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जानिए धान की दो जीनोम संपादित किस्में कौन सी हैं? जो कम पानी, कम समय में अधिक उत्पादन देने में हैं सक्षम

हाल ही में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) ने धान की दो जीनोम संपादित किस्में ‘कमला (DRR-100)’ और ‘DST राइस-1’ विकसित की हैं। ये किस्में कम पानी कम लागत में अधिक उत्पादन देने में सक्षम हैं। जीनोम

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Pooja Rai· Correspondent

19 मई 2025· 3 min read

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जानिए धान की दो जीनोम संपादित किस्में कौन सी हैं? जो कम पानी, कम समय में अधिक उत्पादन देने में हैं सक्षम

जानिए धान की दो जीनोम संपादित किस्में कौन सी हैं? जो कम पानी, कम समय में अधिक उत्पादन देने में हैं सक्षम

हाल ही में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) ने धान की दो जीनोम संपादित किस्में ‘कमला (DRR-100)’ और ‘DST राइस-1’ विकसित की हैं। ये किस्में कम पानी कम लागत में अधिक उत्पादन देने में सक्षम हैं। जीनोम संपादित किस्में विकसित करने वाला भारत पहला देश बन गया है।आईसीएआर का दावा है कि इससे 30 प्रतिशत तक धान का उत्पादन बढ़ जाएगा और जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों को भी कम करने में मदद मिलेगी।

देश में विकसित विश्व की पहली दो जीनोम संपादित धान की किस्मों का विकास वैज्ञानिक शोध में नवाचार की शुरुआत है। इस तकनीक के जरिये मूल डीएनए में सूक्ष्म बदलाव कर फसलों की नई किस्म तैयार की जाती है। सामान्य फसलों में ऐसे परिवर्तन को केंद्र सरकार के जैव सुरक्षा नियमों के तहत मंजूरी प्राप्त है।आईसीएआर 2018 से दोनों किस्मों को विकसित करने के लिए काम कर रहा था। इन किस्मों को छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, ओडिशा, झारखंड, बिहार, उत्तर प्रदेश, बंगाल, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, केरल, कर्नाटक, तमिलनाडु और महाराष्ट्र की कृषि परिस्थितियों के अनुरूप विकसित किया गया है। इन राज्यों में इन किस्मों की खेती से लगभग 45 लाख टन अधिक धान का उत्पादन होगा। ग्रीन हाउस गैस के उत्सर्जन में 20 प्रतिशत यानी 3,200 टन की कमी आएगी। फसल तैयार होने में 20 दिन कम लगने से लगभग तीन सिंचाई कम लगेगी।

ये भी पढ़ें - बिहार में किसानों को कृषि सखियाँ सिखायेंगी प्राकृतिक खेती के गुर, 50 हजार किसानों को मिलेगा फायदा

कमला (DRR-100)
कमला को जीनोम तकनीक के जरिये आईसीएआर के भारतीय चावल अनुसंधान संस्थान (हैदराबाद) ने बारीक दाने वाली किस्म सांबा महसूरी (बीपीटी 5204) से विकसित किया है। रिफाइंड बीज में मूल किस्म सांबा महसूरी की तुलना में दानों की संख्या ज्यादा होगी। इसे कम सिंचाई की जरूरत होगी और यह 20 दिन पहले तैयार हो जाएगी। परीक्षण में कमला की औसत उपज प्रति हेक्टेयर 5.3 टन पाई गई है, जो सांबा महसूरी से लगभग 19 प्रतिशत अधिक है। अनुकूल परिस्थितियों में यह 30 प्रतिशत तक बढ़ सकता है।

पूसा DST राइस-1
दूसरी किस्म पूसा डीएसटी राइस-1 है, जिसे आईसीएआर (पूसा, नई दिल्ली) ने विकसित किया। इसका दाना लंबा और बारीक होगा। दक्षिण भारत में रबी मौसम के लिए यह अत्यधिक उपयुक्त है। यह अपनी मूल किस्म एमटीयू 1010 की तुलना में 20 प्रतिशत अधिक उपज देगी। यह किस्म लवणीय एवं क्षारीय मिट्टी में 9.66% से 30.4% तक उपज में वृद्धि करने में सक्षम है। धान की ये किस्में आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक, तमिलनाडु, पुदुच्चेरी, केरल (जोन VII), छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, बिहार, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल (जोन III) राज्यों के लिए विकसित की गई हैं।

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