“कुछ भी बेकार नहीं होता…” किसी ने सही ही कहा है। अगर किसी चीज के बारे में सही से सोचा-समझा जाए, तो उससे भी कुछ न कुछ उपयोगी जरूर बनाया जा सकता है। नारियल को ही ले लीजिए। कच्चे नारियल का पानी और गूदा खाने-पीने के काम आता है। पकने और सूखने के बाद इससे तेल और कई तरह के खाद्य उत्पाद तैयार किए जाते हैं। लेकिन इसके ऊपर का छिलका, जिसे कॉयर कहा जाता है, हम अक्सर बेकार समझकर फेंक देते हैं। जबकि इसी कॉयर से चटाई, रस्सी और हस्तशिल्प से लेकर जैव-उर्वरक और पर्यावरण-अनुकूल पैकेजिंग तक कई तरह के उत्पाद तैयार किए जा रहे हैं।
आंध्र प्रदेश के पूर्वी गोदावरी जिले के कडियाम की अल्लम गौथमी ने कॉयर और कॉयर वेस्ट से अपना कारोबार शुरू किया। उन्होंने धवलेश्वरम स्थित कॉयर बोर्ड के प्रशिक्षण केंद्र से ट्रेनिंग ली। इसके बाद 2024-25 में करीब 10 लाख रुपये की लागत से एडिगो कॉयर प्रोडक्ट्स नाम से यूनिट शुरू की। इसके लिए उन्हें 6.50 लाख रुपये का बैंक लोन और प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम (PMEGP) के तहत मदद मिली।
उनकी यूनिट में पर्यावरण-अनुकूल दरवाजे की चटाई, रस्सियां, सजावटी गुड़िया और दूसरे हस्तशिल्प तैयार किए जाते हैं। आज इस कारोबार से करीब 35 लाख रुपये का सालाना टर्नओवर हो रहा है और लगभग 10 लाख रुपये का मुनाफा बताया गया है। यूनिट में छह महिलाओं को सीधे रोजगार भी मिला है।
गौथमी ने करीब 120 महिलाओं को कॉयर चटाई बुनने, रस्सी बनाने और हस्तशिल्प तैयार करने की ट्रेनिंग भी दी है। उनकी पहल से आसपास के इलाकों में करीब पांच और कॉयर यूनिट शुरू हुई हैं।
कॉयर पिथ से बना रहे जैव-उर्वरक
केरल के कोझिकोड के पी. सुरेंद्रन ने कॉयर पिथ यानी नारियल के रेशे से बचने वाले बारीक अवशेष को कारोबार में बदलने की कोशिश की। उन्होंने नवंबर 2024 में संपूर्ण प्लस एग्रो फर्टिलाइजर एंटरप्राइजेज शुरू किया।
कॉयर बोर्ड और केंद्रीय कॉयर अनुसंधान संस्थान (CCRI) से ट्रेनिंग और तकनीकी मदद लेने के बाद उन्होंने कॉयर पिथ से जैव-उर्वरक बनाना शुरू किया। यह मिट्टी की उर्वरता और उसमें नमी बनाए रखने में मदद करता है।
सिर्फ एक साल में उनकी यूनिट से 20 टन से ज्यादा जैव-उर्वरक की बिक्री हुई और करीब 500 ग्राहक जुड़े। इस दौरान कारोबार करीब 13 लाख रुपये रहा, जबकि वित्त वर्ष 2024-25 में करीब 4 लाख रुपये का मुनाफा हुआ। यूनिट में पांच लोग काम करते हैं, जिनमें दो महिलाएं हैं।
छिलकों से कोकोपिट और Coir Rope का कारोबार
नारियल के कचरे से लाखों की कमाई करने वालों में दापोली, महाराष्ट्र के श्रवण डांडेकर भी शामिल हैं। उन्होंने फेंके जाने वाले नारियल के छिलकों से अजरालय एग्रो इंडस्ट्रीज नाम का एक शानदार बिजनेस खड़ा किया है। यहां नारियल के छिलकों से कोकोपिट और Coir Rope तैयार की जाती है।
इस वीडियो में श्रवण डांडेकर ने बताया कि इस बिजनेस को शुरू करने में शुरुआत में कितनी लागत लगी, यूनिट लगाने के लिए कहां से मदद मिली और नारियल के छिलकों से किस तरह कमाई की जा सकती है।
अगर आप कृषि आधारित लघु उद्योग, कोकोपिट बिजनेस या नारियल प्रोसेसिंग यूनिट शुरू करने की सोच रहे हैं, तो यह वीडियो आपके लिए काफी उपयोगी हो सकता है।
भारत में कॉयर का बड़ा कारोबार
भारत दुनिया का सबसे बड़ा कॉयर उत्पादक देश है। वैश्विक कॉयर रेशा उत्पादन में भारत की हिस्सेदारी 80 फीसदी से ज्यादा है। देश में कॉयर उद्योग का पुराना इतिहास है। इसकी संगठित शुरुआत 1859 में केरल के अलाप्पुझा में पहली कॉयर फैक्ट्री से हुई थी।
कॉयर उद्योग ग्रामीण रोजगार से भी जुड़ा हुआ है। रेशा निकालने और उसकी कताई के काम से जुड़े लोगों में करीब 80 फीसदी महिलाएं हैं। यानी कॉयर का कारोबार नारियल किसानों से लेकर कारीगरों, छोटे उद्यमियों, निर्माताओं और निर्यातकों तक कई लोगों को रोजगार देता है।
रेशे से बन रहे कई उत्पाद
नारियल के रेशे से सिर्फ रस्सी और चटाई ही नहीं बनाई जाती। इसकी Processing और बेहतर डिजाइन के जरिए कई तरह के उत्पाद तैयार किए जा रहे हैं, जैसे चटाई और दरवाजे की चटाई, रस्सी और सूत, ब्रश और घरेलू सामान, सजावटी सामान और हस्तशिल्प, बागवानी से जुड़े उत्पाद, पर्यावरण-अनुकूल पैकेजिंग। कॉयर क्षेत्र को बढ़ावा देने में कॉयर बोर्ड भी काम कर रहा है। इसके तहत तकनीक, रिसर्च, कौशल विकास, महिला प्रशिक्षण, बाजार और निर्यात से जुड़ी मदद दी जाती है।
प्लास्टिक के विकल्प पर भी काम
कॉयर से जुड़े नए उत्पादों पर भी काम हो रहा है। केंद्रीय कॉयर अनुसंधान संस्थान ने HDPE प्लास्टिक कप के विकल्प के तौर पर पर्यावरण-अनुकूल कॉयर रेल व्हील एक्सल पैकेजिंग कप तैयार किए हैं।
यानी नारियल की भूसी से निकलने वाला कॉयर अब सिर्फ चटाई और रस्सी तक सीमित नहीं है। सही ट्रेनिंग, तकनीक और बाजार मिले तो यही कॉयर छोटे कारोबार, रोजगार और ग्रामीण आय का बड़ा जरिया बन सकता है।





