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फसलों की बुवाई रिकॉर्ड स्तर पर बढ़ी, महंगाई से मिलेगी निजात?

मॉनसून की बारिश में भले देरी हुई हो लेकिन फसलों की अब तक हुई बुवाई के आँकड़े राहत की ओर इशारा कर रहे हैं और रिकॉर्ड स्तर पर बुवाई के ये आँकड़े आने वाले दिनों में आम आदमी को महंगाई से कुछ निजात मिलने की

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Rohit·Correspondent·29 Jun 2024· 5 min read

फसलों की बुवाई रिकॉर्ड स्तर पर बढ़ी, महंगाई से मिलेगी निजात?

फसलों की बुवाई रिकॉर्ड स्तर पर बढ़ी, महंगाई से मिलेगी निजात?

तपती और झुलसाती गर्मी में बारिश अगोरते किसानों के लिए कई जगहों पर खुशखबरी आ गई है। देश के कई हिस्सों में मॉनसून ने जून के खत्म होते होते दस्तक दे दी है। खुशखबरी की बात ये भी है कि पिछले दिनों 17 जून से 22 जून तक मॉनसून के एक सप्ताह ब्रेक के बावजूद खरीफ फसलों की बुवाई में तेजी आई है। ऐसा तब हुआ है जब ये अनुमान लगाया जा रहा था कि जून महीने में बारिश होने में ये विलंब खरीफ फसलों की बुवाई के लिए आफत बन कर आ सकता है, ये भी कहा जा रहा था कि बारिश में हुई देरी फसलों की बुवाई को कम कर सकती है लेकिन कृषि मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार तस्वीर इसके ठीक उलट है. बीते शुक्रवार को आए ये आँकड़े कहते हैं कि अब तक देश में 24.07 मिलियन हेक्टेयर जमीन पर धान, दलहन, तिलहन, गन्ना और कपास जैसी फसलों को बोया जा चुका है जो पिछले साल के मुकाबले 32 परसेंट अधिक है. अब ये आँकड़े उन आशंकाओं को भी खारिज कर रहे हैं जिनमें ये कहा गया था कि इस साल कम खरीफ फसलें बोई जाएंगी और इस साल पिछले साल के मुकाबले अनाज के दामों में तेजी भी देखी जाएगी.

अकेले धान की फसल की बात करें तो वो पिछले साल के मुकाबले इस बार भी उतने आँकड़े में ही बोया गया है, हालांकि अभी भी बुवाई जारी है तो उम्मीद है कि धान की बुवाई इस बार पिछले साल के मुकाबले बढ़ सकती है. दूसरी ओर दलहन की बुवाई में 181% और तिलहन में 155 वृद्धि दर्ज की गई है.

मॉनसून के हाल देश में अब कुछ सही जरूर हुए है क्योंकि बीते कुछ दिनों में मॉनसून भारत के उत्तर-पश्चिम, पूर्व और मध्य भागों में आगे बढ़ा है और शुक्रवार तक तो वो देश की राजधानी दिल्ली में भी दस्तक दे चुका है।

फसलों की बुवाई में आई इस वृद्धि ने देश के कृषि मंत्रालय को उम्मीद भी दे दी है। मंत्रालय ने इन्हीं सब आंकड़ों को देखते हुए इस साल 2024-25 फसल वर्ष (जुलाई से जून) के दौरान 340 मिलियन टन फसलों के रिकॉर्ड उत्पादन का लक्ष्य रखा है जो पिछले फसल वर्ष के दौरान अनुमानित 328.8 मीट्रिक टन से 3.4% अधिक है. कृषि मंत्रालय के इस अनुमान में खरीफ सीजन से 159.97 मीट्रिक टन और रबी सीजन से 164 मीट्रिक टन और गर्मी के मौसम से 16.43 मीट्रिक टन शामिल है.

उम्मीद मौसम विभाग को भी है और वो उम्मीद ये कि जुलाई के पहले सप्ताह तक पूरे देश में मानसून की बारिश हो जाएगी और इसी उम्मीद के आधार पर एक और उम्मीद जगी है कि अगले कुछ हफ्तों में धान की बुआई में तेजी आएगी.

धान के बाद अब दालों की भी बात कर लेते हैं. केन्द्रीय कृषि मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार कर्नाटक और महाराष्ट्र में पर्याप्त बारिश हुई है और इसी की वजह से तुअर, उड़द और मूंग जैसी दालों की खेती का एरिया 181% बढ़ा है.अब जाहिर है जब बुवाई बढ़ी है तो उत्पादन भी बढ़ेगा ही!

दालों का उत्पादन बढ़ना इसलिए भी जरूरी है क्योंकि देश भर में दालों के दाम आसमान छू रहे हैं और इन्हें कंट्रोल करने में सरकार कई बार लाचार दिखी है. पिछले दिनों केंद्र सरकार ने इसी स्थिति को देखते हुए चने और तुअर के दालों के भंडारण पर 30 सितंबर तक रोक लगा दी थी ताकि इनके दामों में कुछ गिरावट आ सके. लेकिन ये हल लॉंग टर्म नहीं है, दालों की इस महंगाई को रोकने का एक मात्र हल है कि देश में दालों का उत्पादन बढ़े, जिसकी उम्मीद भी की जा रही है.

बीते शुक्रवार को उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय की सचिव निधि खरे का भी ऐसा ही कुछ बयान आया था. उन्होंने कहा

“हम अच्छे मानसून, औसत से अधिक बारिश की उम्मीद कर रहे हैं। हमें उम्मीद है कि दालों के उत्पादन में उल्लेखनीय सुधार होगा। बाजार की ऊंची कीमतों को देखते हुए किसान दाल की ज्यादा से ज्यादा खेती करें तभी दालों का महंगा बाजार भी कंट्रोल किया जा सकेगा.”

दालों के अलावा मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में पर्याप्त मानसूनी बारिश के कारण सोयाबीन की बुआई समय से पहले शुरू हो चुकी है. सोयाबीन के अलावा इन राज्यों में तिलहन, सूरजमुखी और मूंगफली जैसी फसलों की बुवाई का एरिया भी बढ़ा है. ये आंकड़ा 1.68 मिलियन हेक्टेयर से बढ़ कर 4.29 मिलियन हेक्टेयर का हो गया है.
बुवाई की ही तरह तिलहन का उत्पादन भी अगर बढ़ा तो खाद्य तेल के लिए एक्सपोर्ट पर देश की निर्भरता कम होने की उम्मीद है. इस वक्त देश की लगभग 28 मीट्रिक टन खाद्य तेल की वार्षिक खपत का लगभग 60% पाम, सोयाबीन और सूरजमुखी तेल के आयात के माध्यम से पूरा किया जाता है.

कुछ ऐसे ही या इससे भी अच्छे आँकड़े गन्ने और कपास की बुवाई के भी हैं.

अब तक गन्ने की फसल बुवाई का एरिया 5.68 मिलियन हेक्टेयर जा चुका है, जो पिछले साल से अधिक है और दूसरी ओर कपास की का क्षेत्रफल 62% बढ़कर 5.91 मिलियन हेक्टेयर हो चुका है.

तो कुल मिला कर मॉनसून देर से आया या आ रहा है लेकिन फसलों की अब तक हुई बुवाई के आँकड़े राहत की ओर इशारा कर रहे हैं और रिकॉर्ड स्तर पर बुवाई के ये आँकड़े आने वाले दिनों में आम आदमी को महंगाई से कुछ निजात मिलने की उम्मीद भी देते हैं.

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