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ILDC कॉन्फ्रेंस 2025: कृषि की चुनौतियों में किरायेदार किसान, कैसे मिले सुरक्षा और अधिकार!

भारत एक कृषि प्रधान देश हैं। जहां एक व्यापक किसान वर्ग कृषि पर आश्रित है। इस किसान वर्ग में एक बड़ी आबादी किरायेदार किसानों की भी है। इन किरायेदार किसानों को असलियत में किसान नहीं माना जाता है। इस स्थ

Pooja Rai

Pooja Rai·28 Feb 2026· 9 min read

ILDC कॉन्फ्रेंस 2025: कृषि की चुनौतियों में किरायेदार किसान, कैसे मिले सुरक्षा और अधिकार!

ILDC कॉन्फ्रेंस 2025: कृषि की चुनौतियों में किरायेदार किसान, कैसे मिले सुरक्षा और अधिकार!

लेखक- सतीश भारतीय

भारत एक कृषि प्रधान देश हैं। जहां एक व्यापक किसान वर्ग कृषि पर आश्रित है। इस किसान वर्ग में एक बड़ी आबादी किरायेदार किसानों की भी है। इन किरायेदार किसानों को असलियत में किसान नहीं माना जाता है। इस स्थिति में किरायेदार किसानों को कृषि की योजनाएं, भूमि पट्टा, जलवायु परिवर्तन की विभिन्न चुनौतियाँ झेलनी पड़ रहीं हैं। यह विश्लेषण ILDC की कॉन्फ्रेंस के किरायेदार किसानों की चुनौतियों पर आधारित्र सत्रों में निकलकर सामने आया है।

क्या है ILDC?
ILDC (इंडिया लैंड एण्ड डेवलपमेंट कॉन्फ्रेंस) भारत में भूमि शासन, नीति और विकास से जुड़े मुद्दों पर वर्ष 2017 शुरू हुयी। यह कॉन्फ्रेंस भूमि मामलों से संबंधित सरकारी निकाय, नागरिक संगठन, जमीनी कार्यकर्ताओं जैसे विभिन्न हितधारकों को साझा संवाद के लिए सालाना एक मंच प्रदान करती है। वर्ष 2017 से 2025 तक इस कॉन्फ्रेंस में 70 देशों के 3,000 से अधिक प्रतिभागी शामिल हुए हैं। जबकि, 200 से अधिक संस्थानों के सहयोग से 300 से अधिक सत्रों का आयोजन किया जा चुका हैं। बीते वर्ष 2025 में ILDC ने अपनी 9वीं कॉन्फ्रेंस 18 से 20 नवंबर के बीच गुजरात के अहमदाबाद में आयोजित की। जिसमें ‘लैंडस्टैक’ संस्था ने प्रबंधकीय भूमिका निभायी। अहमदाबाद मेनेजमेंट एसोसिएशन (AMA) में सम्पन्न हुयी इस कॉन्फ्रेंस में 23 देशों के 492 प्रतिभागी शामिल हुए। जिसमें 207 महिलायें, 281 पुरुष और 3 अन्य प्रतिभागी थे। वर्ष 2025 की कॉन्फ्रेंस का विषय ‘सतत विकास में भूमि की केन्द्रीय भूमिका: अतीत, वर्तमान और भविष्य से जुड़ी चुनौतियों का समाधान’ था। इस बार की कॉन्फ्रेंस के कार्यक्रमों में 73 विषयगत सत्रों का संचालन हुआ।

जिनमें से कुछ सत्र ‘‘किरायेदारों को सशक्त बनाना, कृषि में परिवर्तन लाना, राज्य सुधारों से सीखे गए सबक,, पर आधारित थे। इन सत्रों में मानस सत्पथी, दीपिका यादव, प्रो जिजू पी अलेक्स, विक्रम प्रताप शर्मा, सरिता नरके जैसे कई वक्ताओं ने अपने विचार प्रस्तुत कर व्याख्यान दिये।

किरायेदार किसानों के अधिकारों को लेकर हुई चर्चा
मानस सत्पथी किरायेदार किसानों के अधिकारों को लेकर चर्चा का सिलसिला अपने वक्तव्य से आरंभ करते हैं। वे PRADAN संगठन से जुड़े रहे हैं। अपने व्याख्यान में वे बयां करते हैं कि, ‘भारतीय कृषि में मौजूद केन्द्रीय विरोधावास की जांच करने की आवश्यकता है। यह विरोधावास कहता है कि, भारतीय खाद्य प्रणाली का लगभग 86 प्रतिशत हिस्सा छोटे किसानों द्वारा पोषित है। जबकि, लगभग 40 प्रतिशत किसान छोटे किसान हैं। वहीं, हमारे सभी उत्पाद छोटे, भूमिहीन या लघु उत्पादको के जरिए आते हैं।

आगे वे जाहिर करते हैं कि, ‘लघु उत्पादक हमारी खाद्य प्रणालियों को बनाए रखते हैं पर वे अदृष्य हैं। किसान नहीं हैं। इसलिए वे व्यवस्था को दिखते नहीं। तब उनके आर्थिक रूप से असुरक्षित होने से खाद्य प्रणाली भी असुरक्षित होगी। आकड़ों के अनुसार आज 17-18 प्रतिशत भूमि किसान कृषि में उपयोग कर रहे हैं। जो सच नहीं है। कई रिपोर्ट में यह आंकड़ा 40 प्रतिशत और तेलंगाना के एक अध्ययन में 35 प्रतिशत है। वहीं, जहां हम काम कर रहे हैं वहाँ 80 प्रतिशत भूमि पर कृषि हो रही है। मगर, किसान को मालिक नहीं माना जाता।

मानस आगे व्यक्त करते हैं कि, ‘जब किसान को मालिक नहीं माना जाता तब कृषि सब्सिडी, बीमा, मुआवजे की समस्याएं आती हैं। वहीं, आकड़ों के अनुसार, वर्ष 2022 के 82 प्रतिशत दिनों में आंधी-तूफान, लू, भीषण गर्मी जैसी घटनाएं देखने मिलीं। इस स्थति में किराएदार किसान ही जलवायु परिवर्तन के संकट से ज्यादा जूझते हैं। इन किसानों के लिए बहु वर्षीय भूमि पट्टा, सार्थक सुरक्षा, कर्ज, सब्सिडी जैसी योजनाओं का लाभ भी दिया जाना चाहिए।

पंजाब के किरायेदार किसानों की संख्या में वृद्धि
दीपिका यादव एक शोधार्थी हैं। उनका अध्ययन पंजाब के किरायेदार किसानों पर है। वे इस अवसर पर दिए व्याख्यान में कहती हैं कि, ‘वर्ष 2002 से 2019 के बीच किरायेदार किसान परिवारों का प्रतिशत 74 प्रतिशत बढ़ा है। जबकि, इस अवधि में क्षेत्रफल के हिसाब से यह प्रतिशत दुगना भी हुआ है। ऐसे में किरायेदार किसानों के निर्णय संबंधी भूमिका सीमित हो रही है। उत्पादन से जुड़े जोखिम, मौसम की मार, कीमत में चढ़ाव-उतार, बाढ़, प्राकृतिक आपदा से किरायेदार किसान पीड़ित हैं।

इसके आगे वे कहती हैं कि, ‘व्यवस्था भी ऐसी है जिसमें किरायदार किसानों को ध्यान में नहीं रखा जा रहा। तभी तो वास्तविक किरायदार किसान सरकारी डेटाबेस में भी शामिल नहीं है। इसलिए भूमि सुधार भी अप्रभावी बना हैं।

दीपिका ने आगे कहा कि, ‘अभी बड़े पैमाने पर लैंड का डिजिटलीकरण हो रहा है। इसमें किरायेदार किसानों को भी शामिल किया जाना चाहिए। ताकि, वास्तविक किरायेदार किसानों की पहचान कर उन्हें स्वीकारना आसान हो जाएगा। जिससे उन्हें भी कृषि योजनाओं से लाभान्वित किया जा सके।

किरायेदार कृषकों को केरल सरकार देती सब्सिडी वित्तीय सहायता
प्रो जिजू पी अलेक्स केरल योजना बोर्ड में कार्यरत रहे हैं। इस अवसर पर उन्होंने भी अपना वक्तव्य दिया। इस दौरान वे कहते हैं कि, ‘किरायेदार कृषकों का मुद्दा बढ़ा मुद्दा रहा है। जिसने कृषकों को हासिए पर धकेल दिया। जिससे कृषि का विकास और जीडीपी प्रभावित हुयी है। इसी ने भूमि सुधार को भी जन्म दिया है।

वे आगे कहते हैं कि, ‘जिन बड़े कृषकों को कृषि में रुचि नहीं, उन्हें अपनी जमीन कुछ साल के पट्टे पर किरायेदार किसानों को देना चाहिए। इससे किरायेदार कृषकों के पास खुद को साबित, विकसित करने और कृषि योजनाओं का लाभ लेने का अच्छा अवसर होगा। वहीं, सरकार ऐसी भूमि खोज कर चिन्हित कर सकती है जो कृषि योग्य हो और उसे किराएदार कृषकों के लिए दिया जा सके।

प्रो जिजू आगे यह भी कहते हैं कि, ‘किरायेदार जैसे छोटे किसानों के लिए केरल सरकार ने वित्तीय सहायता और सब्सिडी देना शुरू कर दिया है। इसके साथ जलवायु परिवर्तन के कारण फसल नुकसान पर भी उचित मुआवजा दिया जा रहा है। छोटे किसानों की भलाई के लिए ऐसे उपाय अन्य सरकारे भी अपना सकती हैं।

'60 से 80 प्रतिशत कृषि कार्य महिलाओं पर निर्भर'
इसके आगे संवाद सत्र में अपने विचार रखती हैं शिवानी गुप्ता। वे वूमानिटी की सीईओ हैं। इस अवसर पर अपने विचार रखते हुए वे जाहिर करती हैं कि, ‘आज कृषि से संबंधित कार्य ज्यादातर महिलायें ही करती हैं। विभिन्न अनुमानों के अनुसार 60 से 80 प्रतिशत कृषि कार्य महिलाओं पर निर्भर है। वहीं, किरायेदार महिला किसानों में देखा जाए तब एक बढ़ा हिस्सा है। यह हिस्सा परिवार के भीतर ही है। जिसमें महिलाओं को किरायेदार किसान की भांति समझकर कार्य करवाया जाता है।

इसके बाद शिवानी कहती हैं कि, ‘परिवारों में किरायेदार जैसा समझकर महिलाओं से काम तो ले लिया जाता है मगर, जब निर्णय लेने की बारी आती है तब पुरुष का हस्तक्षेप होता है। आज जो महिलायें खेती के काम से जुड़ी हैं। उन्हें ही कृषि और भूमि पर अधिकार, योजनाओं का लाभ मिलना चाहिए। ताकि, वे स्वतंत्र किसान बन सकें।

किरायेदायर किसान कौन हैं?
संवाद के आखिर में अपने विचार व्यक्त करते हैं डॉ विनोद अग्रवाल। वे तेलंगाना सरकार में प्रशासनिक पदों पर रहे हैं। वे मानते हैं कि, ‘किरायेदार किसानों का अलग-अलग राज्यों और संदर्भों में पृथक-पृथक अर्थ है। किरायेदायर वह व्यक्ति होता है जो जमीन का मालिक नहीं होता। लेकिन, वह मालिक से जमीन लेकर कृषि करता है।

इसके आगे वे बयां करते हैं कि, ‘जब किरायेदार संरक्षण अधिनियम आए तब जमींदारों के अधिकार सीमित हो गए। जबकि, पहले जमींदारों को पूर्ण अधिकार था। पर धीरे-धीरे उनके अधिकार कम हो गए। देश में अब जमीनदार कम होते जा रहे हैं। कम होने भी चाहिए। अब कुछ ही बड़े जमीनदार हैं। जिनके पास 30 से 50 एकड़ जमीने होती हैं। हाँ मगर, राजनीतिक लोगों के पास अभी भी ज्यादा जमीने हैं।

आगे वे बताते हैं कि, ‘खेतों के अधिकार ऐसे होने चाहिए कि, भूमि मालिकों को आश्वासन मिल सके कि, उनके संचालन का अधिकार बना रहेगा। इसी प्रकार किसान के भूमि स्वामित्व को संरक्षित किया जाना चाहिए। हालांकि, इस विचार से सब सहमत हो यह मुमकिन नहीं।

'किरायेदार किसानों के डिजिटल अधिकार का मुद्दा बना हुआ है'
इसके बाद इस संवाद में अपनी बात रखते हैं विक्रम प्रताप शर्मा। वे माइक्रोसेव कंसल्टिंग के सीनियर मैनेजर हैं। वह कहते हैं कि, ‘आज भूमि के डिजिटल रिकॉर्ड में मालिकों का अधिकार तो सुरक्षित है। मगर, किरायेदार किसानों के डिजिटल अधिकार का मुद्दा बना हुआ है। ये मुद्दा काफी बड़ा है। किरायेदार किसानी जैसी कोई चीज मायने रखती है, ऐसा डिजिटल डेटाबेस कोई उपलब्ध नहीं है।

आगे वे बोलते हैं कि, ‘आज हमारे सामने कई सवाल हैं, जैसे हम किसान को कैसे परिभाषित करें। किरायेदार किसानी को कैसे लागू करें और फिर, उन्हें एजी-टेक प्रणाली में कैसे शामिल करें। क्योंकि, एजी-टेक एक अंतिम दृष्टिकोण होगा, जिससे हम कह पाएंगें कि, एकीकृत प्रणाली है।

फिर, विक्रम बताते हैं कि, ‘एकीकृत प्रणाली में सभी लोग मौजूद होंगे। जैसे किसान, मालिक, किरायेदार किसान। इसके अलावा सरकारी व अन्य संगठन। एकीकृत प्रणाली से कृषि के विभिन्न लाभ और सुविधाएं उपलब्ध करवाने में आसानी होगी।

'महाराष्ट्र में किरायेदार किसान कोई बड़ा और सक्रिय मुद्दा नहीं'
इसके आगे अपनी बात रखती हैं सरिता नरके। वे कास्ट वेलीडिटी कमेटी की प्रेसीडेंट हैं। सरिता किरायेदार किसानों पर बात करते हुए यह कहती हैं कि, ‘महाराष्ट्र में किरायेदार किसान कोई बड़ा और सक्रिय मुद्दा नहीं हैं। क्योंकि, महाराष्ट्र में 1948 से एक अधिनियम था। जिससे अधिकतर किरायेदार किसानों को संरक्षण प्राप्त हुआ। वहीं, अब समाज में किरायेदारी के बारे में साक्षरता के कारण किरायेदार किसानों को अभिलेखों में पंजीकृत नहीं किया जाता।

इसके बाद वे बयां करती हैं कि, ‘महाराष्ट्र की भांति देश के अन्य राज्यों को भी किरायेदार किसानों के अधिकारों को सुरक्षित करना चाहिए। इस स्थिति में ऐसे कानून बनना चाहिये जो किरायेदारी किसानी को मान्यता दे। साथ में यह कानून अमल भी किए जाने चाहिए।

इन सत्रों के संवाद में विभिन्न वक्ताओं के विचारों और अनुभवों ने किसानों, जमींदारों, भूमि, कृषि योजनाओं की स्थिति उजागर की है। साथ में वे खामियाँ पेश की हैं जो किरायेदार किसानों, जीडीपी, कृषि के क्षेत्र को कमजोरी की दिशा में ले जा रहीं हैं। इसके अलावा सबसे महत्वपूर्ण इन विकट परिस्थितियों और कमजोरियों से निपटने के लिए वक्ताओं ने उपाय भी सुझाए। जैसे, वक्ता मानस सत्पथी ने किरायेदार किसानों के लिए भूमि पट्टा, सार्थक सुरक्षा, कर्ज, सब्सिडी जैसी योजना संबंधी उपाय बताए। वहीं, व्यक्ता प्रो जिजू पी अलेक्स ने ये उपाय बताया कि, ‘बड़े कृषकों को यदि कृषि में रुचि नहीं, तब उन्हें अपनी जमीन कुछ साल के पट्टे पर किरायेदार किसानों को देना चाहिए। ताकि, किरायेदार कृषकों को खुद के विकास का मौका मिले। इस तरह के वक्ताओं द्वारा सुझाए गए अन्य उपायों को अपनाया जा सकता है। जिससे कृषि के क्षेत्र और किरायेदार किसानों को संरक्षित कर संभारने का एक मजबूत विकल्प तैयार हो सके।

लेखक का परिचय - सतीश भारतीय मध्यप्रदेश सागर के एक स्वतंत्र पत्रकार हैं। वे मानवाधिकार और पर्यावरण के मुद्दों पर रिपोर्टिंग करते हैं।

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