देश में प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिए केंद्र सरकार द्वारा चलाए जा रहे राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन (NMNF) से अब तक 20.92 लाख (20,92,165) से अधिक किसान जुड़ चुके हैं। वहीं 10.32 लाख हेक्टेयर से ज्यादा क्षेत्र में प्राकृतिक खेती शुरू हो चुकी है। यह जानकारी कृषि एवं किसान कल्याण राज्य मंत्री रामनाथ ठाकुर ने राज्यसभा में एक लिखित जवाब में दी।
देशभर में बने 18,893 क्लस्टर
प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिए अब तक 18,893 क्लस्टर बनाए गए हैं। इन क्लस्टरों के माध्यम से किसानों को प्राकृतिक खेती अपनाने के लिए प्रशिक्षण और तकनीकी सहायता दी जा रही है।
आंध्र प्रदेश सबसे आगे
सरकार के आंकड़ों के अनुसार, प्राकृतिक खेती मिशन में आंध्र प्रदेश सबसे आगे है।
सबसे ज्यादा क्लस्टर:
- आंध्र प्रदेश – 5,002
- राजस्थान – 2,380
- उत्तर प्रदेश – 1,857
- मध्य प्रदेश – 1,805
- महाराष्ट्र – 1,711
सबसे ज्यादा पंजीकृत किसान:
- आंध्र प्रदेश – 6,50,163
- उत्तर प्रदेश – 2.30 लाख
- राजस्थान – 2.12 लाख
- मध्य प्रदेश – 1.67 लाख
- महाराष्ट्र – 1.43 लाख
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10.32 लाख हेक्टेयर में हो रही प्राकृतिक खेती
देशभर में अब तक 10,32,116.452 हेक्टेयर क्षेत्र प्राकृतिक खेती के दायरे में आ चुका है।
राज्यों के अनुसार प्रमुख क्षेत्र:
- आंध्र प्रदेश – 4,25,912.564 हेक्टेयर
- राजस्थान – 91,165.58 हेक्टेयर
- मध्य प्रदेश – 90,902.256 हेक्टेयर
- उत्तर प्रदेश – 83,166.90 हेक्टेयर
- कर्नाटक – 54,456.80 हेक्टेयर
33 हजार से ज्यादा कृषि सखियों को मिला प्रशिक्षण
मिशन के प्रभावी संचालन के लिए सरकार ने 527 कृषि विज्ञान केंद्र (KVK), 76 कृषि विश्वविद्यालय और 194 स्थानीय प्राकृतिक कृषि संस्थानों को इससे जोड़ा है। इसके अलावा 18 प्राकृतिक कृषि उत्कृष्टता केंद्र भी स्थापित किए गए हैं।
सरकार ने बताया कि अब तक 33,257 कृषि सखियों और सामुदायिक संसाधन व्यक्तियों (CRPs) को प्राकृतिक खेती का प्रशिक्षण दिया जा चुका है। ये प्रशिक्षित कार्यकर्ता गांव-गांव जाकर किसानों को प्राकृतिक खेती अपनाने के लिए मार्गदर्शन दे रहे हैं।
नवंबर 2024 में शुरू हुआ था मिशन
केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 25 नवंबर 2024 को राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन को मंजूरी दी थी। इस योजना का उद्देश्य देशभर में रसायन मुक्त और कम लागत वाली प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देना है। सरकार के मुताबिक इससे मिट्टी की सेहत सुधरती है, प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण होता है, खेती की लागत कम होती है और जलवायु परिवर्तन के असर से निपटने में भी मदद मिलती है।





