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लैंडस्लाइड में दबता विकास, कुल्लू-मनाली की बरसाती तबाही और उसका असर

अगस्त 2025 में भारी बारिश ने कुल्लू-मनाली घाटी में फिर से कहर बरपाया, जिससे सैकड़ों सड़कें और किरतपुर–मनाली फोरलेन जगह-जगह धंस गईं और कई दुकानें-घर ब्यास नदी में समा गए। पर्यटन पर गहरा असर पड़ा, वहीं

Jayant Mishra

Jayant Mishra·Multimedia Journalist·27 Aug 2025· 6 min read

लैंडस्लाइड में दबता विकास, कुल्लू-मनाली की बरसाती तबाही और उसका असर

लैंडस्लाइड में दबता विकास, कुल्लू-मनाली की बरसाती तबाही और उसका असर

अगस्त 2025 में भारी बारिश ने कुल्लू-मनाली घाटी में फिर से कहर बरपाया, जिससे सैकड़ों सड़कें और किरतपुर–मनाली फोरलेन जगह-जगह धंस गईं और कई दुकानें-घर ब्यास नदी में समा गए। पर्यटन पर गहरा असर पड़ा, वहीं किसानों की सेब और सब्ज़ियों की खेप मंडियों तक नहीं पहुँच पा रही है, जिससे करोड़ों का नुकसान होने की आशंका है। विशेषज्ञों का मानना है कि अवैज्ञानिक निर्माण, फोरलेन परियोजना में पहाड़ों की अंधाधुंध कटाई और जलवायु परिवर्तन ने आपदा की तीव्रता को और बढ़ाया है। यह स्थिति केवल प्राकृतिक आपदा नहीं बल्कि हिमालयी विकास मॉडल और पर्यावरणीय संतुलन को लेकर एक गंभीर चेतावनी है, जिस पर तत्काल और दीर्घकालिक रणनीति बनाने की ज़रूरत है।

कुल्लू-मनाली की घाटियों में मानसून एक बार फिर कहर बनकर टूटा है। लोग अभी 2023 की भयावह बाढ़ और भूस्खलन से पूरी तरह उबर भी नहीं पाए थे कि 2025 के अगस्त के अंतिम सप्ताह में भारी बारिश ने उनकी जिंदगी को फिर से पटरी से उतार दिया। बीते सोमवार और मंगलवार को हुई तेज़ बारिश से न केवल सैकड़ों गाँव प्रभावित हुए हैं बल्कि प्रदेश की सबसे महत्त्वपूर्ण सड़क परियोजना किरतपुर से मनाली फोरलेन को एक दर्जन से अधिक स्थानों पर भारी नुकसान पहुँचा है। पिछले 24 घंटे में मनाली–कुल्लू–मंडी फोरलेन कई स्थानों पर धंस गई है। बाहंग के पास दुकानें और रेस्टोरेंट ब्यास नदी में बह गए, जबकि वोल्वो बस स्टैंड का बड़ा हिस्सा भी नदी की चपेट में आ गया। रायसन, सोलंगनाला और डोहलू नाला टोल प्लाज़ा के पास भी फोरलेन बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो चुकी है।

किसानों और व्यापारियों की चिंता बढ़ी
हिमाचल में हालात बेहद गंभीर हैं, जहाँ 687 सड़कें बंद हैं और हजारों वाहन घाटी में फँस गए हैं। भूस्खलनों के कारण मंडी से कुल्लू का सफर कई बार 24 घंटे से अधिक लग रहा है। यात्री और छोटे चालक बरसात व जोखिम भरे हालात में फँसे रहने को मजबूर हैं।इस आपदा से किसानों और व्यापारियों की चिंता भी बढ़ गई है। लाहौल-स्पीति की घाटियों से मटर और गोभी की खेप फँस चुकी है। किसानों का कहना है कि सब्ज़ियों के सड़ने का खतरा मंडरा रहा है। कुल्लू में सेब का सीज़न चरम पर है लेकिन फोरलेन बंद होने से बागवान अपनी खेप मंडियों तक नहीं पहुँचा पा रहे। इससे लाखों रुपए के नुकसान की आशंका है। यह सड़क सिर्फ पर्यटन और व्यापार ही नहीं बल्कि लेह-लद्दाख तक रसद पहुँचाने की “लाइफ लाइन” भी है।

कुल्लू निवासी विश्वनाथ बताते हैं,
“बारिश रुकने का नाम नहीं ले रही। नदी-नाले उफान पर हैं और जगह-जगह सड़कें टूटी हैं, कई गांवों का संपर्क कट चुका है, वाहन सड़कों में फँसे हैं और लोग खुले आसमान के नीचे रात काटने को मजबूर हैं।” एक टैक्सी ड्राइवर का कहना है, “पर्यटक मनाली आ ही नहीं पा रहे। सीज़न हाथ से निकल रहा है।”

आखिर इतनी तबाही क्यों?
प्रश्न उठता है कि इतनी तबाही आखिर क्यों हो रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि पहाड़ों में अत्यधिक और अवैज्ञानिक निर्माण आपदाओं को और गंभीर बना रहा है। फोरलेन प्रोजेक्ट में जगह-जगह पहाड़ काटे गए और ढलानों को पर्याप्त मज़बूती दिए बिना सड़क बनाई गई। बारिश और पानी के दबाव में ये ढलान धंस रहे हैं और सड़कें बह रही हैं। पर्यावरणविदों की चेतावनी है कि नदियों में लगातार मलबा गिरने से उनका प्रवाह और अधिक खतरनाक हो गया है। जलस्रोतों की निकासी बाधित हो रही है और निचले इलाकों में जलभराव और बाढ़ जैसी स्थितियां बन रही हैं।

'विकास की वर्तमान शैली ही आपदाओं को न्योता दे रही'
पर्यावरणविद कुलभूषण उपमन्यु का कहना है कि विकास की वर्तमान शैली ही आपदाओं को न्योता दे रही है। उनका कहना है कि सड़कों का निर्माण अवैज्ञानिक तरीक़ों से, बड़ी-बड़ी मशीनरी और लगातार ब्लास्टिंग से किया जा रहा है, जिससे पहाड़ों की आंतरिक संरचना कमजोर हो रही है। उपमन्यु बताते हैं कि इन परियोजनाओं के लिए हज़ारों-लाखों पेड़ों की अंधाधुंध कटाई ने पर्यावरणीय असंतुलन को और बढ़ा दिया है। उनके अनुसार यह एक मानव निर्मित आपदा है और इससे निपटने के लिए सरकार और समाज दोनों स्तर पर गंभीरता से पहल करनी होगी।

ये भी पढ़ें - गेहूं-चावल में आत्मनिर्भर भारत, अब दलहन-तिलहन पर फोकस

प्रदेश में इस बार 29 प्रतिशत अधिक बारिश दर्ज की गई
मौसम विभाग के आँकड़े भी इस भयावह स्थिति की पुष्टि करते हैं। हिमाचल प्रदेश में इस बार सामान्य से 29 प्रतिशत अधिक बारिश दर्ज की गई है। 1 जून से 26 अगस्त के बीच छह जिले 1000 मिमी से ज्यादा बारिश पार कर चुके हैं। मंडी में 1477 मिमी बारिश (62% अधिक), कांगड़ा में 1508 मिमी (13% अधिक), कुल्लू में 761 मिमी (77% अधिक), ऊना में 1282 मिमी (68% अधिक) और सोलन में 1026 मिमी (48% अधिक) बरसात हुई है। सिर्फ पिछले सप्ताह यानी 19 से 26 अगस्त के बीच कुल्लू में 330 प्रतिशत, बिलासपुर में 307 प्रतिशत और चंबा में 319 प्रतिशत तक अधिक बारिश दर्ज की गई। पिछले 24 घंटों की स्थिति और भी गंभीर रही जब चंबा में 1779 प्रतिशत अधिक, कुल्लू में 1624 प्रतिशत अधिक और लाहौल-स्पीति में 1021 प्रतिशत अधिक बरसात हुई। मौसम विभाग ने चंबा और कांगड़ा में रेड अलर्ट, मंडी और कुल्लू में ऑरेंज अलर्ट और अन्य जिलों में येलो अलर्ट जारी किया है।

राजनीतिक प्रतिनिधि का क्या कहना है?
राजनीतिक प्रतिनिधि और प्रशासन राहत की बात कर रहे हैं पर ज़मीनी हालात बेहद कठिन हैं। कुल्लू के विधायक सुंदर ठाकुर का कहना है कि नदी-नालों में पानी का स्तर बेहद खतरनाक हो गया है। उनका कहना है कि लगातार बारिश के कारण राहत कार्य प्रभावित हैं। नदियों में जमा मलबा हटाना होगा ताकि भविष्य में और खतरा न बढ़े। उन्होंने बताया कि इस मुद्दे को केंद्र सरकार के सामने रखा गया है और पर्यावरण मंत्रालय से अनुमति का इंतज़ार है।

दीर्घकालिक रणनीति की जरूरत
हिमाचल विधानसभा के मानसून सत्र में आपदाओं और जलवायु परिवर्तन का मुद्दा छाया रहा, जहाँ विपक्ष ने सरकार पर लापरवाही का आरोप लगाया और वॉकआउट भी किया। विधायकों ने कहा कि फोरलेन और राजमार्ग परियोजनाओं में ग़लतियाँ आपदा के जोखिम को और बढ़ा रही हैं। सुझाव दिया गया कि राहत राशि का उपयोग केवल तात्कालिक मदद पर नहीं बल्कि वैज्ञानिक अध्ययन और भविष्य की नीतियों पर भी होना चाहिए। विशेषज्ञों का मानना है कि बिना दीर्घकालिक रणनीति के ऐसी आपदाएँ बार-बार घाटियों को असुरक्षित करेंगी। ज़रूरत है कि हिमालयी राज्यों के लिए जलवायु अनुकूलन योजना बने और वैज्ञानिक आधार पर सुरक्षित इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार किया जाए।

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