ग्रामीण इलाकों में रोजगार देने वाली नई योजना Viksit Bharat-Guarantee for Rozgar and Aajeevika Mission (Gramin) यानी VB G RAM G Act के तहत अब तक 11.4 करोड़ से ज्यादा व्यक्ति-दिवस (person-days) रोजगार दिया जा चुका है। सरकारी पोर्टल के आंकड़ों के मुताबिक, इसमें महिलाओं की हिस्सेदारी 61.5% है। यानी योजना के तहत काम पाने वालों में महिलाओं की संख्या पुरुषों से ज्यादा है।
महिलाओं की भागीदारी लगातार बढ़ी
इससे पहले लागू मनरेगा (MGNREGA) में भी महिलाओं की भागीदारी 50% से ज्यादा रही है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, 2023-24 में महिलाओं की हिस्सेदारी सबसे ज्यादा 58.9% रही थी। वहीं 2025-26 में यह आंकड़ा 57.25% था।
जानकारों के मुताबिक, ग्रामीण रोजगार योजनाओं में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी एक सकारात्मक संकेत है। हालांकि, सामाजिक संगठनों का कहना है कि कई जगह पुरुष इन योजनाओं के बजाय खुले बाजार में मिलने वाली ज्यादा मजदूरी या कृषि क्षेत्र में मिलने वाले काम को प्राथमिकता देते हैं। यही वजह है कि इन योजनाओं में महिलाओं की हिस्सेदारी बढ़ रही है।
नई योजना में मजदूरी बढ़ी
VB G RAM G योजना 1 जुलाई से लागू हुई है। इसके तहत अंतरिम तौर पर कम से कम ₹300 प्रतिदिन की मजदूरी तय की गई है। सरकार के मुताबिक, मनरेगा के तहत राष्ट्रीय औसत मजदूरी ₹298.8 प्रतिदिन थी, जो नई योजना में बढ़कर ₹327.4 प्रतिदिन हो गई है। यानी औसतन ₹28.6 प्रतिदिन की बढ़ोतरी हुई है।
नई दर लागू होने से पहले कई राज्यों में मजदूरी ₹300 से भी कम थी। सबसे कम निर्धारित मजदूरी ₹241 प्रतिदिन थी।
अब ₹400 प्रतिदिन मजदूरी की मांग
हालांकि, संसद की ग्रामीण विकास और पंचायती राज संबंधी स्थायी समिति ने मजदूरी को लेकर चिंता जताई है। समिति ने सरकार से मजदूरी तय करने के मौजूदा तरीके की व्यापक समीक्षा करने की सिफारिश की है।
समिति का कहना है कि ग्रामीण क्षेत्रों में महंगाई और जीवन-यापन की वास्तविक लागत को देखते हुए मजदूरी पर्याप्त नहीं है। इसलिए उसने कम से कम ₹400 प्रतिदिन की न्यूनतम मजदूरी तय करने की सिफारिश की है। साथ ही, अलग-अलग राज्यों और क्षेत्रों की परिस्थितियों के अनुसार मजदूरी में अंतर रखने का सुझाव दिया गया है।
महंगाई के हिसाब से मजदूरी तय करने की सिफारिश
समिति ने यह भी कहा है कि मजदूरी तय करने के लिए इस्तेमाल होने वाले 2011 के आधार वर्ष और कृषि मजदूरों के लिए उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI-AL) की भी समीक्षा होनी चाहिए। मजदूरी को ऐसे महंगाई सूचकांक से जोड़ने की जरूरत है, जो ग्रामीण परिवारों की वास्तविक जीवन-यापन लागत को बेहतर तरीके से दिखा सके।
समिति ने कहा है कि जब तक मजदूरी तय करने की पूरी व्यवस्था में बदलाव नहीं होता, तब तक मौजूदा मजदूरी में बड़ी बढ़ोतरी के लिए सरकार को जरूरी बजट उपलब्ध कराना चाहिए।
समिति ने ग्रामीण विकास विभाग से इन सिफारिशों पर तीन महीने के भीतर कार्रवाई रिपोर्ट भी मांगी है।
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