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सस्ती होने से यूरिया किसानों की पहली पसंद, बिक्री बढ़ी लेकिन उत्पादन घटा

अप्रैल से दिसंबर 2025 के बीच यूरिया की बिक्री 3.8 प्रतिशत बढ़ी, जबकि देश में इसका उत्पादन घटा, जिससे आयात में बड़ी बढ़ोतरी हुई। सस्ती कीमत के कारण यूरिया किसानों की पहली पसंद बना हुआ है। डीएपी और अन्य

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Pooja Rai·Correspondent·29 Jan 2026· 3 min read

सस्ती होने से यूरिया किसानों की पहली पसंद, बिक्री बढ़ी लेकिन उत्पादन घटा

सस्ती होने से यूरिया किसानों की पहली पसंद, बिक्री बढ़ी लेकिन उत्पादन घटा

अप्रैल से दिसंबर 2025 के बीच यूरिया की बिक्री 3.8 प्रतिशत बढ़ी, जबकि देश में इसका उत्पादन घटा, जिससे आयात में बड़ी बढ़ोतरी हुई। सस्ती कीमत के कारण यूरिया किसानों की पहली पसंद बना हुआ है। डीएपी और अन्य खादों में उत्पादन-आयात का संतुलन बदला है। एफएआई के मुताबिक अब सरकार और उद्योग संतुलित खाद उपयोग पर ज्यादा जोर दे रहे हैं, ताकि मिट्टी और फसलों के हिसाब से सही मात्रा में खाद का इस्तेमाल हो सके।

अप्रैल से दिसंबर 2025 के दौरान यूरिया की बिक्री बढ़ी है। फर्टिलाइज़र एसोसिएशन ऑफ इंडिया (FAI) के मुताबिक, इस अवधि में यूरिया की बिक्री 3.8 प्रतिशत बढ़कर 3.11 करोड़ टन हो गई, जबकि पिछले साल इसी समय यह 3 करोड़ टन थी।
हालांकि, देश में यूरिया का उत्पादन 3 प्रतिशत घटकर 2.24 करोड़ टन रह गया। इसी कमी को पूरा करने के लिए यूरिया का आयात तेजी से बढ़ा और यह 85 प्रतिशत उछलकर 80 लाख टन तक पहुंच गया।

यूरिया किसानों की पहली पसंद क्यों है?
यूरिया छोटे और सीमांत किसानों के लिए सबसे जरूरी खाद है, क्योंकि इस पर सरकार भारी सब्सिडी देती है। 45 किलो की एक बोरी यूरिया सिर्फ 267 रुपये में मिलती है। वहीं, डीएपी खाद की 50 किलो की बोरी करीब 1,350 रुपये में आती है और अन्य मिश्रित खाद या पोटाश की कीमत 1,500 रुपये से ज्यादा होती है।

अन्य खादों का हाल
रिपोर्ट के अनुसार, मिश्रित खाद (कंप्लेक्स फर्टिलाइज़र) का आयात 121 प्रतिशत से ज्यादा बढ़ गया। हालांकि, देश में इसका उत्पादन भी बढ़ा और बिक्री लगभग स्थिर रही।डीएपी खाद के मामले में घरेलू उत्पादन करीब 4 प्रतिशत घटा, जबकि इसका आयात 46 प्रतिशत बढ़ा। डीएपी की बिक्री में भी हल्की गिरावट दर्ज की गई।

ये भी पढ़ें - ग्रामीण अर्थव्यवस्था और रोजगार को मजबूती देगा भारत-EU समझौता: शिवराज सिंह चौहान

डीएपी उत्पादन में दिक्कत क्यों?
बिज़नेस लाइन की एक रिपोर्ट के मुताबिक उद्योग से जुड़े लोगों का कहना है कि डीएपी बनाने के लिए जरूरी कच्चा माल (रॉक फॉस्फेट) देने वाले देश अब इसकी सप्लाई सीमित कर रहे हैं और तैयार खाद बेचने पर जोर दे रहे हैं। इससे भारत में डीएपी उत्पादन चलाना चुनौती बन गया है।

पोटाश और एसएसपी की स्थिति
पोटाश (एमओपी), जो पूरी तरह आयात पर निर्भर है, उसकी बिक्री थोड़ी बढ़ी है। वहीं, सिंगल सुपर फॉस्फेट (SSP) का उत्पादन और बिक्री दोनों में अच्छी बढ़ोतरी दर्ज की गई है।

संतुलित खाद उपयोग पर जोर
FAI के अधिकारियों ने कहा कि आंकड़े दिखाते हैं कि देश धीरे-धीरे संतुलित खाद उपयोग की ओर बढ़ रहा है। आगे रबी सीजन के दौरान इस बात पर खास ध्यान रहेगा कि फसलों और मिट्टी की जरूरत के अनुसार नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटाश का सही इस्तेमाल हो, ताकि खाद का बेहतर और समझदारी से उपयोग किया जा सके।

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