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अरहर की फसल को स्टरलिटी मोजेक रोग से बचा सकेंगे किसान, कृषि वैज्ञानिकों ने खोजा नया जीन

भारत में अरहर की खेती बड़े पैमाने पर की जाती है। दुनिया का लगभग 80 प्रतिशत अरहर उत्पादन भारत में ही होता है। प्रोटीन, खनिज, कार्बोहाइड्रेट, लोहा, कैल्शियम आदि पोषक तत्वों से भरपूर अरहर को दालों का राज

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Pooja Rai· Correspondent

13 अगस्त 2025· 3 min read

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अरहर की फसल को स्टरलिटी मोजेक रोग से बचा सकेंगे किसान, कृषि वैज्ञानिकों ने खोजा नया जीन

अरहर की फसल को स्टरलिटी मोजेक रोग से बचा सकेंगे किसान, कृषि वैज्ञानिकों ने खोजा नया जीन

भारत में अरहर की खेती बड़े पैमाने पर की जाती है। दुनिया का लगभग 80 प्रतिशत अरहर उत्पादन भारत में ही होता है। प्रोटीन, खनिज, कार्बोहाइड्रेट, लोहा, कैल्शियम आदि पोषक तत्वों से भरपूर अरहर को दालों का राजा भी कहते हैं।

अरहर दाल का उत्पादन शुष्क और नमी वाले क्षेत्रों में किया जाता है। इसकी खेती के लिये अच्छी सिंचाई के साथ सूर्य की ऊर्जा की भी जरूरत होती है। इसलिये इसकी बुवाई के लिये जून-जुलाई का महीना बेहतर माना जाता है। इसकी खेती मुख्यरूप से महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, कर्नाटक और गुजरात में की जाती है। फिलहाल अरहर की खेती करने वाले किसानों के लिए अच्छी खबर है।अरहर की फसल को बर्बाद करने वाली बीमारी के खिलाफ वैज्ञानिकों ने प्रतिरोधक क्षमता देने वाला एक जीन खोज निकाला है।

स्टरलिटी मोज़ेक बीमारी के खिलाफ नया खोज
भारत के प्रमुख कृषि अनुसंधान संस्थानों के वैज्ञानिकों ने अरहर दाल को बर्बाद करने वाली खतरनाक स्टरलिटी मोज़ेक बीमारी के खिलाफ प्रतिरोधक क्षमता देने वाला एक जीन खोज निकाला है। इस बीमारी के प्रकोप से किसानों को तुअर की पैदावार में 90% तक का नुकसान हो सकता है। नई खोज में मिले जीन Ccsmd04 से पौधे को इस बीमारी से लड़ने की क्षमता मिलेगी, जिससे फसल का नुकसान कम किया जा सकेगा।

आईसीआरआईएसएटी के महानिदेशक हिमांशु पाठक के मुताबिक, “यह खोज बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि स्टरलिटी मोज़ेक बीमारी का असर भारत के कई इलाकों में बेहद गंभीर है। यह जीन और इससे जुड़े मार्कर्स भविष्य में और अधिक रोग-प्रतिरोधक किस्मों के विकास में मदद करेंगे।”

ये भी पढ़ें - खरीफ धान की बुवाई 12 प्रतिशत बढ़कर 365 लाख हेक्टेयर हुई, कपास और तिलहन का रकबा घटा

इन संस्थान के वैज्ञानिकों ने मिलकर किया काम
यह अध्ययन टीम आईसीआरआईएसएटी (अंतर्राष्ट्रीय फसल अनुसंधान संस्थान, अर्ध-शुष्क उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों के लिए) के प्रिंसिपल साइंटिस्ट मनीष के. पांडे, भारतीय दलहन अनुसंधान संस्थान (आईआईपीआर, उत्तर प्रदेश), डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय (बिहार) और भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (आईएआरआई, असम) के वैज्ञानिकों ने मिलकर किया। वैज्ञानिकों ने उन्नत जीनोमिक्स, फीनोमिक्स और हाई-पावर कंप्यूटेशनल एनालिसिस का इस्तेमाल करके यह जीन 'आशा' (ICPL 87119) नाम की आईसीआरआईएसएटी विकसित तुअर किस्म में खोजा।

संस्थान 1975 से इस बीमारी के खिलाफ फसल में प्रतिरोधक क्षमता विकसित करने पर काम कर रहा है। हालांकि कई किस्में विकसित की गई हैं, लेकिन वायरस और इसे फैलाने वाले कीट (माइट) में लगातार बदलाव के कारण खेतों में सफलता सीमित रही है। यह नई खोज अरहर में बीमारी प्रतिरोधक क्षमता के जीनोमिक पहलुओं को उजागर करती है।

प्रिंसिपल साइंटिस्ट मनीष के. पांडे ने कहा
प्रिंसिपल साइंटिस्ट मनीष के. पांडे ने बताया, “हमने एक प्रतिरोधक जीन की पहचान की है और एसएमडी प्रतिरोध से जुड़े चार InDel markers को भी प्रमाणित किया है। इनका उपयोग अरहर की नई किस्मों की शुरुआती चयन प्रक्रिया में किया जा सकता है। यह जानकारी जीन एडिटिंग के जरिए किस्म सुधार में भी काम आ सकती है।”

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