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विवाहित बेटियों को मिलेगा पिता की कृषि भूमि में हिस्सा, यूपी सरकार का प्रस्ताव

उत्तर प्रदेश सरकार महिला सशक्तिकरण की दिशा में बड़ा कदम उठाने जा रही है। मौजूदा कानून (राजस्व संहिता-2006) के तहत अभी केवल विधवा पत्नी, पुत्र और अविवाहित पुत्री को ही जमीन में अधिकार मिलता है। लेकिन अ

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Pooja Rai·Correspondent·08 Sep 2025· 3 min read

विवाहित बेटियों को मिलेगा पिता की कृषि भूमि में हिस्सा, यूपी सरकार का प्रस्ताव

विवाहित बेटियों को मिलेगा पिता की कृषि भूमि में हिस्सा, यूपी सरकार का प्रस्ताव

उत्तर प्रदेश सरकार महिला सशक्तिकरण की दिशा में बड़ा कदम उठाने जा रही है। मौजूदा कानून (राजस्व संहिता-2006) के तहत अभी केवल विधवा पत्नी, पुत्र और अविवाहित पुत्री को ही जमीन में अधिकार मिलता है। लेकिन अब धारा 108(2) से “अविवाहित” शब्द हटाने का प्रस्ताव है। इससे विवाहित और अविवाहित बेटियों में भेदभाव खत्म होगा और दोनों को बराबरी से हिस्सा मिलेगा। मध्य प्रदेश और राजस्थान में यह व्यवस्था पहले से लागू है। यूपी में यह प्रस्ताव कैबिनेट और सदन से मंजूरी मिलने के बाद कानून बनेगा।

उत्तर प्रदेश सरकार महिला सशक्तिकरण की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम उठाने की तैयारी कर रही है। मध्य प्रदेश और राजस्थान की तर्ज पर अब यूपी में भी विवाहित बेटियों को पिता की कृषि भूमि में बराबरी का अधिकार मिलने की संभावना है। अगर प्रस्ताव को कैबिनेट और सदन से मंजूरी मिल जाती है, तो विवाहित बेटियां भी अविवाहित बेटियों और बेटों की तरह जमीन की हकदार होंगी।

मौजूदा कानून में भेदभाव
फिलहाल उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता-2006 की धारा 108(2) के तहत, किसी पुरुष भूमिधर (जमीन मालिक) की मृत्यु होने पर उसकी जमीन का बंटवारा केवल विधवा पत्नी, पुत्र और अविवाहित पुत्री के नाम दर्ज किया जाता है। इस प्रक्रिया को राजस्व भाषा में “वरासत दर्ज करना” कहा जाता है।

अगर इन तीनों में से कोई भी उत्तराधिकारी नहीं है, तो जमीन मृतक के माता-पिता के नाम चली जाती है। उनके जीवित न रहने की स्थिति में विवाहित पुत्री को अधिकार मिलता है। यदि विवाहित पुत्री भी नहीं है, तो मृतक के भाई और अविवाहित बहन को जमीन का हक सौंप दिया जाता है। यानी मौजूदा कानून में विवाह के आधार पर बेटियों के बीच साफ-साफ भेदभाव है।

क्या बदलेगा?
इस भेदभाव को खत्म करने के लिए राजस्व परिषद ने संशोधन का प्रस्ताव तैयार किया है। इसमें धारा 108(2) से “अविवाहित” शब्द हटाने का सुझाव दिया गया है। जैसे ही यह शब्द हटेगा, बेटियों को उनकी वैवाहिक स्थिति के आधार पर जमीन के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकेगा। इतना ही नहीं, उत्तराधिकार की सूची में जहां-जहां विवाहित और अविवाहित बहनों के बीच अंतर किया गया है, वहां भी यह फर्क खत्म कर दिया जाएगा। इसका सीधा मतलब है कि विवाह के आधार पर किसी भी बेटी या बहन के साथ अब भेदभाव नहीं होगा।

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एमपी-राजस्थान का मॉडल
यूपी इस बदलाव को लागू करने वाला देश का पहला राज्य नहीं होगा। मध्य प्रदेश और राजस्थान में यह व्यवस्था पहले से लागू है, जहां विवाहित बेटियों को बेटों के बराबर कृषि भूमि में हिस्सा मिलता है। यूपी सरकार भी अब इसी मॉडल को अपनाने की तैयारी कर रही है।

आगे की प्रक्रिया
सूत्रों के मुताबिक, राजस्व परिषद ने संशोधन का प्रस्ताव तैयार कर शासन को भेजने की तैयारी कर ली है। शासन स्तर पर परीक्षण के बाद इसे कैबिनेट के समक्ष रखा जाएगा। चूंकि यह मामला एक्ट में संशोधन से जुड़ा है, इसलिए इसे विधानसभा और विधान परिषद दोनों से मंजूरी दिलाना अनिवार्य होगा।
अगर यह प्रस्ताव कानून बनता है, तो उत्तर प्रदेश की लाखों विवाहित बेटियों को अपने पिता की कृषि भूमि में बराबरी का हक मिलेगा, जो महिलाओं के अधिकार और समानता की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम होगा।

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