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एग्री बुलेटिन

बिना ड्राइवर का ट्रैक्टर लेकिन फायदे हज़ार

वो ज़माना तो लगभग जा ही चुका है जब बैलों के जरिए खेती होती थी लेकिन लग रहा है कि अब ट्रैक्टर चलाने के लिए ड्राइवर की भी ज़रूरत खत्म होने वाली है और टेक्नोलॉजी खेती में नए नए अध्याय जोड़ रही है. महाराष्ट्

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Rohit· Correspondent

29 जून 2024· 4 min read

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बिना ड्राइवर का ट्रैक्टर लेकिन फायदे हज़ार

बिना ड्राइवर का ट्रैक्टर लेकिन फायदे हज़ार

तकनीक जिस तेजी के साथ आगे बढ़ रही है, इंसानों की आसानी बढ़ती जा रही है. कई सारे काम अब मशीनें बिना इंसानी मदद के भी कर ले रही हैं. इसी का एक उदाहरण बिना ड्राइवर के चलने वाली कारें हैं, इनके बारे में तो आपने सुन ही लिया होगा. आज सुनिए उस ट्रैक्टर के बारे में जो बिना ड्राइवर के चल रहा है और खेती- किसानी के कामों में आसानी भी लेकर आया है.

ऐसा मुमकिन बनाया है महाराष्ट्र के अकोला में रहने वाले किसान विजेंद्र वरोकार ने. विजेंद्र वरोकार ने अपने ट्रैक्टर मे एक ऐसी जर्मन तकनीक का इस्तेमाल किया है कि उनका ट्रैक्टर ड्राइवर रहित हो गया है. यह ट्रैक्टर बगैर किसी इंसान के खुद ही खेत की जुताई कर सकता है. इसके अलावा जुताई के साठ साथ यह बीजों की बुवाई में भी सक्षम है. राजू वरोकर इस तकनीक के सहारे भले ही राहत की सांस ले रहे हैं लेकिन उनके इलाके भर के किसानों के लिए ये ट्रैक्टर पर्याप्त विस्मय का विषय बना हुआ है. पूरे महाराष्ट्र भर से लोग उनकी इस अद्भुत ट्रैक्टर को देखने आ रहे हैं.
न्यूज पोटली से बातचीत में वरोकार ने बताया

‘’ जब भी फसलों को बोने का सीजन आता था, हमेशा हमारे साथ ये समस्या होती थी कि हम एक सीध में फसलों की बुवाई कैसे करें. अब इंसान अगर ट्रैक्टर चला रहा है तो वो लगातार तो एक सीध में ट्रैक्टर नहीं ही चला सकता. ये चीज इतनी दिक्कत देती कि बीज का बहुत नुकसान हो जाता था. इसी परेशानी से उबरने के लिए मैंने यूट्यूब पर,गूगल पर फ़ॉरेन तकनीकों के बारे में सर्च किया. वहीं पर मुझे इस तकनीक की जानकारी हुई. अभी मैंने इसका सोयाबीन की बुवाई में इस्तेमाल किया है और मेरी बहुत सी मेहनत बच गई और नुकसान होने से बच गया’’

विजेंद्र वरोकार

कैसे काम करती है ये तकनीक?

इस ट्रैक्टर में जर्मन तकनीक 'आरटीके' उपकरण लगाया गया है. इस डिवाइस को खेत के एक तरफ रखना होगा. डिवाइस को 'जीपीएस कनेक्ट' के जरिए ट्रैक्टर से जोड़ा जाता है. अच्छी बात ये है कि ड्राइवर रहित ट्रैकटर को इस तकनीक के सहारे कंट्रोल करना भी काफी आसान है क्योंकि इसमें ऑटो पायलट सोविंग टेक्नोलॉजी लगी हुई है. इसके सहारे दूर खड़े हो कर भी ट्रैक्टर का कंट्रोल सम्हाला जा सकता है.
अभी की जानकारी के अनुसार इस तकनीक का कुल खर्चा साढ़े चार से पाँच लाख का है. हालांकि सुगबुगाहट यह भी है की कृषि विभाग भविष्य में इस प्रयोग के माध्यम से किसानों को मशीनों की मदद से बुवाई करने के लिए प्रेरित करने की तैयारी में है. अगर ऐसा हुआ तो इस तकनीक तक किसानों की पहुँच और आसान बनेगी.

सुनिए वीरेंद्र वरोकार की पूरी कहानी, न्यूजपोटली के यूट्यूब चैनल पर

वरोकार ने आगे की बातचीत में कहा कि अभी हमने जिस तरह इसका इस्तेमाल किया है,वह इसका आधा हिस्सा भी नहीं है. अभी यह शुरुआत है. यह तकनीक इससे बहुत आगे का भी काम कर सकती है. जिस तरह एक ड्राइवर ट्रैक्टर चला सकता है यानी पीछे करना, ट्रैक्टर को मोड़ना – वह सब ये तकनीक कर सकती है. न्यूज पोटली ने जब उनसे पूछा कि ये तकनीक बड़े किसानों के लिए ज्यादा फायदेमंद है या छोटे किसानों के लिए? इस पर वरोकार का कहना था कि तकनीक तो किसी भी तरह के किसानों के लिए सहायक होगी, लेकिन इसकी शर्त यही है कि छोटे किसानों तक इस तकनीक की उपलब्धता हो उसके लिए उन्हें सरकारी मदद की ज़रूरत चाहिए होगी. बिना सरकारी मदद के छोटे किसान चार से पाँच लाख रुपए कीमत वाली ये तकनीक किस तरह लगा पाएंगे?
अंततः वरोकार ने कहा कि जिस तरह से खेती के लिए लोग मिलने मुश्किल हो रहे हैं, मौसमी मार की वजह से चुनौतियाँ बढ़ रही हैं, हम लोगों को खेती के लिए अब तकनीक का सहारा लेना ही होगा क्योंकि और कोई विकल्प ही नहीं है.

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