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भारत को 2047 तक विकसित कृषि अर्थव्यवस्था बनाने के लिए सात जरूरी कदम

भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था वाले देशों में एक है। हम दुनिया की 5वीं बड़ी अर्थव्यवस्था हैं, और 2047 तक विकसति भारत का ख्वाब संजोए बैठे हैं। अगर हमें इस लक्ष्य को हासिल करना है तो, कृ

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Jalish· Correspondent

21 जनवरी 2025· 4 min read

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भारत को 2047 तक विकसित कृषि अर्थव्यवस्था बनाने के लिए सात जरूरी कदम

भारत को 2047 तक विकसित कृषि अर्थव्यवस्था बनाने के लिए सात जरूरी कदम

भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था वाले देशों में एक है। हम दुनिया की 5वीं बड़ी अर्थव्यवस्था हैं, और 2047 तक विकसति भारत का ख्वाब संजोए बैठे हैं। अगर हमें इस लक्ष्य को हासिल करना है तो, कृषि अर्थव्यवस्था को मज़बूत बनाना होगा। भारत का कृषि क्षेत्र फिलहाल एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा है, जहां खाद्य सुरक्षा, ग्रामीण आजीविका और स्थिरता के बीच संतुलन बनाए रखने की जरूरत है। इसमें कोई दो राय नहीं कि, तकनीक ने खेती-किसानी को एक नया आयाम दिया है, लेकिन फिर भी इसमें अभी बहुत कुछ करने को बाकी है। 2047 तक भारत की कृषि अर्थव्यवस्था को एक वैश्विक प्रतिस्पर्धी और टिकाऊ शक्ति में बदलने के लिए 7 जरूरी कदम उठाने होंगे।

1. कृषि में AI का इस्तेमाल

AI का इस्तेमाल खेती को और बेहतर बना रही है। मौसम पूर्वानुमान, कीट की पहचान और फसल उपज अनुकूलन में AI ने अहम रोल निभाया है, लेकिन इसकी पहुंच तकनीकी रूप से समझदार किसानों तक ही सीमित है। वहीं भारत के उलट अमेरिका और यूरोप जैसे विकसति देश के किसान इसका बखूबी इस्तेमाल कर रहे हैं। भारत को AI टूल को भारत को छोटे किसानों तक पहुंचाना होगा। उनमें ये समझ विकसति करनी होगी कि इसका इस्तेमाल उनकी खेती और बेहतर बना सकता है।

2. पुनर्योजी कृषि का विस्तार

वैसे तो भारत में जैविक खेती का चलन पुराना है, लेकिन पिछले कुछ दशकों में ज्यादा पैदावार की लालच ने जिस भेड़चाल की तरह रसायन का इस्तेमाल बढ़ा है, उसने ना सिर्फ फसल की गुणवत्ता को नुकसान पहुंचाया, बल्कि मिट्टी की उर्वरक क्षमता को भी कम किया है। फ्रांस और अमेरिका में संरचित नीतियों और प्रोत्साहनों के माध्यम से पुनर्योजी कृषि को बढ़ावा दिया गया है। भारत में इसको आगे बढ़ाने के लिए राष्ट्रीय पुनर्योजी कृषि नीति तैयार की जानी चाहिए।

3. रोबोटिक्स और ऑटोमेशन को बढ़ावा

भारत में छोटे किसानों की तादाद बड़े किसानों की तुलना में कहीं ज्यादा है। छोटे किसान संसाधनों की कमी की वजह से आज भी ज्यादातर काम खुद से ही कर रहे हैं, जिससे ना सिर्फ लागत ज्यादा आ रही है, बल्कि वक्त भी ज्यादा लग रहा है। वहीं दूसरी तरफ बड़े किसान ऑटोमेशन की तरफ शिफ्ट हो गए हैं, लेकिन इनकी तादाद काफी कम है। ऐसे में जरूरत है कि, सरकार बीज बोने और छिड़काव जैसे बुनियादी स्वचालन उपकरण के इस्तेमाल को और बढ़ावा दे, और ये छोटे किसानों की पहुंच में भी हो।

4. वैकल्पिक प्रोटीन का विकास

भारत का वैकल्पिक प्रोटीन बाजार अभी बहुत शुरुआती दौर में है, जहां इसकी लागत और बड़े पैमाने पर उत्पादन की मुश्किलें हैं। यूरोपीय संघ इस क्षेत्र में सरकारी समर्थन और अत्याधुनिक अनुसंधान के साथ अग्रणी है। भारत में इस क्षेत्र को विकसित करने के लिए उत्पादन दक्षता में सुधार हेतु वैश्विक कंपनियों के साथ सहयोग किया जाए। नई निर्माण तकनीकों पर अनुसंधान में निवेश किया जाए। लैब में विकसित प्रोटीन के लाभों के बारे में सार्वजनिक जागरूकता बढ़ाई जाए।

5. डिजिटल ट्विन तकनीक का इस्तेमाल

भारत में मिट्टी का परीक्षण अभी भी मैन्युअल तरीके से ही ज्यादातर किया जाता है। जिससे लागत ज्यादा आती है। वहीं अमेरिका में डिजिटल ट्विन तकनीक का इस्तेमाल करके परीक्षण किए जाते हैं। डिजिटल ट्विन्स को अपनाने के लिए एग्रीटेक कंपनियों के साथ मिलकर पायलट प्रोजेक्ट शुरू किए जाए। कृषि वैज्ञानिकों को डिजिटल मॉडलिंग में ट्रेनिंग दी जाए।

6. ब्लॉकचेन तकनीक का विस्तार

भारत में ब्लॉकचेन अपनाने की प्रक्रिया अभी प्रायोगिक चरण में है, जिसमें खाद्य ट्रेसबिलिटी के कुछ पायलट प्रोजेक्ट चल रहे हैं। चीन ने अपने कृषि आपूर्ति श्रृंखलाओं में ब्लॉकचेन को सफलतापूर्वक लागू किया है, जिससे पारदर्शिता बढ़ी है और बाज़ार तक बेहतर पहुंच मिली है। भारत में इसे आगे बढ़ाने के लिए निर्यात फसलों पर ध्यान केंद्रित कर ब्लॉकचेन को बढ़ावा देना चाहिए। ब्लॉकचेन को अपनाने के लिए आवश्यक बुनियादी ढांचा विकसित किया जाए। किसानों को ब्लॉकचेन से होने वाले फायदे को लेकर जागरूक किया जाए।

7. Climate-Smart Farming तकनीक

बदलते वक्त के साथ ही जलवायु परिवर्तन भी बहुत तेजी से हो रहा है। जिसका बड़ा नुकसान Agriculture sector को उठाना पड़ा रहा है। ऐसे में जरूरत है कि, किसानों में ये समझ पैदा की जाए कि वो कैसे Climate-Smart Farming तकनीक का सहारा लेकर बेहतर खेती कर सकते हैं। जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने के लिए ड्रिप इरीगेशन तकनीक का बड़े पैमाने पर विस्तार किया जाए। जलवायु-प्रतिरोधी बीज प्रजातियों और जैव-आधारित फसल सुरक्षा उत्पादों में निवेश किया जाए। स्थानीय जलवायु सलाह प्रणाली विकसित करने के लिए AI का इस्तेमाल किया जाए।

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