पश्चिमी चंपारण (बिहार) बाढ़ ने इस बार बिहार में भीषण तबाही मचाई है। ये ग्राउंड रिपोर्ट बिहार में पश्चिमी चंपारण के उन गांवों से हैं जहां तीन-तीन बार बाढ़ आई है पूरा इलाका सवा तीन महीन से पानी से घिरा है।
वैसे तो उत्तर बिहार में बाढ़ हर साल आती है, मगर पश्चिमी चंपारण के जोगापट्टी प्रखंड के कुछ गांवों में इस साल बाढ़ एक अलग तरह का हादसा बनकर आई। पूरे साल में तीन बार गंडक नदी उफान पर रही और इन तीनों बार योगापट्टी के सिसवा मंगलपुर और चौमुखा पंचायत के ज्यादातर घरों में काफी पानी चल गया। हर बार पानी आया तो दसेक दिन रहा। कम भी हुआ तो घरों से पानी निकाला मगर खेतों और रास्तों में पानी भरा रहा। गांवों के लोगों के मुताबिक पहली बार उनके यहां 26 जून को पानी आया था. जो अक्टूबर के पहले हफ्ते तक नहीं निकला है। 2 अक्टूबर के दिन न्यूज पोटली यहां नाव से पहुंची तो धान, गन्ना की लगभग पूरी फसल डूबी मिली। वे घर से बाहर आना-जाना नाव और डोंगी से कर रहे हैं। ऐसा पहली बार हुआ है कि गांवों में एक ही साल में तीन बार भीषण बाढ़ आई है और तीन महीने से अधिक रह गई है, अभी पानी के इस पूरे साल रहने की उम्मीद है। दशहरा से लेकर छठ तक उनके सारे त्योहार बाढ़ के बीच ही मनेंगे।

मुख्य रुप से खेती पर निर्भर यहां के किसानों के मुताबिक खरीफ की उनकी फसल तो तबाह हो ही गई, रबी की खेती भी शायद ही कर पायेंगे।
बड़हरवा चरवा के सरकारी स्कूल के पास से ही बाढ़ का पानी दिखना शुरू हो जाता है. एक तरफ जहां सिसवा मंगलपुर के लिए नावें चलती नजर आती है, वहीं चौमुखा के गांवों से लोग पैदल की कमर और छाती भर पानी में आते-जाते नजर आते हैं। उन्हीं पानी के बीच कुछ महिलाएं स्नान भी कर रही होती हैं, वे बताती हैं, कल ( 3 अक्टूबर) बच्चों की लंबी आयु के लिए मनाया जाने वाला जितिया त्योहार है और उससे एक दिन पहले नहाय-खाय का दिन होता है। इस रोज औरतें नहाती हैं। हमलोग तो स्कूल में रह रहे हैं, नहानें कहां जायें, इसलिए बाढ़ के पानी के बीच ही नहा रहे हैं।
राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय बड़हरवा चरवा में लगभग तीन सौ बाढ़ पीड़ित रह रहे हैं, उनमें से ज्यादातर सिसवा मंगलपुर पंचायत के हैं। औरतें, बच्चे और बुजुर्ग ज्यादा हैं। नौजवान पानी के बीच घरों की सुरक्षा के लिए वहीं हैं। वहां सरकार ने चार दिन पहले सामुदायिक रसोई की शुरुआत की है और इन्हें दो वक्त का खाना मिलता है। पीड़ित औरतें बताती हैं कि वे दूसरी बार इस स्कूल में आई हैं। पहली बार 26 अगस्त के समय तब आई थीं, जब नेपाल की भीषण बाढ़ के बाद उनके गांव में भी पानी आया था।

इस कैंप में रहने के लिए न बिस्तर है, न चादर-तकिया। ज्यादातर लोग फर्श पर ही अपने घर से लाई दरी बिछा कर रह रहे हैं। तीन सौ से अधिक बाढ़ पीड़ितों के लिए सिर्फ दो शौचालय हैं। ऐसे में ज्यादातर लोग महिला-पुरुष दोनों शौच के लिए बाहर जाते हैं। बच्चे बहुत हैं, छोटे बच्चे भी हैं, मगर उनके दूध का कोई इंतजाम नहीं है। एक औरत चार महीने के अपने जुड़वा बच्चों के साथ कैंप में दिखती हैं। वे कहती हैं कि उन्होंने दूध का डब्बा बाहर से खरीदा है। औरतों की साफ-सफाई, सेनेटरी नैपकीन आदि का कोई इंतजाम नहीं है। हां, दिन में कुछ वक्त के लिए मेडिकल कैंप जरूर लगता है। जानवरों को सबसे अधिक दिक्कत है, उनके चारे का इंतजाम बहुत कम है। ऐसे में लोगों के बीच काफी नाराजगी है।
वहीं हमें सिसवा मंगलपुर के मुखिया भी दिखते हैं, उनमें सरकारी राहत में कमी को लेकर काफी नाराजगी है, मगर साथ ही वे बीच-बचाव की कोशिश भी करते हैं।
मगर चौमुखा पंचायत के पीड़ितों ने जिस स्कूल में शरण ले रखा है, वहां खाने का इंतजाम भी नहीं है।
इससे आगे हम नाव से सिसवा पंचायत जाते हैं। 3 किमी का सफर नाव से 45 मिनट में तय होता है। इस रास्ते में तीन सरकारी और कई निजी नावें चलती हैं। मगर किसी में मोटर नहीं लगा है, न ही सुरक्षा के कोई इंतजाम। लोग जान का जोखिम उठाकर सफर करते हैं और नदी और बाढ़ का पानी पारकर अपने गांव जाते हैं।

इस रास्ते में कई जगह गन्ने और धान के खेत पानी में डूबे नजर आते हैं। उन्हें देखकर समझ आता है कि इस साल फसल बिल्कुल तबाह हो गई है।
गांव में कुछ टोलों में पानी उतर गया है, मगर घरों में कीचड़ है। लोग अपने भींगे बिस्तर, कपड़े और अनाज सुखाते नजर आते हैं। एक औरत मिलती है, जिसने अपने चार बच्चों और चार बकरियों को बाढ़ के दिनों में अकेले संभाला है और साथ ही अपने घर का सामान भी बचाया। ऊंची जगह पर चार चौकियों को लगाकर वह रही। उसके पति रोजगार के लिए बिहार से बाहर रहते हैं।
गांव के लोग बताते हैं कि उस गांव में तीन-चार दिन सरकारी खिचड़ी बंटी और कुछ पोलिथीन शीट बांटे गये, इसके अलावा किसी को कोई राहत नहीं मिली। अभी तक इन दोनों पंचायत में बिहार सरकार की तरफ से बंटने वाली सात हजार की राहत राशि किसी को नहीं मिली।
यादव, बनिया और अन्य पिछड़ी जातियों के टोलों से तो पानी निकल गया है, मगर निचले इलाके में बसे मुशहर टोले में अभी भी कई घरों में पानी और कीचड़ है। उनकी समस्या अलग है। उनके फूस के बने घर भी गिर रहे हैं. उनमे रहना मुश्किल है।
कई दशकों बाद ऐसी भीषण आपदा झेलने वाले इन गांवों को मिलने वाली सरकारी सहायता नगण्य है। इन्हें इस तबाही से उबरने में अभी कई महीने लगेंगे।
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