महाराष्ट्र में अकोला जिले के राजंदा और पिलकवाड़ी गांव महिलाओं को कुछ साल पहले तक सिर्फ चूल्हा-चौका तक सीमित समझा जाता है, गांव के पुरुषों को लगता था कि, खेती महिलाओं के बस की बात नहीं हैं, लेकिन वही पुरुष आज खेती से लेकर हर बड़े फैसले में अब उनकी राय लेते हैं। महिलाएं अब खुद की कंपनी चला रही हैं।

ब्रांड बनाने के लिए क्या चाहिए?
एक ऐसा नाम जिसे लोग याद रखें, एक ऐसा काम जिस पर लोग भरोसा करें और सबसे जरूरी, अपने उत्पादन का बेहतर दाम ले सके। आमतौर पर जब हम किसी ब्रांड की बात करते हैं, तो हमारे दिमाग में बड़े कारोबार और बड़ी कंपनियों की तस्वीर आती है, लेकिन महाराष्ट्र के अकोला जिले के गांवों में कुछ महिलाएं खेतों के बीच अपनी अलग पहचान बना रही हैं। ये महिलाएं सिर्फ खेती नहीं कर रहीं, बल्कि अपने काम को कारोबार में बदल रही हैं, और अपने गांव में बदलाव की एक नई कहानी लिख रही हैं।
शानदार काम की वजह से महिलाओं को अलग ही अहमियत मिल रही है, हालांकि कुछ साल पहले तक इन महिलाओं की जिंदगी काफी अलग थी।

““पहले हम खाना बनाते थे, बच्चों को संभालते थे। हमारे पास कोई दूसरा काम नहीं था, क्योंकि हमारे घरों के पुरुषों को लगता था कि हम लोग खेती नहीं कर सकते हैं, बड़े फैसले नहीं ले सकते”
- संध्या उमेश मोरोडे
खेती से ब्रांड बनाने का सफर
खेती उनके जीवन का हिस्सा जरूर थी, लेकिन खेती को वैज्ञानिक तरीके से समझने और उसे कारोबार की तरह देखने का अवसर बहुत कम मिला था। फिर उन्हें पानी फाउंडेशन की तरफ से चलाए जा रहे 3 दिवसीय ट्रेनिंग के बारे में पता चला।

शेतिशाला पहल के जरिए इन महिलाओं ने खेती को एक अलग नजरिए से समझना शुरू किया। मिट्टी, पानी, फसल, लागत और खेती के तरीकों को लेकर उनकी समझ बदली। उन्होंने ये सोचना शुरू किया कि, सिर्फ फसल से ज्यादा उत्पादन लेना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि अपनी उपज का ज्यादा मूल्य कैसे लिया जाए ये जरूरी है।
शेतीशाला में उन्हें खेती की ट्रेनिंग के साथ वो सम्मान और अपनापन मिला, जो उन्हें पहले कभी नहीं मिला था। उन्हें वो हौसला मिला, जिसने उन्हें एहसास कराया कि, वो भी बहुत कुछ कर सकती हैं। और बस, यहीं से बदलाव की एक नई कहानी शुरू हुई।
““पहले हम साधारण तरीके से खेती करते थे। फिर हमें पानी फाउंडेशन के बारे में पता चला। इसके बाद हम ट्रेनिंग लेने के लिए अमरावती गए। तीन दिन की इस ट्रेनिंग में हमें इतनी अनमोल बातें सीखने को मिलीं कि खेती को लेकर हमारे सारे विचार ही बदल गए।”
- संध्या उमेश मोरोडे
ग्रुप खेती से बदली तस्वीर
ट्रेनिंग से लौटी महिलाओं ने अपना-अपना गुट बनाया और ट्रेनिंग में बताए गए तरीकों से खेती करने का इरादा किया। शुरुआत मुश्किल भरी रही। घर के पुरुषों ने पहले तो खेत देने से ही मना कर दिया, और फिर जब दिया तो पूरे खेत का एक छोटा सा हिस्सा, क्योंकि उन्हें लगता था कि, ये खेती को खराब कर देंगी, लेकिन हुआ बिल्कुल उलट। दोनों गांव की महिलाओं ने ट्रेनिंग में सिखाए गए तरीकों से ना सिर्फ कम खर्चे में अच्छी खेती की, बल्कि बढ़िया उत्पादन भी लिया। सबसे जरूरी की पुरुषों का भरोसा भी जीता।

““पहले साल हमें घर से कोई सपोर्ट नहीं मिला। हमने ही एक-दूसरे का सपोर्ट किया। फिर जब हमने कम लागत में ही पुरुषों से दोगुना उत्पादन लिया, तो उनका भी नजरिया बदला, परिवार का भी और गांव वालों की सोच भी बदल गई।”
- संध्या उमेश मोरोडे
महज कुछ सालों की खेती के बाद महिलाओं को ये समझ आ गया कि, अच्छा उत्पादन लेना जितना जरूरी है, उससे कहीं ज्यादा जरूरी है, उसे बेहतर दाम में बेचना, यहीं से कारोबार की नींव पड़ी। राजंदा गांव की महिलाओं ने प्रॉसेसिंग यूनिट लगाई और जो भी वो उगाती हैं, अब इस यूनिट में प्रॉसेस करने के बाद अच्छे दामों में बेच रही हैं।

मतलब खेत की उपज अब मंडी ना जाकर, एक प्रोडक्ट बन रही है, जिसे ये महिलाएं खुद तैयार कर रही हैं, बेच रही हैं और उससे कमाई कर रही हैं।
राजंदा गांव में ज्योति ताई मिल को लीड कर रही ज्योति विजय महल्ले बताती हैं:
““खेती से जब हमें मुनाफा हुआ तो हमने घर बनाया। पहले हम झोपड़ी में रहते थे।”
यानी खेत से निकला मुनाफा सिर्फ फसल के आंकड़ों में नहीं था। उसने उनके परिवार के रहने का तरीका बदल दिया, लेकिन इस बदलाव का रास्ता आसान नहीं था।
संध्या उमेश मोरोडे को शुरुआती दिन आज भी याद हैं। जब उन्होंने खेती के साथ कुछ नया करने की कोशिश शुरू की तो परिवार से तत्काल समर्थन नहीं मिला।
“वह कहती हैं:
“हमें परिवार से कोई सपोर्ट नहीं मिला। पहले ही साल हमने एक-दूसरे का साथ दिया और मिलकर सारा काम किया।”
धीरे-धीरे इन महिलाओं ने एक-दूसरे का सहारा बनना शुरू किया। वे साथ सीखतीं, खेतों में एक-दूसरे के काम को देखतीं और अपने अनुभव साझा करतीं। फिर उन्हें अपने खेतों में बदलाव दिखाई देने लगा।
पिलकवाड़ी गांव के सरपंच दिनेश हरिदार वाघमारे ने न्यूज़ पोटली को बताया:
““जिस खेत से हम पहले 7 से 8 क्विंटल प्रति एकड़ कपास का उत्पादन लेते थे, उसी खेत से इन महिलाओं ने अपने खेती के तरीके और मेहनत से हमसे 4 से 5 क्विंटल ज्यादा उत्पादन लिया।”
धीरे-धीरे उनकी खेती की अर्थव्यवस्था बदलने लगी। अब उनका ध्यान सिर्फ इस बात पर नहीं था कि, खेत में कितनी फसल पैदा हुई। बल्कि इस तरफ था कि, उस फसल से कितना पैसा बनाया जा सकता है।

उगाओ। प्रोसेस करो। बेचो। कमाओ। फिर उसी कमाई को दोबारा अपने काम में लगाओ।
ये एक साधारण सा चक्र है, लेकिन इन महिलाओं के लिए इसने कई नई संभावनाओं के दरवाजे खोल दिए।
खेती के साथ छोटे कारोबार ने उन्हें आय के अतिरिक्त साधन दिए। मंडी और बाजार की अनिश्चितताओं पर पूरी तरह निर्भर रहने के बजाय उन्होंने अपनी उपज के साथ वैल्यू एडिशन और सीधे बिक्री के रास्ते तलाशने शुरू किए।
किसी के लिए इसका मतलब बेहतर घर था, किसी के लिए गाड़ी, तो किसी के लिए अपना कारोबार।
“"खेती और इससे जुड़े बिजनेस से हमें काफी मुनाफा हुआ। अब हममें से किसी का भी घर कच्चा नहीं है, सबके घर पक्के हो गए हैं। हमने गाड़ी भी ले ली है। बच्चों को अच्छी शिक्षा और संस्कार भी दे पा रहे हैं, सब इसी की बदौलत।”
-ज्योति विजय महाले
इस पूरी यात्रा में सबसे बड़ा बदलाव शायद खेतों या घरों में नहीं, बल्कि महिलाओं की भूमिका में आया।

जो महिलाएं पहले खेती के काम में मदद करती थीं, वे अब खेती से जुड़े फैसले लेने लगीं। जो महिलाएं कभी सिर्फ परिवार की जरूरतों तक सीमित थीं, वे अब अपनी कमाई, अपने कारोबार और अपने भविष्य के बारे में फैसले लेने लगीं।
महाराष्ट्र सरकार के ग्राम विकास विभाग द्वारा संचालित महाराष्ट्र राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन (MSRLM), जिसका मकसद ग्रामीण महिलाओं को खेती और उससे जुड़े व्यवसायों के जरिए आत्मनिर्भर बनाना है, के अधिकारी कहते हैं
“"महिलाओं को एक साथ जोड़कर खेती और बिजनेस शुरू करने का मुख्य उद्देश्य महिलाओं को आर्थिक और सामाजिक तौर पर सक्षम बनाना था। खेती में कम से कम लागत लगे और उत्पादन बेहतर हो, इसके लिए पानी फाउंडेशन और कृषि विभाग इन महिलाओं को पूरा सपोर्ट करता है। इसका फायदा भी देखने को मिला है।"-सुधीर खुजे (DMM, MSRLM- UMED)
आज जब गांव की दूसरी महिलाएं इन महिलाओं को ये सब करते हुए देखती हैं, तो उनके सामने भी एक नई संभावना पैदा होती है। अगर ये कर सकती हैं, तो हम भी कर सकते हैं। यही बदलाव धीरे-धीरे गांव की सोच को भी प्रभावित करता है।

क्योंकि जब एक महिला अपने काम से कमाती है, तो उसका असर सिर्फ उसकी आय तक सीमित नहीं रहता। उसका असर परिवार पर पड़ता है। बच्चों के सोचने के तरीके पर पड़ता है। घर में लिए जाने वाले फैसलों में उसकी भूमिका बदलती है, और सबसे जरूरी गांव की दूसरी महिलाओं के लिए एक नया रास्ता दिखाई देता है।
यह उस बदलाव की कहानी है, जो तब शुरू होता है, जब ज्ञान को अवसर मिलता है और महिलाओं को उस ज्ञान पर काम करने की आजादी।
महाराष्ट्र में महिला किसानों की स्थिति लंबे समय से एक बड़ी चुनौती रही है। बड़ी संख्या में महिलाएं खेती से जुड़ी हैं, लेकिन जमीन के मालिकाना हक और खेती से जुड़े फैसलों में उनकी भागीदारी अभी भी सीमित है।
ऐसे में महिलाओं को खेती की तकनीक, सरकारी योजनाओं, आर्थिक संसाधनों और कारोबार से जोड़ना सिर्फ उनकी व्यक्तिगत जिंदगी बदलने की कोशिश नहीं है। इसका असर पूरे ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।

अकोला की इन महिलाओं की यात्रा भी इसी बदलाव की एक मिसाल है।
पानी फाउंडेशन की शेतिशाला पहल, कृषि विभाग और दूसरे सहयोगी समूहों से मिले समर्थन ने उन्हें खेती को नए तरीके से समझने का मौका दिया, लेकिन उस सीख को जमीन पर उतारने का काम इन महिलाओं ने खुद किया।
उन्होंने सीखा, प्रयोग किया, एक-दूसरे का साथ दिया और फिर उस सीख को खेती और कारोबार में बदला। आज उनकी पहचान सिर्फ इस बात से नहीं है कि वे क्या उगाती हैं? उनकी पहचान इस बात से है कि उन्होंने उस उपज से क्या बनाया।

उन्होंने शुरुआत किसी ब्रांड को बनाने के इरादे से नहीं की थी। उनका मकसद सिर्फ अपनी खेती को बेहतर करना और परिवार की जिंदगी को बेहतर बनाना था, लेकिन खेती, कारोबार, अपने उत्पाद और सामूहिक प्रयासों के जरिए उन्होंने धीरे-धीरे ऐसी पहचान बनाई, जिसे उनके गांव में लोग जानते हैं और जिस पर भरोसा करते हैं।
महाराष्ट्र की इन महिलाओं की कहानी बताती है कि, जब खेत में ज्ञान आता है, महिलाओं के हाथ में अवसर आता है और उन्हें फैसले लेने की जगह मिलती है, तो बदलाव सिर्फ एक खेत में नहीं होता, घर से लेकर पूरे समाज में सकारात्मक बदलाव दिखता है।

न्यूज़ पोटली जब इन महिलाओं की कहानी कवर करने पहुंचा, तो इन महिलाओं ने कुछ इस तरह से हमारा स्वागत किया।
वीडियो देखिए-




