भारत की खेती में महिलाओं की भूमिका लगातार बढ़ रही है। देश के कृषि कार्यबल में अब करीब 48 फीसदी महिलाएं हैं, लेकिन इसके बावजूद उन्हें किसान के तौर पर पहचान, जमीन पर अधिकार, कर्ज और कमाई के मामले में पुरुषों के बराबर हिस्सेदारी नहीं मिल पा रही है। Arya.ag की रिपोर्ट ‘Her Harvest 2026: The Hidden Cost of Women’s Invisible Work in Indian Agriculture’ ने भारतीय कृषि में महिलाओं की स्थिति को लेकर कई अहम और चौंकाने वाले आंकड़े सामने रखे हैं।
कृषि में महिलाओं की हिस्सेदारी 48%
रिपोर्ट के मुताबिक, कृषि क्षेत्र में काम करने वाली 50.5 फीसदी महिलाएं परिवार के खेतों पर बिना वेतन के मददगार के तौर पर दर्ज हैं। वहीं पुरुषों में यह आंकड़ा 21.7 फीसदी है। यानी महिलाएं खेत में काम तो करती हैं, लेकिन आधिकारिक आंकड़ों में उन्हें कई बार किसान या खेती करने वाले व्यक्ति के रूप में दर्ज ही नहीं किया जाता।
वहीं कृषि कार्यबल में महिलाओं की हिस्सेदारी 2017-18 के करीब 30 फीसदी से बढ़कर अब लगभग 48 फीसदी हो गई है। इससे साफ है कि खेती में महिलाओं की भागीदारी बढ़ी है, लेकिन उनकी औपचारिक पहचान और आर्थिक हिस्सेदारी अभी भी पीछे है।
रिपोर्ट तैयार करने के लिए PLFS 2023-24, कृषि जनगणना 2015-16, FAO और ILO समेत भारत सरकार, IFC और Arya.ag के उपलब्ध आंकड़ों और रिपोर्ट्स का इस्तेमाल किया गया है।
भारत में सिर्फ 13.96% कृषि जोत महिलाओं के पास
जमीन के मामले में भी महिलाओं की स्थिति बहुत मजबूत नहीं है। रिपोर्ट के अनुसार, भारत में सिर्फ 13.96 फीसदी कृषि जोत महिलाओं के नाम या उनके संचालन में हैं, जबकि वैश्विक औसत करीब 14.5 फीसदी है।
भारत में महिलाएं कुल खेती योग्य क्षेत्र के करीब 11.72 फीसदी हिस्से का संचालन करती हैं। वहीं ब्राजील में महिलाएं 8.5 फीसदी और अमेरिका में करीब 7 फीसदी कृषि भूमि की मुख्य संचालक हैं।
पड़ोसी देश नेपाल में महिलाओं की स्थिति भारत से काफी बेहतर है। वहां 32.4 फीसदी कृषि जोत महिलाओं के पास हैं और वे 22.3 फीसदी कृषि क्षेत्र का संचालन करती हैं।
महिलाओं के खेतों की उत्पादकता 24% तक कम क्यों?
रिपोर्ट में बताया गया है कि समान आकार के खेतों की तुलना में महिलाओं द्वारा संचालित खेतों की उत्पादकता पुरुषों के खेतों से करीब 24 फीसदी कम हो सकती है। लेकिन इसका कारण महिलाओं की खेती करने की क्षमता नहीं है।
रिपोर्ट के मुताबिक, महिलाओं को कर्ज, बीज-खाद जैसे कृषि इनपुट, तकनीक और दूसरे जरूरी संसाधनों तक पुरुषों के मुकाबले कम पहुंच मिलती है। यानी महिलाएं खेती कम नहीं कर रही हैं, बल्कि कम संसाधनों के साथ खेती कर रही हैं।
पुरुषों के 100 रुपये के मुकाबले महिलाओं की कमाई 82 रुपये
कमाई के मामले में भी महिलाओं और पुरुषों के बीच बड़ा अंतर है। रिपोर्ट के अनुसार, एग्री-फूड सिस्टम में महिलाएं पुरुषों के हर 100 रुपये के मुकाबले करीब 82 रुपये कमाती हैं।
वहीं कृषि मजदूरों के तौर पर काम करने वाली महिलाओं को समान काम के लिए पुरुषों से 20 से 30 फीसदी तक कम मजदूरी मिलने की बात रिपोर्ट में कही गई है।
हर साल ₹2 लाख करोड़ तक का कृषि उत्पादन गंवा सकता है भारत
रिपोर्ट ने महिलाओं को कृषि संसाधनों की बराबर पहुंच न मिलने के आर्थिक असर का भी अनुमान लगाया है। FAO के अनुमान के मुताबिक, उत्पादक संसाधनों तक असमान पहुंच के कारण कृषि उत्पादन में 2.5 से 4 फीसदी तक की कमी हो सकती है।
भारत के ₹48.7 लाख करोड़ के कृषि GVA को आधार मानते हुए रिपोर्ट का अनुमान है कि देश हर साल करीब ₹1.2 लाख करोड़ से ₹2 लाख करोड़ के कृषि उत्पादन से वंचित रह सकता है।
रिपोर्ट का कहना है कि इसकी वजह यह नहीं है कि महिलाएं कम खेती करती हैं, बल्कि वजह यह है कि वे कम संसाधनों के साथ खेती करती हैं।
रिपोर्ट ने दिए ये सुझाव
रिपोर्ट में महिला किसानों की स्थिति सुधारने के लिए कई सुझाव भी दिए गए हैं। इसमें सबसे पहले महिलाओं को किसान के तौर पर पहचान देने की बात कही गई है। रिपोर्ट के मुताबिक, जमीन के कागज पर नाम किसका है, इसे आधार न बनाकर खेती में वास्तविक भूमिका निभाने वाली महिलाओं को किसान के रूप में मान्यता दी जानी चाहिए।
इसके अलावा कृषि से जुड़े आंकड़ों में भी महिला-पुरुष का अलग-अलग डेटा जारी करने की जरूरत बताई गई है। खासकर कृषि कर्ज, सरकारी खरीद और FPO यानी किसान उत्पादक संगठनों की सदस्यता में महिलाओं की भागीदारी का अलग डेटा उपलब्ध होना चाहिए।
रिपोर्ट में महिलाओं के लिए कम गारंटी या बिना ज्यादा जमानत वाले कर्ज, वेयरहाउस रसीद के आधार पर वित्तीय सुविधा और महिलाओं के नाम पर कृषि क्रेडिट अकाउंट बढ़ाने का सुझाव दिया गया है। इसका मकसद यह है कि किसान को कर्ज उसकी फसल और खेती की जरूरत के आधार पर मिले, सिर्फ जमीन के मालिकाना हक के आधार पर नहीं।
इसके साथ ही महिलाओं की पहुंच ड्रोन, कृषि सलाह और डिजिटल मार्केटिंग जैसी तकनीकों तक बढ़ाने की जरूरत बताई गई है। ऐसी संस्थाओं और समूहों के जरिए इन सुविधाओं को पहुंचाने पर जोर दिया गया है, जिनमें महिलाएं सक्रिय रूप से शामिल हों और नेतृत्व भी करती हों।
रिपोर्ट ने महिला नेतृत्व वाले FPOs को भी बढ़ावा देने की बात कही है। इसके मुताबिक, महिला FPOs को केवल कुछ समय के प्रोजेक्ट के तौर पर नहीं, बल्कि लंबे समय तक चलने वाले बाजार संस्थानों के रूप में विकसित किया जाना चाहिए।
रिपोर्ट की तस्वीर यही बताती है कि भारतीय खेती में महिलाएं पहले से ही बड़ी भूमिका निभा रही हैं। कृषि कार्यबल में उनकी हिस्सेदारी करीब आधी पहुंच चुकी है, लेकिन जमीन, कर्ज, तकनीक, बाजार और किसान के तौर पर पहचान के मामले में वे अभी पीछे हैं।अगर महिलाओं को पुरुष किसानों के बराबर जमीन, कर्ज, तकनीक, भंडारण और बाजार तक पहुंच मिलती है, तो इसका फायदा सिर्फ महिला किसानों को नहीं, बल्कि पूरे कृषि क्षेत्र को मिल सकता है।
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