भारत में सरकारी स्टॉक में रखे चावल से एथेनॉल बनाने का मामला एक बार फिर चर्चा में है। अमेरिका ने भारत से पूछा है कि खाद्य सुरक्षा के लिए खरीदे गए चावल के एक हिस्से को एथेनॉल बनाने के लिए इस्तेमाल करना WTO के नियमों के तहत कैसे सही है। अमेरिका ने भारत से सरकारी चावल के भंडारण, खाद्यान्न वितरण और एथेनॉल कंपनियों को चावल बेचने पर होने वाले खर्च का भी पूरा ब्यौरा मांगा है। यह मामला इसी महीने होने वाली WTO की Agriculture Committee की बैठक में उठ सकता है।
क्यों उठा चावल से एथेनॉल का मुद्दा?
भारत किसानों से धान की सरकारी खरीद करता है और उससे तैयार चावल का बड़ा हिस्सा Food Corporation of India यानी FCI के Central Pool में रखा जाता है। इस चावल का इस्तेमाल राशन और दूसरी खाद्य सुरक्षा योजनाओं में किया जाता है। लेकिन जब सरकारी गोदामों में जरूरत से ज्यादा स्टॉक हो जाता है तो सरकार अतिरिक्त चावल को Open Market Sale Scheme यानी OMSS के जरिए बेच सकती है।
इसी अतिरिक्त चावल का एक हिस्सा एथेनॉल बनाने वाली कंपनियों को भी दिया जा रहा है। अगस्त 2024 में सरकार ने एथेनॉल डिस्टिलरीज को FCI के चावल की नीलामी में फिर से शामिल होने की अनुमति दी थी। इसके बाद 2025 में भी FCI के चावल को एथेनॉल उत्पादन के लिए देने की व्यवस्था बढ़ाई गई।
एथेनॉल के लिए कितना चावल दिया जा रहा है?
सरकार ने Ethanol Supply Year 2024-25 के लिए 52 लाख टन और 2025-26 के लिए भी 52 लाख टन तक अतिरिक्त FCI चावल एथेनॉल उत्पादन के लिए मंजूर किया था।
इसका असर एथेनॉल उत्पादन में भी दिखाई दे रहा है। Petroleum Ministry के आंकड़ों के मुताबिक, 2025-26 में एथेनॉल उत्पादन में FCI के चावल की हिस्सेदारी 24.64% रही, जबकि 2023-24 में यह सिर्फ 0.02% थी। वहीं अगस्त 2026 तक भारत में कुल एथेनॉल सप्लाई में अनाज आधारित कच्चे माल की हिस्सेदारी करीब 70% पहुंच गई थी। इसमें FCI का अतिरिक्त चावल भी बड़ी भूमिका निभा रहा है।
सरकार के पास इतना चावल क्यों है?
इसकी बड़ी वजह सरकारी खरीद और Central Pool में जमा बड़ा स्टॉक है। 28 मई 2026 को Central Pool में करीब 397 लाख टन चावल का स्टॉक था। यह 1 जुलाई के लिए तय 135.40 लाख टन के बफर स्टॉक से काफी ज्यादा था। इसके अलावा करीब 298 लाख टन खरीदा गया धान मिलिंग के लिए भी बाकी था।
सरकार का कहना है कि एथेनॉल के लिए चावल तभी दिया जाता है जब राशन व्यवस्था, National Food Security Act, दूसरी कल्याणकारी योजनाओं और जरूरी बफर स्टॉक की जरूरत पूरी हो जाए।
अमेरिका को किस बात पर आपत्ति है?
अमेरिका का सवाल सिर्फ इस बात पर नहीं है कि चावल से एथेनॉल क्यों बनाया जा रहा है। असल सवाल यह है कि भारत जिस सरकारी चावल खरीद व्यवस्था को खाद्य सुरक्षा के लिए जरूरी बताता है, उसी व्यवस्था के तहत खरीदे गए चावल का इस्तेमाल बाद में औद्योगिक काम यानी एथेनॉल बनाने में कैसे हो रहा है।
अमेरिका ने यह भी सवाल उठाया है कि सरकार अगर किसानों से चावल को तय कीमत पर खरीदती है और बाद में उसका कुछ हिस्सा लागत से कम कीमत पर बेचती है, तो क्या इससे भारत के चावल उत्पादन और अंतरराष्ट्रीय बाजार पर असर पड़ता है। साथ ही अमेरिका ने केंद्र और राज्य सरकारों से जुड़े खर्च का विस्तृत ब्यौरा भी मांगा है।
WTO का 'Peace Clause' क्या है?
यह पूरा मामला WTO के कृषि नियमों से जुड़ा है। WTO के नियमों के तहत विकासशील देशों को कृषि उत्पादों पर कुछ सीमा तक सरकारी सहायता देने की छूट है। इसे 'de minimis' सीमा कहा जाता है। चावल के मामले में भारत की सरकारी सहायता इस तय सीमा से ऊपर जा चुकी है।
ऐसे मामलों में भारत 2013 के Bali Ministerial Decision के तहत मिलने वाले 'Peace Clause' का इस्तेमाल करता है। आसान भाषा में समझें तो यह प्रावधान कुछ शर्तों के साथ भारत जैसे विकासशील देशों को खाद्य सुरक्षा के लिए सरकारी स्टॉक रखने और किसानों से खरीद करने पर WTO की कार्रवाई से सुरक्षा देता है।
लेकिन इस सुरक्षा के साथ कुछ शर्तें भी हैं। इनमें सरकारी स्टॉक की जानकारी देना और यह सुनिश्चित करना शामिल है कि ऐसी व्यवस्था से दूसरे देशों के व्यापार या उनकी खाद्य सुरक्षा पर गलत असर न पड़े।





