरेलू काम करती हैं। ऐसे में शरीर को ठंडा होने का समय मिलना जरूरी होता है। अगर उन्हें पंखे जैसी बुनियादी सुविधा भी नहीं मिले, तो लंबे समय तक गर्मी के संपर्क में रहने से उनके स्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है। लगातार नींद पूरी न होने से काम करने की क्षमता, एकाग्रता और सेहत तीनों प्रभावित होती हैं।" मनोरंजन जोर देकर कहते हैं।

टॉपरपुरवा गाँव के बाहर लगा ट्रांसफॉर्मर। Photo: Jayant Mishra
टॉपरपुरवा गाँव के बाहर लगा ट्रांसफॉर्मर। Photo: Jayant Mishra

टॉपरपुरवा में करीब 40 परिवार रहते हैं। गांव के बाहर बिजली के खंभे और एक ट्रांसफॉर्मर लगा हैं, लेकिन इन खम्बों पर तार नहीं हैं। शाम के उजाले और मोबाइल चार्ज करने के लिए गाँव के लोगों ने छोटे छोटे 50W से 100W के सोलर पैनल लगवा रखें हैं। इन्हीं से मोबाइल चार्ज होते हैं और रात में छोटी बैटरी जलती है।

टॉपरपुरवा गाँव के लिए यह समस्या नई नहीं है। ग्रामीणों से बातचीत करने पर पता चला, कि करीब 26 साल पहले यहां बिजली की लाइन बिछाई गई थी, लेकिन कुछ ही समय बाद तार चोरी हो गए। उसके बाद गांव में बिजली दोबारा कभी नहीं आई।

26 साल पहले लगे बिजली के खंबों से चोरी हुए तार दिखाते ग्रामीण राजू निषाद। Photo: Jayant Mishra
26 साल पहले लगे बिजली के खंबों से चोरी हुए तार दिखाते ग्रामीण राजू निषाद। Photo: Jayant Mishra

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ग्रामीण राजू निषाद बताते हैं, “वर्ष 2000 से पहले गांव में 11 हजार वोल्ट की लाइन बिछाकर बिजली की व्यवस्था की गई थी। लेकिन कुछ ही समय बाद पूरी लाइन चोरी हो गई। उनका कहना है कि इसके बाद उन्होंने कई बार लहरपुर विद्युत विभाग, समाधान दिवस और स्थानीय विधायक को प्रार्थना पत्र द‍िया गया, लेकिन आज तक गांव में बिजली बहाल नहीं हो सकी”।

लहरपुर देहात के अपर अभियंता अभिनव शुक्ल का कहना है क‍ि गांव का सर्वे LOH योजना के तहत कराकर प्रस्ताव भेजा जा चुका है। स्वीकृति मिलते ही विद्युतीकरण का कार्य शुरू कर दिया जाएगा।

लेक‍िन सवाल यह है क‍ि अगर बिजली के खंभे और ट्रांसफॉर्मर गांव में मौजूद हैं, तो फिर 26 साल बाद भी तारों में करंट क्यों नहीं दौड़ा?

कागजों में 100% विद्युतीकरण, जमीन पर अब भी अंधेरा

प्रधानमंत्री सहज हर घर बिजली योजना “सौभाग्य” के वेबसाइट के आंकड़ों के अनुसार उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिले में सभी 4,89,811 घरों में 31 मार्च 2019 तक विद्युत कनेक्शन दिए जा चुके हैं। आधिकारिक आंकड़ों की माने तो जनपद में 100% विद्युतीकरण हो चुका है।

नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (NFHS-5) 2023-24 के अनुसार भारत के 97.8% और उत्तर प्रदेश के 94.9% ग्रामीण घरों में बिजली उपलब्ध है। इसके बावजूद सीतापुर का टॉपरपुरवा गांव पिछले 26 वर्षों से नियमित बिजली आपूर्ति का इंतजार कर रहा है।

सरकार के आंकड़ों के अनुसार, देश के लगभग सभी घरों तक बिजली का कनेक्शन पहुंच चुका है। लेकिन सिर्फ कनेक्शन होना ही काफी नहीं है। कई ग्रामीण इलाकों में लोगों को आज भी लंबे बिजली कट, कम वोल्टेज और अनियमित बिजली आपूर्ति जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। CEEW की 2020 की इंडिया रेजिडेंशियल एनर्जी सर्वे के मुताबिक, 96.7% घर ग्रिड से जुड़े हैं, फिर भी उत्तर प्रदेश में देश के एक-तिहाई से अधिक घर ऐसे हैं जहाँ बिजली नहीं है।

सुल्तानपुर जिले के कलखुरा गांव में रहने वाली 40 वर्षीय कृष्णा निषाद पिछले पांच महीनों से बिना बिजली के रह रही हैं। शाम ढलते ही उनका घर अंधेरे में डूब जाता है। खाना बनाने से लेकर बच्चों को सुलाने तक हर काम बैटरी, टॉर्च और मिट्टी के दीये के सहारे होता है।

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“मुश्किल से तीन-चार घंटे ही सो पाते हैं। कमरे में इतनी गर्मी होती है कि नींद नहीं आती, इसलिए बाहर चारपाई डालकर सोते हैं।”

काम करने के लिए टॉर्च और लालटेन का सहारा लेना पड़ता है। खाना भी तभी बनाते हैं, जब किसी तरह बैटरी वाली बत्ती चार्ज हो जाती है। नहीं तो तेल का दिया जलाकर काम चलाते हैं।

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“इस परेशानी का असर मेरी सेहत पर भी पड़ रहा है। मेरा ब्लड प्रेशर बढ़ जाता है। हम गरीब लोग हैं, जैसे-तैसे दवा खरीदकर काम चलाते हैं।” परेशानी भरे स्‍वर में कृष्‍णा अपनी सारी बातें रखती हैं।

बिजली की कमी सिर्फ उन गांवों तक सीमित नहीं है जहां ग्रिड नहीं पहुंची। झारखंड के गुमला जिले में महिलाओं के पास सोलर पैनल तो हैं, लेकिन इतनी बिजली नहीं कि गर्मी की रातों में पंखा चला सकें।

Without access to grid electricity and with solar batteries fully drained,Manjita devi relies on a traditional hearth to cook in the dark. Photographed with auxiliary lighting.
Photo Credit: Sabnam Gurung
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"हमारे गांव में सोलर है, लेकिन उससे पंखा नहीं चला सकते। अगर पंखा चलाएंगे तो बैटरी जल्दी खत्म हो जाएगी। इसलिए हम लोग सिर्फ रोशनी और मोबाइल चार्ज करने के लिए इसका इस्तेमाल करते हैं। बरसात में जब चार-पांच दिन धूप नहीं निकलती, तो बैटरी भी खत्म हो जाती है और अंधेरे में रहना पड़ता है। तब मोमबत्ती के सहारे काम चलता है। फोन चार्ज करने के लिए 20 किलोमीटर दूर जाना पड़ता है। बिजली होती तो बच्चों की पढ़ाई भी ठीक से होती और हमारी जिंदगी भी कुछ आसान हो जाती।" मंजीत कुमारी,बेहरापाठ, गुमला, झारखंड

बिजली की कमी का सबसे बड़ा बोझ महिलाओं पर

टॉपरपुरवा, कलखुरा और बेहरापाठ तीनों दो अलग-अलग राज्य के गांव हैं, लेकिन बिजली की कमी और बढ़ती गर्मी की यह समस्या देश के कई ग्रामीण इलाकों में एक जैसी है। इसका असर पूरे परिवार पर पड़ता है, जबक‍ि मह‍िलाएं एक साथ कई अहम ज‍िम्‍मेदार‍ियों का न‍िवर्हन करती हैं, जबक‍ि इनकी कहीं ग‍िनती भी नहीं होती।

राष्ट्रीय समय उपयोग सर्वेक्षण (Time Use Survey 2019) के अनुसार ग्रामीण भारत में 82.1% महिलाएं बिना वेतन वाले घरेलू कामों में हिस्सा लेती हैं, जबकि पुरुषों में यह अनुपात 27.7% है। इतना ही नहीं, ग्रामीण महिलाएं ऐसे कामों में औसतन 301 मिनट प्रतिदिन बिताती हैं, जबकि पुरुष केवल 98 मिनट।

घर के कामों के अलावा बच्चों, बुजुर्गों और बीमार परिजनों की देखभाल की जिम्मेदारी भी मुख्य रूप से महिलाओं पर होती हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में 28.2% महिलाएं ऐसे देखभाल संबंधी काम करती हैं, जबकि पुरुषों में यह हिस्सा 14.4% है। महिलाएं इन कामों में प्रतिदिन औसतन 132 मिनट देती हैं, जबकि पुरुष सिर्फ 77 मिनट।

इसका मतलब यह है कि ग्रामीण महिलाओं का अधिकांश समय घर के भीतर बीतता है। ऐसे में जब घर में बिजली नहीं होती, तो खाना बनाना, बच्चों की देखभाल, अनाज साफ करना, पशुओं की देखभाल और रात में परिवार को सुलाना जैसे लगभग सभी काम अधिक कठिन हो जाते हैं।

महिला किसान अधिकार मंच (मकाम) की राष्ट्रीय टीम की सदस्य सेजल दंड कहती हैं कि ऊर्जा गरीबी को अक्सर केवल बिजली के कनेक्शन या बुनियादी ढांचे की समस्या मान लिया जाता है, जबकि इसका सबसे बड़ा असर महिलाओं के रोजमर्रा के काम पर पड़ता है।

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“ऊर्जा पर होने वाली चर्चाओं में अक्सर उद्योगों और बड़े बुनियादी ढांचे का ज़िक्र होता है, लेकिन यह कम देखा जाता है कि बिजली की कमी का सबसे ज़्यादा असर महिलाओं के रोज़मर्रा के जीवन पर पड़ता है। ग्रामीण महिलाओं के लिए घर ही उनका कार्यस्थल है, जहां वे खाना बनाती हैं, बच्चों की देखभाल करती हैं, खेती और पशुपालन से जुड़े काम करती हैं। ऐसे में नियमित बिजली न होने से उनकी मेहनत और समय, दोनों बढ़ जाते हैं।” सेजल दंड कहती हैं।

वहीं मनोरंजन घोष कहते हैं क‍ि भारत में गर्मी की बात होती है तो ज़्यादातर चर्चा निर्माण मजदूरों, रेहड़ी-पटरी वालों और खुले में काम करने वाले लोगों पर होती है। लेकिन खराब हवादार और गर्म घरों में रहने वाली महिलाओं की परेशानी पर बहुत कम ध्यान दिया जाता है। बढ़ती हीटवेव के दौर में गरीब परिवारों को पंखे जैसे ठंडक देने वाले साधन और भरोसेमंद बिजली उपलब्ध कराना भी सार्वजनिक स्वास्थ्य का अहम हिस्सा माना जाना चाहिए।

कहीं बिजली सालों से नहीं है, तो कहीं महीनों से आपूर्ति बंद है। नतीजा यह है कि गर्मी की सबसे बड़ी मार घर संभालने वाली महिलाओं को झेलनी पड़ रही है।

टॉपरपुरवा गांव के छात्र इंद्रेश कुमार, जो बीएससी चौथे सेमेस्टर के छात्र हैं, न्‍यूज पोटली से बातचीत में बताते हैं कि कैसे बिजली न होने से पढ़ाई प्रभावित हो रही है।

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"रात में सोलर पैनल के सहारे पढ़ते हैं, लेकिन बैटरी दो घंटे में खत्म हो जाती है। पंखा चलाएं तो रोशनी नहीं रहती और रोशनी रखें तो पंखा नहीं चलता। गर्मी के कारण रात में ठीक से नींद भी नहीं आती।"

हालांकि इंद्रेश को उम्‍मीद है क‍ि जल्‍द ही सरकार तक उनकी बात पहुंचेगी और उनका गांव भी ब‍िजली के प्रकाश से रोशन होगा।


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