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गाजीपुर से पूसा तक: बासमती को नई पहचान दिलाने वाले डॉ. अशोक कुमार सिंह को पद्म सम्मान

गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर 2026 के पद्म पुरस्कारों की घोषणा में पूसा के पूर्व निदेशक डॉ. अशोक कुमार सिंह समेत 5 कृषि वैज्ञानिक और 4 किसानों को सम्मानित करने का ऐलान हुआ है। डॉ. सिंह ने बासमती धान

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Pooja Rai·Correspondent·26 Jan 2026· 4 min read

गाजीपुर से पूसा तक: बासमती को नई पहचान दिलाने वाले डॉ. अशोक कुमार सिंह को पद्म सम्मान

गाजीपुर से पूसा तक: बासमती को नई पहचान दिलाने वाले डॉ. अशोक कुमार सिंह को पद्म सम्मान

गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर 2026 के पद्म पुरस्कारों की घोषणा में पूसा के पूर्व निदेशक डॉ. अशोक कुमार सिंह समेत 5 कृषि वैज्ञानिक और 4 किसानों को सम्मानित करने का ऐलान हुआ है। डॉ. सिंह ने बासमती धान की रोगरोधी और हर्बिसाइड टॉलरेंट किस्में विकसित कर भारतीय बासमती चावल को अंतरराष्ट्रीय बाजार में मजबूत पहचान दिलाई।

गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर साल 2026 के पद्म पुरस्कारों की घोषणा कर दी गई है। इस सूची में कृषि और पशुपालन क्षेत्र में असाधारण योगदान देने वाले 5 कृषि वैज्ञानिकों और 4 किसानों के नाम शामिल हैं। इनमें भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (IARI), पूसा के पूर्व निदेशक डॉ. अशोक कुमार सिंह का नाम विशेष रूप से चर्चा में है, जिन्हें पद्मश्री के लिए चुना गया है। उनके कार्यों ने भारतीय बासमती चावल को वैश्विक स्तर पर नई मजबूती दी है।

उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले से ताल्लुक रखने वाले डॉ. अशोक कुमार सिंह ने बासमती धान की सबसे लोकप्रिय किस्मों में सुधार कर उन्हें रोगरोधी और हर्बिसाइड टॉलरेंट बनाया। इसका सीधा लाभ भारतीय किसानों और निर्यातकों को मिला। आज भारत सालाना 50 हजार करोड़ रुपये से अधिक का बासमती चावल निर्यात करता है, जिसमें डॉ. सिंह का योगदान बेहद अहम माना जाता है।

किसान परिवार से देश के शीर्ष कृषि वैज्ञानिक तक
डॉ. अशोक कुमार सिंह का जन्म वर्ष 1962 में उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले के ग्राम बरहट में एक किसान परिवार में हुआ। उनकी शुरुआती पढ़ाई गांव की प्राथमिक पाठशाला से हुई। इंटरमीडिएट (कृषि) में उन्होंने यूपी बोर्ड में चौथा स्थान हासिल कर जिले का नाम रोशन किया। इसके बाद उन्होंने काशी हिंदू विश्वविद्यालय से कृषि में स्नातक और स्नातकोत्तर की पढ़ाई की, जहां उन्हें बिनानी मेडल से सम्मानित किया गया। वर्ष 1992 में उन्होंने IARI, पूसा से चावल पर शोध कर पीएचडी की उपाधि प्राप्त की।

जब बासमती निर्यात संकट में था
एक समय ऐसा भी था जब भारतीय बासमती चावल में कीटनाशकों के अवशेष कई देशों द्वारा तय अधिकतम अवशेष सीमा (MRL) से अधिक पाए जा रहे थे। इससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारत की साख को नुकसान पहुंचा और पाकिस्तान को प्रतिस्पर्धात्मक लाभ मिलने लगा। इस चुनौती को गंभीरता से लेते हुए डॉ. सिंह के नेतृत्व में पूसा के वैज्ञानिकों ने बासमती की लोकप्रिय किस्मों को रोगमुक्त बनाने पर काम शुरू किया और इसमें उल्लेखनीय सफलता हासिल की।

ये भी पढ़ें - पद्म पुरस्कार 2026: किसानों और कृषि वैज्ञानिकों को मिला राष्ट्रीय सम्मान

देश की पहली हर्बिसाइड टॉलरेंट बासमती किस्में
डॉ. अशोक कुमार सिंह के निदेशक रहते हुए वर्ष 2023 में देश की पहली हर्बिसाइड टॉलरेंट बासमती धान की किस्में विकसित की गईं। इनमें पूसा बासमती-1979 और पूसा बासमती-1985 शामिल हैं। इन किस्मों की खासियत यह है कि खरपतवार नाशी दवाओं के छिड़काव से धान की फसल को नुकसान नहीं होता, जबकि खेत की घास और खरपतवार पूरी तरह खत्म हो जाते हैं।
इन किस्मों को सीधी बुवाई (DSR) के लिए जारी किया गया, जिससे पानी की बचत होती है और किसानों की लागत भी कम होती है।

पूसा बासमती-1985 को लोकप्रिय किस्म पूसा बासमती-1509 में सुधार कर विकसित किया गया, जबकि पूसा बासमती-1979 को देश की सबसे ज्यादा उगाई और निर्यात की जाने वाली किस्म पूसा बासमती-1121 से बेहतर बनाकर तैयार किया गया। उल्लेखनीय है कि पूसा बासमती-1121 के मूल विकासकर्ता डॉ. विजयपाल सिंह को पहले ही पद्म श्री से सम्मानित किया जा चुका है।

रोगरोधी किस्मों से किसानों को बड़ी राहत
बासमती धान में लगने वाले कई रोग किसानों को भारी नुकसान पहुंचाते हैं और कीटनाशकों के अधिक इस्तेमाल की वजह से निर्यात में भी दिक्कत आती है। इस समस्या के समाधान के लिए डॉ. सिंह की अगुवाई में पूसा ने कई रोगरोधी बासमती किस्में विकसित कीं।
पूसा बासमती-1509 से पूसा बासमती-1847, पूसा बासमती-1121 से पूसा बासमती-1885 और पूसा बासमती-1401 से पूसा बासमती-1886 विकसित की गईं। ये किस्में रोगरोधी होने के साथ-साथ कीटनाशकों की जरूरत को काफी हद तक कम कर देती हैं।

30 साल बासमती को समर्पित
डॉ. सिंह ने 1994 में भारतीय कृषि सेवा के जरिए पूसा में वैज्ञानिक के रूप में काम शुरू किया। पिछले 30 वर्षों से वे बासमती चावल की अधिक उपज देने वाली, उच्च गुणवत्ता और रोगरोधी किस्मों के विकास में जुटे रहे। वर्ष 2020 में वे उसी संस्थान के निदेशक और कुलपति बने, जहां से उन्होंने शिक्षा प्राप्त की थी। जून 2024 में सेवानिवृत्ति के बाद भी वे पूसा में एमेरिटस वैज्ञानिक के रूप में सक्रिय हैं।डॉ. अशोक कुमार सिंह को मिला पद्म सम्मान न सिर्फ उनके व्यक्तिगत योगदान की पहचान है, बल्कि यह भारतीय कृषि अनुसंधान और किसानों की मेहनत को मिला राष्ट्रीय सम्मान भी है।

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