उत्तर प्रदेश को देश का सबसे बड़ा गन्ना उत्पादक राज्य माना जाता है और यहां होने वाली गन्ने की खेती का सीधा असर देश के चीनी बाजार पर पड़ता है। ऐसे में 2026-27 का चीनी सीजन काफी अहम रहने वाला है। इस सीजन में यूपी में गन्ने की पैदावार करीब 10 फीसदी बढ़ने की उम्मीद है, खासकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में। लेकिन इसके बावजूद राज्य में चीनी उत्पादन करीब 90 लाख टन ही रहने का अनुमान है। बाजार को उम्मीद थी कि यूपी का चीनी उत्पादन 1 करोड़ टन के पार जा सकता है।
चीनी उत्पादन में बढ़ोतरी की उम्मीद कम होने की बड़ी वजह गन्ने का रकबा कम होना और चीनी मिलों में पेराई जल्दी शुरू होना बताई जा रही है। इन दोनों वजहों से गन्ने की बेहतर पैदावार का फायदा पूरी तरह चीनी उत्पादन में नहीं मिल पाएगा।
गन्ने का रकबा कितना है?
चीनी उद्योग से जुड़े सूत्रों के मुताबिक, इस साल यूपी में गन्ने का रकबा पिछले साल के मुकाबले 1 से 2 लाख हेक्टेयर तक कम हो सकता है। मिलों ने अपने-अपने क्षेत्र में गन्ने के रकबे का जो अनुमान तैयार किया है, उसमें कमी दिखाई दे रही है।
वहीं, राज्य सरकार के शुरुआती आंकड़ों के मुताबिक इस साल गन्ने का रकबा 28.13 लाख हेक्टेयर है, जबकि पिछले साल यह 28.61 लाख हेक्टेयर था।
हालांकि, केंद्रीय कृषि मंत्रालय के आंकड़े इससे अलग हैं। मंत्रालय के मुताबिक यूपी में गन्ने का रकबा 28.02 लाख हेक्टेयर है, जो पिछले साल के मुकाबले करीब 36 हजार हेक्टेयर ज्यादा है।
10 फीसदी बढ़ सकती है गन्ने की पैदावार
गन्ने की पैदावार को लेकर इस बार किसानों और विशेषज्ञों को उम्मीद है। विशेषज्ञों के मुताबिक इस सीजन में गन्ने की औसत पैदावार कम से कम 10 फीसदी बढ़ सकती है। इस बढ़ी हुई पैदावार का पूरा फायदा लेने के लिए चीनी मिलों को पेराई नवंबर से शुरू करनी चाहिए।
चीनी मिलों में अगर गन्ने की पेराई समय से पहले शुरू हो जाती है तो इसका असर चीनी की रिकवरी पर पड़ सकता है। कम उम्र के गन्ने में चीनी की मात्रा कम होती है, जिससे मिलों को कम चीनी मिलेगी। वहीं, किसानों को भी कम चीनी वाले गन्ने के कारण कम रिटर्न मिल सकता है।
अगर किसी मिल में 10.19 फीसदी रिकवरी होती है तो 100 किलो गन्ने की पेराई से करीब 10.19 किलो चीनी तैयार होती है।
फसल की स्थिति अच्छी, कीटों का असर कम
विशेषज्ञों के मुताबिक, फिलहाल यूपी में गन्ने की फसल की स्थिति अच्छी है और कीटों के हमले की ज्यादा खबरें नहीं मिली हैं। हालांकि, राज्य के कुछ हिस्सों में आई हालिया बाढ़ से गन्ने की फसल को कितना नुकसान हुआ है, इसका अभी सही आकलन नहीं हो पाया है। पिछले कुछ हफ्तों में यूपी के कई हिस्सों में सामान्य से काफी ज्यादा बारिश हुई है।
पूर्वी यूपी में 85 फीसदी ज्यादा बारिश
भारत मौसम विज्ञान विभाग यानी IMD के आंकड़ों के मुताबिक, पूर्वी उत्तर प्रदेश के 42 जिलों में 26 अगस्त से 8 सितंबर के बीच सामान्य से 85 फीसदी ज्यादा बारिश हुई। हालांकि, 1 जून से अब तक पूरे मॉनसून सीजन की बारिश अभी भी सामान्य से 5 फीसदी कम है।
वहीं, पश्चिमी उत्तर प्रदेश के 33 जिलों में इस अवधि के दौरान 80 फीसदी ज्यादा बारिश हुई। यहां 1 जून से अब तक कुल मॉनसून बारिश सामान्य से 10 फीसदी ज्यादा रही है।
पश्चिमी यूपी में मौसम की स्थिति बेहतर रहने से किसान इस बार गन्ने की ज्यादा पैदावार की उम्मीद कर रहे हैं। कुछ किसानों के मुताबिक, इस साल गन्ने की पैदावार 10 से 15 फीसदी तक बढ़ सकती है। किसानों का कहना है कि पिछले साल कीटों के हमले से गन्ने की पैदावार काफी प्रभावित हुई थी।
गन्ने के रकबे के आंकड़ों पर क्यों उठ रहे सवाल?
गन्ने के रकबे को लेकर सरकार और उद्योग के अलग-अलग आंकड़े अब चीनी नीति के लिए बड़ा मुद्दा बन गए हैं। एक उद्योग विशेषज्ञ के मुताबिक, गन्ने के रकबे का सही आकलन होना बहुत जरूरी है, क्योंकि इसी आधार पर सरकार चीनी उत्पादन, एथेनॉल के लिए गन्ने के इस्तेमाल और चीनी के आयात-निर्यात से जुड़ी नीतियां तय करती है।
विशेषज्ञ ने बताया कि 2025-26 सीजन में भी उत्पादन के अनुमान में बड़ा बदलाव हुआ था। जुलाई 2025 में उद्योग ने देश में कुल सकल चीनी उत्पादन का अनुमान 3.49 करोड़ टन लगाया था, लेकिन बाद में इसे घटाकर 3.09 करोड़ टन कर दिया गया। उत्पादन का सही अनुमान नहीं लग पाने का असर सरकार के नीतिगत फैसलों पर भी पड़ा। इसमें एथेनॉल के लिए गन्ने के रस और B-heavy molasses के इस्तेमाल पर लगी पाबंदियों का समय और चीनी निर्यात से जुड़े फैसले शामिल हैं।
उद्योग विशेषज्ञ के मुताबिक, घरेलू बाजार में चीनी की उपलब्धता पर दबाव बढ़ने के साथ सरकार को बाजार की जरूरत पूरी करने के लिए चीनी आयात पर ज्यादा निर्भर रहना पड़ सकता है।
ऐसे में 2026-27 का चीनी सीजन सिर्फ उत्तर प्रदेश के किसानों और चीनी मिलों के लिए ही नहीं, बल्कि देश के चीनी बाजार और सरकार की चीनी नीति के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण रहने वाला है।





