किसानों के खेतों तक पानी पहुंचा तो खेती आसान हुई और उत्पादन भी बढ़ा, लेकिन इसके साथ ही खेती में एक बड़ा बदलाव भी आया। कई इलाकों में बाजरा, ज्वार, दाल और तिलहन जैसी फसलें कम होती गईं और किसान धान-गेहूं की खेती तक सीमित होते गए। केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने खेती में इस बदलाव को लेकर चिंता जताई है।
पानी आया, फसलें बदलीं
दिल्ली में चल रही तीन दिवसीय ड्रायलैंड कांग्रेस में शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि जब वह मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री थे, तब सिंचाई बढ़ाने के लिए बांध और नहरें बनवाई गईं और ज्यादा खेतों तक पानी पहुंचाया गया।
लेकिन पानी आने के बाद खेती का तरीका भी बदल गया। उन्होंने कहा कि पहले जहां बाजरा, दालें और तिलहन जैसी कई फसलें उगाई जाती थीं, वहीं अब कई जगह धान के बाद गेहूं की खेती होने लगी है। पानी उपलब्ध हो तो गर्मी में मूंग की फसल भी ली जाती है।
पहले कई फसलें होती थीं
शिवराज ने कहा कि पहले खेती बारिश पर ज्यादा निर्भर थी, लेकिन खेतों में सिर्फ गेहूं और धान नहीं उगाए जाते थे। किसान चना, मसूर, मटर, अलसी, तिल, मूंग और उड़द जैसी कई फसलें उगाते थे।
उनके मुताबिक, पहले से ही किसानों की सोच थी कि खेत में एक ही फसल पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। यानी फसल विविधता हमारी खेती का हिस्सा रही है।
ज्वार-बाजरा भी घटा
उन्होंने कहा कि पहले गांवों में ज्वार और बाजरे की रोटी आम बात थी। गेहूं की रोटी तो कई जगह मेहमानों के आने पर ही बनती थी। लेकिन धीरे-धीरे बारिश पर आधारित खेती कम हुई और इन फसलों की खेती भी घटती चली गई।
शिवराज ने कहा कि सूखे और कम पानी वाले इलाकों में दालें, तिलहन और मोटे अनाज अच्छी तरह उगते हैं। देश के करीब 85 से 87 फीसदी मोटे अनाज, दालें और तिलहन ऐसे ही इलाकों में पैदा होते हैं।
पशुपालन पर भी असर
उन्होंने खेती में बढ़ते मशीनीकरण और ट्रैक्टरों के इस्तेमाल से पशुपालन पर पड़े असर की बात भी कही। उनके मुताबिक, पहले किसान के पास कितने बैल हैं, इससे उसकी हैसियत का अंदाजा लगाया जाता था। लेकिन मशीनों के बढ़ते इस्तेमाल के साथ पशुओं की संख्या कम होती गई और आवारा पशुओं की समस्या बढ़ गई।
किसानों की आय बढ़ाना जरूरी
कृषि मंत्री ने कहा कि सरकार का लक्ष्य सिर्फ उत्पादन बढ़ाना नहीं है। इसके साथ खाद्य और पोषण सुरक्षा और किसानों की आय बढ़ाना भी जरूरी है।
इसके लिए उत्पादन बढ़ाने, खेती की लागत कम करने, फसल का सही दाम दिलाने और नुकसान होने पर किसानों को मदद देने पर काम किया जा रहा है। साथ ही अब फसल विविधता पर भी जोर दिया जा रहा है।
सूखी जमीन कमजोरी नहीं
शिवराज ने सूखे और कम पानी वाले इलाकों की मिट्टी में घटते जैविक कार्बन पर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि सूखी जमीन भारत की कमजोरी नहीं है। अगर इन इलाकों में सही तकनीक, सही नीतियां और बाजार की सुविधा मिले तो यही जमीन देश की बड़ी ताकत बन सकती है।
उन्होंने भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) से भी सूखे इलाकों की खेती पर खास ध्यान देने को कहा।





