गांवों में बाँस का इस्तेमाल टोकरी, फर्नीचर, घर और खेती के काम में लंबे समय से होता रहा है। लेकिन अब बाँस सिर्फ इन कामों तक सीमित नहीं है। इसका इस्तेमाल निर्माण, पेपर, कपड़ा, हस्तशिल्प, फर्नीचर और कई दूसरे उत्पादों में भी हो रहा है। किसानों के लिए यह अतिरिक्त आमदनी का जरिया बन सकता है और मिट्टी व पर्यावरण के लिहाज से भी इसे उपयोगी माना जाता है। इसी महत्व को देखते हुए हर साल 18 सितंबर को World Bamboo Day यानी विश्व बाँस दिवस मनाया जाता है। यह दिवस 2009 में World Bamboo Organization ने शुरू किया था।
भारत में 136 प्रजातियां, 1.396 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक भारत में करीब 1.396 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र बाँस के तहत है। देश में बाँस की 136 प्रजातियां पाई जाती हैं, जिनमें 125 देशी और 11 विदेशी प्रजातियां हैं। बाँस का इस्तेमाल पारंपरिक कामों के साथ-साथ फर्नीचर, टेक्सटाइल, खाद्य पदार्थ, ऊर्जा और दूसरे उद्योगों में भी हो रहा है।
National Bamboo Mission से बढ़ रहा खेती का दायरा
सरकार ने बाँस की खेती और इससे जुड़े कारोबार को बढ़ावा देने के लिए National Bamboo Mission चलाया है। इसकी शुरुआत 2006-07 में हुई थी। बाद में 2018 में इसे नए सिरे से Restructured National Bamboo Mission के रूप में शुरू किया गया, जिसका फोकस बाँस की पूरी value chain को विकसित करने पर है। 31 दिसंबर 2024 तक इसके तहत 60,000 हेक्टेयर गैर-वनीय जमीन पर बाँस का रोपण किया जा चुका था। इस दौरान 408 बाँस नर्सरियां, 104 ट्रीटमेंट और प्रिजर्वेशन यूनिट और 528 प्रोडक्ट डेवलपमेंट व प्रोसेसिंग यूनिट भी स्थापित की गईं।
इस मिशन का मकसद सिर्फ बाँस उगाना नहीं, बल्कि उसकी कटाई के बाद प्रोसेसिंग, बाजार और वैल्यू एडेड प्रोडक्ट की पूरी व्यवस्था को मजबूत करना भी है। मिशन फिलहाल 24 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में लागू है।
खेती में भी लगाया जा सकता है बाँस
बाँस को Agroforestry यानी कृषि-वनीकरण में भी शामिल किया जा सकता है। ICAR-AICRP on Agroforestry ने अलग-अलग कृषि-जलवायु क्षेत्रों के लिए बाँस आधारित Agroforestry Systems विकसित किए हैं। हालांकि किसान को अपने इलाके के हिसाब से सही प्रजाति, पौधों की दूरी, Plantation और कटाई की तकनीक का ध्यान रखना जरूरी है।
ICAR ने किसानों के लिए बाँस की Nursery Management, Plantation और Value Addition को लेकर ट्रेनिंग भी आयोजित की है। इससे साफ है कि बाँस को सिर्फ कच्चे माल के तौर पर नहीं, बल्कि खेती से जुड़े कारोबार और वैल्यू एडिशन के मौके के तौर पर भी देखा जा रहा है।
बाँस से कमाई के कई रास्ते
बाँस की खेती के बाद किसान सिर्फ कच्चा बाँस बेचने तक सीमित नहीं हैं। इससे फर्नीचर, टोकरी, हस्तशिल्प, निर्माण सामग्री, प्लांटर और दूसरे उपयोगी सामान बनाए जा सकते हैं। ICAR के मुताबिक बाँस से जुड़े उत्पादों की प्रोसेसिंग और वैल्यू एडिशन ग्रामीण इलाकों में रोजगार और आमदनी के अवसर बढ़ा सकते हैं।
सरकार के मुताबिक भारत में बाँस और Cane से जुड़ा उद्योग करीब ₹28,005 करोड़ का है। इसलिए खेती के साथ अगर किसान या ग्रामीण समूह बाँस की प्रोसेसिंग और उत्पाद बनाने से जुड़ते हैं, तो कमाई के नए रास्ते खुल सकते हैं।
खराब जमीन में भी उपयोगी
बाँस का इस्तेमाल ऐसी जमीन में भी किया गया है जहां सामान्य खेती करना मुश्किल है। ICAR के एक मॉडल में गुजरात के बीहड़ इलाकों में बाँस और Anjan grass आधारित व्यवस्था से जमीन का उत्पादक इस्तेमाल करने, मिट्टी के कटाव को कम करने और किसानों के लिए अतिरिक्त आमदनी का जरिया बनाने में मदद मिली।
इस मॉडल में सात साल से ज्यादा पुराने एक हेक्टेयर बाँस plantation में करीब 300 clumps पाए गए और पुराने culms के करीब 30 फीसदी हिस्से की सालाना harvesting की जा सकती थी। यह एक विशेष ICAR मॉडल का आंकड़ा है, इसलिए इसे हर इलाके में बाँस की खेती का सामान्य उत्पादन नहीं माना जाना चाहिए।
पर्यावरण के लिए भी अहम
बाँस तेजी से बढ़ने वाला पौधा है और इसे पर्यावरण संरक्षण, मिट्टी के कटाव को कम करने और landscape restoration जैसे कामों से भी जोड़ा जाता है। मतलब बाँस सिर्फ एक पौधा नहीं है। खेती, रोजगार, ग्रामीण कारोबार, वैल्यू एडिशन और पर्यावरण, इन सभी क्षेत्रों में इसकी भूमिका बढ़ रही है। हालांकि किसान बड़े स्तर पर बाँस लगाने से पहले अपने इलाके के हिसाब से सही प्रजाति, पौध की गुणवत्ता, खेती की तकनीक और बाजार की उपलब्धता की जानकारी जरूर लें।





