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नौकरी छोड़ शुरू की खेती, हिमाचल के सुशील शर्मा अब सेब के बाग से कमा रहे हैं लाखों

हिमाचल के किसान सुशील शर्मा गाला और स्पर वैरायटी सेब की खेती से सालाना 8 लाख रुपये से ज्यादा की कमाई रहे हैं। उन्होंने महंगे पौधों की जगह खुद ग्राफ्टिंग कर सस्ता पौधा तैयार किया। साथ ही उन्होंने बाग म

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Pooja Rai·Correspondent·25 Aug 2025· 2 min read

नौकरी छोड़ शुरू की खेती, हिमाचल के सुशील शर्मा अब सेब के बाग से कमा रहे हैं लाखों

नौकरी छोड़ शुरू की खेती, हिमाचल के सुशील शर्मा अब सेब के बाग से कमा रहे हैं लाखों

हिमाचल के किसान सुशील शर्मा गाला और स्पर वैरायटी सेब की खेती से सालाना 8 लाख रुपये से ज्यादा की कमाई रहे हैं। उन्होंने महंगे पौधों की जगह खुद ग्राफ्टिंग कर सस्ता पौधा तैयार किया। साथ ही उन्होंने बाग में इंटर क्रॉपिंग, ड्रिप इरीगेशन और एंटी हेल नेट से उत्पादन और क्वालिटी दोनों बढ़ाई है। लॉकडाउन में नौकरी छूटने के बाद शुरू हुई उनकी खेती आज सफलता की मिसाल बन गई है।

हिमाचल प्रदेश के शिमला ज़िले के डांडी बाग गांव के युवा किसान सुशील शर्मा गाला और स्पर वैरायटी के सेब की बागवानी से हर साल करीब 8 लाख रुपये से ज्यादा की कमाई कर रहे हैं। उनके 8 बीघे बाग में करीब 1500 से ज्यादा पेड़ लगे हैं। सुशील के मुताबिक अगस्त के पहले हफ्ते में उनका गाला सेब बाज़ार में 250 रुपये किलो बिका, जिसकी मांग मार्केट में हमेशा बनी रहती है।

गाला सेब की माँग क्यों ज़्यादा है?
गाला सेब की खासियत इसकी मीठा स्वाद और लंबी शेल्फ लाइफ है। यही वजह है कि देश ही नहीं दुनिया भर में इसकी डिमांड बहुत ज़्यादा है। महंगे पौधे खरीदने की बजाय सुशील ने खुद ग्राफ्टिंग कर पौधे तैयार किए और खर्च को काफी कम कर दिया।

इंटर क्रॉपिंग भी करते हैं सुशील
सेब की खेती के साथ सुशील इंटर क्रॉपिंग भी करते हैं। उनके बाग में शिमला मिर्च, मटर, टमाटर और लहसुन जैसी फसलें लगाई जाती हैं। बेहतर पैदावार के लिए उन्होंने ड्रिप इरीगेशन और मल्चिंग सिस्टम लगाया है, जबकि बर्फबारी से बचाव के लिए बाग में एंटी हेल नेट लगाया है।

ये भी पढ़ें - भारत दुनिया का सबसे बड़ा सुपारी उत्पादक, सरकार ने किसानों के लिए उठाए बड़े कदम

लॉकडाउन के दौरान छोड़ी नौकरी
सुशील बताते हैं कि लॉकडाउन के दौरान जब नौकरी छूट गई और आर्थिक हालात बिगड़ गए, तब उन्होंने पूरी तरह से खेती को अपनाने का फैसला किया। शुरुआत में संघर्ष रहा, लेकिन मां और पत्नी के सहयोग से उन्होंने बागवानी को अपनी पहचान और रोज़गार बना लिया। आज उनकी सफलता से गांव के अन्य किसान भी प्रेरणा ले रहे हैं।

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