नेपाल के रसुवा जिले में 26 अगस्त 2026 को आई अचानक बाढ़ ने हिमालयी क्षेत्रों में बढ़ते प्राकृतिक खतरों की चिंता एक बार फिर बढ़ा दी है। कुछ ही मिनटों में पहाड़ का बड़ा हिस्सा टूटकर नीचे गिरा और उसके साथ बर्फ, चट्टान और मलबे का तेज बहाव नदी तक पहुंच गया। वैज्ञानिकों के मुताबिक, यह घटना सामान्य ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) यानी ग्लेशियर झील के अचानक फटने की वजह से नहीं हुई, बल्कि बर्फ और चट्टानों के बड़े हिस्से के अचानक टूटकर नीचे गिरने यानी आइस-रॉक एवलांच के कारण हुई।
वैज्ञानिकों ने सैटेलाइट तस्वीरों, भूकंपीय संकेतों, वीडियो, मौसम और जलवायु से जुड़े आंकड़ों तथा वैज्ञानिक मॉडलों का अध्ययन करने के बाद यह आकलन किया है। हालांकि, इस घटना की पूरी प्रक्रिया और इसमें लंबे समय से हो रहे जलवायु बदलाव, पर्माफ्रॉस्ट के पिघलने और पहाड़ी ढलानों के कमजोर होने की भूमिका को अभी और समझा जा रहा है।
कुछ ही मिनटों में पहाड़ का मलबा बना बाढ़
अंतरराष्ट्रीय पर्वतीय संस्था ICIMOD के मुताबिक, यह घटना 26 अगस्त को सुबह करीब 8:37 बजे नेपाल के समय हुई। जिस जगह से बर्फ और चट्टान का बड़ा हिस्सा टूटा, उसकी ऊंचाई करीब 5,200 मीटर थी। यह मलबा करीब 1,200 मीटर नीचे घाटी में गिरा। इस दौरान 5.2 तीव्रता का भूकंपीय संकेत भी दर्ज किया गया।
पहाड़ से गिरा बर्फ और चट्टानों का मलबा कुछ ही मिनटों में तेज बहाव में बदल गया और नीचे की ओर बढ़ते हुए भोटेकोशी नदी तक पहुंच गया। इसके बाद इलाके में अचानक बाढ़ जैसे हालात पैदा हो गए।
शुरुआती जानकारी में बांध टूटने की आशंका भी जताई गई थी, लेकिन उपलब्ध आकलन के मुताबिक यह बाढ़ किसी कृत्रिम बांध के टूटने से नहीं आई थी। इसका मुख्य कारण पहाड़ से बर्फ और चट्टानों के बड़े हिस्से का टूटना और उसके बाद बना मलबे का तेज बहाव था।
इस घटना में चेतावनी देने का समय ही नहीं मिला
इस घटना की सबसे बड़ी चिंता यह है कि इसके बारे में पहले से चेतावनी देने का लगभग कोई समय नहीं था। आमतौर पर बाढ़ या ग्लेशियल झील से जुड़े खतरों में पानी का स्तर बढ़ने जैसी गतिविधियों पर नजर रखकर कुछ समय पहले चेतावनी दी जा सकती है।
लेकिन आइस-रॉक एवलांच अलग तरह का खतरा है। यह किसी अस्थिर पहाड़ी ढलान, ग्लेशियर या जमीन के अंदर मौजूद कमजोर हिस्से से अचानक शुरू हो सकता है। कई बार ऐसी जगहें सैटेलाइट तस्वीरों में भी साफ दिखाई नहीं देतीं।
ICIMOD के सीनियर क्रायोस्फियर विशेषज्ञ डॉ. फारूक आजम के मुताबिक, यह एक असामान्य और अचानक होने वाली घटना थी, जिसे पारंपरिक चेतावनी प्रणालियों से पकड़ना बेहद मुश्किल है। उनके अनुसार, ऐसी घटनाओं में यह पता लगाना ही चुनौती है कि पहाड़ का कौन सा हिस्सा और किस समय टूट सकता है।
सिर्फ अर्ली वार्निंग सिस्टम काफी नहीं
रसुवा की घटना ने यह सवाल भी खड़ा किया है कि हिमालयी इलाकों को ऐसे खतरों से कैसे बचाया जाए। विशेषज्ञों का कहना है कि केवल अर्ली वार्निंग सिस्टम बनाना पर्याप्त नहीं होगा।
जहां पहले से खतरे का अनुमान लगाया जा सकता है, वहां चेतावनी देकर लोगों की जान बचाई जा सकती है। लेकिन अगर कोई पहाड़ी हिस्सा अचानक टूटकर नदी में गिरता है, तो चेतावनी मिलने के बावजूद सड़क, पुल, बिजली परियोजना या दूसरी इमारतों को नुकसान से बचाना मुश्किल हो सकता है।
इसलिए विशेषज्ञों का जोर पहले से तैयारी करने, सुरक्षित जगहों पर निर्माण करने और स्थानीय लोगों को ऐसे खतरों के बारे में जागरूक करने पर है।
हिमालय में बढ़ रहा है जलवायु बदलाव का असर
हिमालय दुनिया के सबसे संवेदनशील पर्वतीय क्षेत्रों में से एक है। पिछले कुछ दशकों में यहां ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं और बर्फ की मात्रा कम हो रही है।
ICIMOD की 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक, हिंदू कुश हिमालय क्षेत्र के ग्लेशियरों में वर्ष 2000 के बाद बर्फ और ग्लेशियर के पिघलने की रफ्तार काफी बढ़ी है। करीब 50 साल के आंकड़ों में लगभग 89 प्रतिशत वर्षों में ग्लेशियरों का मास बैलेंस नकारात्मक रहा है। आसान भाषा में कहें तो ज्यादातर वर्षों में ग्लेशियर जितनी बर्फ जमा कर रहे हैं, उससे ज्यादा बर्फ खो रहे हैं।
हिमालय में 21वीं सदी के दौरान तापमान बढ़ने की रफ्तार भी काफी ज्यादा रही है। अलग-अलग क्षेत्रों में तापमान में करीब 0.15 से 0.60 डिग्री सेल्सियस प्रति दशक की बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
ग्लेशियर पिघलने से बढ़ रहा है कई तरह का खतरा
ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने का असर सिर्फ बर्फ तक सीमित नहीं है। इससे पहाड़ों में ग्लेशियल झीलों का आकार बढ़ सकता है और उनके अचानक फटने का खतरा बढ़ सकता है।
इसके अलावा बर्फ और ग्लेशियर कम होने से नीचे के इलाकों में पानी की उपलब्धता पर भी असर पड़ सकता है। हिमालय से निकलने वाली नदियों पर भारत, नेपाल, भूटान, बांग्लादेश, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, चीन और म्यांमार समेत कई देशों की बड़ी आबादी निर्भर है।
इसलिए हिमालय में होने वाला बदलाव करोड़ों लोगों के पानी, खेती और आजीविका से जुड़ा हुआ है।
ब्लैक कार्बन भी बढ़ा रहा है गर्मी
हिमालय में बढ़ते तापमान के पीछे सिर्फ वैश्विक तापमान वृद्धि ही जिम्मेदार नहीं है। ब्लैक कार्बन यानी ईंधन और बायोमास जलने से निकलने वाले बेहद छोटे काले कण भी बर्फ और ग्लेशियरों को प्रभावित कर रहे हैं।
Climate Trends के एक अध्ययन के मुताबिक, हिमालय में 2000-09 की तुलना में 2010-19 के दौरान ब्लैक कार्बन की मात्रा करीब 7.74 प्रतिशत बढ़ी। इसका असर खास तौर पर पूर्वी और मध्य हिमालय में देखा गया है।
जब ब्लैक कार्बन बर्फ की सतह पर जमा होता है तो बर्फ की सफेदी कम हो जाती है। इससे बर्फ सूर्य की गर्मी को ज्यादा सोखती है और तेजी से गर्म होने लगती है। अध्ययन के मुताबिक, हिमालय में बर्फ की सतह का औसत तापमान 2000-09 में करीब -11.27 डिग्री सेल्सियस था, जो 2020-23 में बढ़कर करीब -7.13 डिग्री सेल्सियस हो गया।
इसका सीधा असर बर्फ के पिघलने की रफ्तार पर पड़ सकता है।
पर्माफ्रॉस्ट पिघलने से पहाड़ कमजोर हो रहे हैं
हिमालयी क्षेत्र में एक और बड़ी चिंता पर्माफ्रॉस्ट की है। पर्माफ्रॉस्ट जमीन की वह परत होती है जो लंबे समय तक जमी रहती है। तापमान बढ़ने के कारण अब ऊंचाई वाले इलाकों में यह जमी हुई जमीन भी पिघल रही है।
इसके पिघलने से पहाड़ी ढलान अस्थिर हो सकते हैं और भूस्खलन, मिट्टी का कटाव और चट्टानों के टूटने का खतरा बढ़ सकता है। इसका असर सड़कों, पुलों, रेलवे, बिजली परियोजनाओं और दूसरी पहाड़ी संरचनाओं पर भी पड़ सकता है।
यानी जलवायु बदलाव सिर्फ ग्लेशियरों को नहीं पिघला रहा, बल्कि पहाड़ों की स्थिरता को भी प्रभावित कर रहा है।
आगे और गर्म हो सकता है हिमालय
वैज्ञानिक अध्ययनों के मुताबिक, आने वाले दशकों में हिंदू कुश हिमालय क्षेत्र का तापमान वैश्विक औसत से ज्यादा तेजी से बढ़ सकता है। अलग-अलग जलवायु परिस्थितियों के आधार पर इस सदी के अंत तक तापमान में करीब 2 से 5 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ोतरी का अनुमान लगाया गया है।
अगर ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन ज्यादा बना रहता है तो 2100 तक हिमालयी ग्लेशियरों के मौजूदा बर्फ भंडार का 60 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा खत्म होने का अनुमान कुछ अध्ययनों में लगाया गया है। कम उत्सर्जन वाले परिदृश्यों में भी ग्लेशियरों को बड़ा नुकसान होने की आशंका है।
अब क्या करने की जरूरत है?
विशेषज्ञों के मुताबिक, हिमालयी इलाकों में अचानक आने वाले खतरों से निपटने के लिए तीन बातों पर सबसे ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है।
पहली, सुरक्षित जगह पर निर्माण। नदियों के किनारे, नदी के पुराने रास्तों और अस्थिर पहाड़ी ढलानों पर निर्माण को लेकर सख्त नियम जरूरी हैं।
दूसरी, बुनियादी ढांचे की लंबी अवधि की सुरक्षा। सड़क, पुल, हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट और दूसरी परियोजनाएं बनाते समय सिर्फ वर्तमान पर्यावरण का आकलन नहीं, बल्कि अगले कई दशकों में बदलते तापमान, ग्लेशियर और पहाड़ों की स्थिति का भी आकलन करना होगा।
तीसरी, स्थानीय और पारंपरिक ज्ञान का इस्तेमाल। पुराने समय में पहाड़ी इलाकों में रहने वाले समुदाय अक्सर नदी के किनारे और निचले इलाकों से दूर ऊंची जगहों पर बसते थे। आधुनिक निर्माण के दौरान कई जगहों पर इस तरह की प्राकृतिक सुरक्षा को नजरअंदाज किया गया है। अब स्थानीय लोगों के पारंपरिक ज्ञान को आपदा प्रबंधन और जमीन के इस्तेमाल की योजना में शामिल करने की जरूरत है।
नेपाल की घटना पूरे हिमालय के लिए चेतावनी
रसुवा की घटना सिर्फ नेपाल तक सीमित चिंता नहीं है। हिंदू कुश हिमालय भारत समेत कई देशों तक फैला हुआ है। इसलिए यहां होने वाले जलवायु और पर्यावरणीय बदलाव का असर सीमा के पार भी पड़ सकता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि हिमालय को सिर्फ पर्यटन और प्राकृतिक सुंदरता के नजरिए से देखने के बजाय जलवायु संकट के सबसे संवेदनशील क्षेत्रों में से एक के रूप में देखना होगा। देशों के बीच मिलकर ग्लेशियरों की निगरानी, मौसम और आपदा से जुड़ी जानकारी साझा करने, जोखिम वाले इलाकों की पहचान करने और जलवायु अनुकूलन की तैयारी को मजबूत करना जरूरी है।
रसुवा की अचानक आई बाढ़ ने एक बात साफ कर दी है कि हिमालय में खतरे अब सिर्फ ग्लेशियल झीलों या सामान्य बाढ़ तक सीमित नहीं हैं। ग्लेशियर पिघलना, पर्माफ्रॉस्ट का कमजोर होना, पहाड़ी ढलानों का अस्थिर होना और अचानक बर्फ-चट्टान का टूटना, ये सभी खतरे एक-दूसरे से जुड़े हो सकते हैं। ऐसे में भविष्य की तैयारी केवल चेतावनी देने तक नहीं, बल्कि सुरक्षित विकास और मजबूत आपदा तैयारी तक पहुंचानी होगी।
देखिए ग्राउंड रिपोर्ट-





