नेपाल की विनाशकारी बाढ़ में बड़ी संख्या में लोगों की जान जाने के बाद अब राहत और बचाव के साथ मृतकों की पहचान का काम भी बेहद अहम हो गया है। कई शवों की हालत ऐसी है कि उन्हें देखकर तुरंत पहचान पाना मुश्किल हो सकता है। ऐसे में शवों को सुरक्षित रखकर वैज्ञानिक तरीके से उनकी पहचान की जा रही है।

नेपाल बाढ़ में शवों की पहचान कैसे हो रही है?
नेपाल में बरामद किए जा रहे शवों को अंतरराष्ट्रीय Disaster Victim Identification (DVI) प्रक्रिया के तहत रिकॉर्ड किया जा रहा है। हर शव को एक अलग कोड नंबर दिया जाता है। इसके बाद उसकी तस्वीर, कपड़े, शरीर पर मौजूद पहचान के निशान और दूसरी जरूरी जानकारियां दर्ज की जाती हैं। जहां संभव हो, फिंगरप्रिंट और DNA सैंपल भी लिए जाते हैं।

इसका मकसद यह है कि अगर शव की तुरंत पहचान नहीं हो पाती है, तो उसे सुरक्षित रिकॉर्ड के आधार पर बाद में भी पहचाना जा सके।

दूसरी तरफ, जिन लोगों के परिवार के सदस्य बाढ़ के बाद लापता हैं, उनके बारे में भी जानकारी जुटाई जाती है। परिवार से फोटो, मेडिकल या डेंटल रिकॉर्ड और पहचान से जुड़ी दूसरी जानकारी ली जा सकती है। जरूरत पड़ने पर परिवार के सदस्यों के DNA सैंपल से भी मिलान किया जाता है।

इसके बाद शव से मिले फिंगरप्रिंट, DNA, दांतों के रिकॉर्ड और पहचान संबंधी दूसरी जानकारियों का लापता लोगों के रिकॉर्ड से मिलान किया जाता है। जब वैज्ञानिक तौर पर पहचान की पुष्टि हो जाती है, तभी शव परिवार को सौंपने की प्रक्रिया आगे बढ़ती है।

INTERPOL की Disaster Victim Identification (DVI) प्रक्रिया के अनुसार, बड़े हादसों और प्राकृतिक आपदाओं में मृतकों की पहचान के लिए शवों से जुटाए गए Post-Mortem डेटा और लापता लोगों से जुटाए गए Ante-Mortem डेटा का मिलान किया जाता है।
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