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किसानों से लेकर महिलाओं तक को फायदा, ई-रेडिएशन सेंटर से बढ़ा निर्यात और रोजगार

पटना के बिहटा में बने बिहार के पहले ई-रेडिएशन सेंटर से राज्य के फल-सब्जियों के निर्यात को नई रफ्तार मिली है। इस तकनीक से आम, लीची, केला, मखाना और आलू जैसे कृषि उत्पाद बैक्टीरिया और कीटों से मुक्त होकर

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Pooja Rai· Correspondent

22 जनवरी 2026· 4 min read

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किसानों से लेकर महिलाओं तक को फायदा, ई-रेडिएशन सेंटर से बढ़ा निर्यात और रोजगार

किसानों से लेकर महिलाओं तक को फायदा, ई-रेडिएशन सेंटर से बढ़ा निर्यात और रोजगार

पटना के बिहटा में बने बिहार के पहले ई-रेडिएशन सेंटर से राज्य के फल-सब्जियों के निर्यात को नई रफ्तार मिली है। इस तकनीक से आम, लीची, केला, मखाना और आलू जैसे कृषि उत्पाद बैक्टीरिया और कीटों से मुक्त होकर 3 से 6 महीने, कुछ मामलों में एक साल तक सुरक्षित रह सकते हैं। इससे बिहार के उत्पाद अब सीधे खाड़ी देशों, जापान और नेपाल जैसे अंतरराष्ट्रीय बाजारों में पहुंच रहे हैं। इस पहल से किसानों को बेहतर दाम, निर्यात में नुकसान कम और स्थानीय स्तर पर रोजगार के नए अवसर पैदा हो रहे हैं।

बिहार एक कृषि प्रधान राज्य है, जहां की अर्थव्यवस्था काफी हद तक खेती और उससे जुड़े उत्पादों पर टिकी है। इसी वजह से राज्य सरकार लगातार कृषि और कृषि आधारित उद्योगों को बढ़ावा दे रही है। इसका असर अब साफ दिखने लगा है। बिहार से फल-सब्जियों के निर्यात में सबसे बड़ी दिक्कत माने जाने वाले बैक्टीरिया, फंगस और कीटों की समस्या अब काफी हद तक खत्म हो गई है।

बिहटा में बना ई-रेडिएशन सेंटर
पटना के बिहटा औद्योगिक क्षेत्र में बने अत्याधुनिक ई-रेडिएशन सेंटर ने बिहार के कृषि निर्यात को नई रफ्तार दी है। यह बिहार का पहला और पूर्वोत्तर भारत का सबसे बड़ा ई-रेडिएशन सेंटर है, जो करीब पांच एकड़ में फैला हुआ है। यहां पैक हाउस, कोल्ड स्टोरेज और आधुनिक प्रोसेसिंग की पूरी सुविधा मौजूद है। इस तकनीक से कृषि उत्पादों को बैक्टीरिया और फंगस से मुक्त किया जाता है, जिससे वे 3 से 6 महीने तक सुरक्षित रह सकते हैं। कुछ उत्पादों की शेल्फ लाइफ तो एक साल तक बढ़ाई जा रही है।

गामा किरणों का नियंत्रित इस्तेमाल
इस सेंटर में गामा किरणों की नियंत्रित तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है। इससे फल और सब्जियों की गुणवत्ता बनी रहती है और वे अंतरराष्ट्रीय मानकों पर भी खरे उतरते हैं। सेंटर के संचालक और जिटबन सप्लाई चेन प्राइवेट लिमिटेड के फाउंडर डायरेक्टर विकास कुमार बताते हैं कि इस साल बिहार से कैमिकल-फ्री आम, मखाना, लीची, आलू जैसे कई कृषि उत्पादों का सीधे निर्यात किया जाएगा। अब बिहार का दूधिया मालदह आम, हाजीपुर का केला, लीची और मखाना खाड़ी देशों, जापान, नेपाल सहित कई देशों में पहुंच रहा है।

मखाना अब सालभर रहेगा सुरक्षित
मिथिलांचल की पहचान मखाना लंबे समय से भंडारण के दौरान कीट लगने की समस्या से जूझ रहा था। इससे निर्यात में भारी नुकसान होता था। भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर (BARC) के सहयोग से मखाना के लंबे समय तक भंडारण और समुद्री रास्ते से निर्यात के लिए खास प्रक्रिया (SOP) तैयार की गई है। अब मखाना को सीधे बिहार से समुद्री कंटेनर के जरिए विदेश भेजा जा सकेगा।
विकास कुमार के अनुसार, पिछले दो महीनों में करीब 60 टन मखाना को इस तकनीक से सुरक्षित किया गया, जिससे उसकी लाइफ एक साल तक बढ़ गई है। पहले मखाना सिर्फ 3–4 महीने ही सुरक्षित रह पाता था और उसके बाद कीड़े लगने से विदेशों में रिजेक्ट हो जाता था। इससे हर साल 20–30 प्रतिशत तक नुकसान होता था, जो अब लगभग खत्म हो गया है।

ये भी पढ़ें - कृषि निर्यात में बिहार की बड़ी कामयाबी, मिथिला मखाना पहुंचा दुबई

क्या है ई-रेडिएशन सेंटर?
ई-रेडिएशन सेंटर में फल-सब्जियां, मसाले, दवाएं और मेडिकल उपकरणों को विकिरण तकनीक से प्रोसेस किया जाता है। इसमें गामा किरणों या इलेक्ट्रॉन बीम का नियंत्रित उपयोग होता है, जिससे बैक्टीरिया, कीड़े और फफूंद नष्ट हो जाते हैं। इस प्रक्रिया से न तो खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता खराब होती है और न ही कोई हानिकारक असर रहता है। साथ ही यहां कोल्ड स्टोरेज और आधुनिक पैकेजिंग की सुविधा भी है, जिससे उत्पाद सीधे निर्यात के लिए तैयार हो जाते हैं।

पर्यावरण के अनुकूल है ये तकनीक
रेडिएशन तकनीक को सुरक्षित और पर्यावरण के अनुकूल माना जाता है। इससे खाद्य सुरक्षा बढ़ती है और अंतरराष्ट्रीय बाजार में बिहार के उत्पादों को पहचान मिल रही है। इस सेंटर का संचालन सात साल के लिए जिटबन सप्लाई चेन प्राइवेट लिमिटेड को सौंपा गया है। फिलहाल कंपनी केला, आम, लीची, मखाना, मशरूम, इमली, मसाले और आलू जैसे उत्पादों के निर्यात का पूरा समाधान दे रही है।

निर्यात, रोजगार और किसानों को फायदा
इस उद्योग से अभी करीब 80 लोगों को रोजगार मिला है, जिनमें लगभग 50 प्रतिशत महिलाएं हैं। विकास कुमार बताते हैं कि वे पहले मर्चेंट नेवी में थे, लेकिन कोरोना के बाद बिहार लौट आए। राज्य सरकार की सकारात्मक नीतियों और जीविका के सहयोग से उन्होंने यह सेंटर शुरू किया। आज यह पहल किसानों की आमदनी बढ़ाने, रोजगार पैदा करने और बिहार के कृषि उत्पादों को दुनिया तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभा रही है।

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