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ICAR ने तैयार की गन्ने की तीन नई किस्में, ज्यादा उपज, बेहतर रिकवरी और बीमारी से सुरक्षा पर फोकस

ICAR के शुगरकेन ब्रीडिंग इंस्टीट्यूट (SBI), कोयंबटूर ने गन्ने की तीन नई किस्में विकसित की हैं, जो व्यावसायिक मंजूरी के अंतिम चरण में हैं। इन किस्मों में ज्यादा पैदावार, बेहतर चीनी रिकवरी, रेड रॉट जैसी बीमारियों से सुरक्षा और जलवायु परिवर्तन के अनुकूल क्षमता पर विशेष ध्यान दिया गया है। वैज्ञानिकों का कहना है कि नई किस्में किसानों की आय बढ़ाने के साथ-साथ भविष्य में एथेनॉल उत्पादन और कम पानी में खेती को भी बढ़ावा देंगी।

Pooja Rai

Pooja Rai·29 Jul 2026

ICAR ने तैयार की गन्ने की तीन नई किस्में

ICAR ने तैयार की गन्ने की तीन नई किस्में

देश में गन्ने की खेती मौसम में बदलाव, सूखा, नई बीमारियों और कीटों के बढ़ते हमलों जैसी कई चुनौतियों का सामना कर रही है। खासकर रेड रॉट (लाल सड़न) बीमारी ने उत्तर भारत के कई इलाकों में किसानों की चिंता बढ़ा दी है। इन चुनौतियों से निपटने के लिए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के शुगरकेन ब्रीडिंग इंस्टीट्यूट (SBI), कोयंबटूर ने गन्ने की तीन नई किस्में विकसित की हैं। ये किस्में अब व्यवसायिक मंजूरी (Commercial Release) के अंतिम चरण में हैं और जल्द ही किसानों के लिए उपलब्ध हो सकती हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि इन किस्मों से किसानों को ज्यादा पैदावार, बेहतर चीनी रिकवरी और बीमारियों से सुरक्षा मिलेगी।

देश के अलग-अलग क्षेत्रों के लिए तैयार की गई हैं तीन नई किस्में

Co 20016 (करण-20)
ICAR ने अलग-अलग कृषि-जलवायु क्षेत्रों की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए तीन नई किस्में विकसित की हैं। Co 20016 (करण-20) उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र के लिए तैयार की गई है। यह हरियाणा, पंजाब, राजस्थान, उत्तराखंड और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों के लिए उपयुक्त मानी जा रही है। यह जल्दी तैयार होने वाली किस्म है, जिसमें अधिक पैदावार, बेहतर चीनी रिकवरी और रेड रॉट बीमारी के प्रति अच्छी प्रतिरोधक क्षमता है।

Co 18003
दूसरी किस्म Co 18003 दक्षिण और प्रायद्वीपीय राज्यों जैसे तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात और मध्य प्रदेश के लिए विकसित की गई है। यह मध्यम से देर से तैयार होने वाली किस्म है और लोकप्रिय किस्म Co 86032 की तुलना में अधिक उत्पादन देती है। साथ ही इसमें जूस की गुणवत्ता बेहतर है और यह रेड रॉट बीमारी के प्रति भी प्रतिरोधी है।

Co 09004
तीसरी किस्म Co 09004 तमिलनाडु के तटीय क्षेत्रों, आंध्र प्रदेश और ओडिशा के लिए तैयार की गई है। यह जल्दी तैयार होने वाली किस्म है, जिसमें अधिक उत्पादन, बेहतर जूस गुणवत्ता और रेड रॉट के साथ-साथ स्मट (Smut) बीमारी से भी सुरक्षा मिलती है। इस किस्म में फूल कम आते हैं, जिससे मौसम का उत्पादन पर कम असर पड़ता है।

नई किस्मों पर लगातार चल रहा है शोध

शुगरकेन ब्रीडिंग इंस्टीट्यूट केवल इन तीन किस्मों तक सीमित नहीं है। संस्थान में इस समय करीब 1,850 नई लाइनों (क्लोन) का शुरुआती स्तर पर परीक्षण चल रहा है। इसके अलावा 350 क्लोन एडवांस ट्रायल में हैं, जबकि 70 क्लोन देश के अलग-अलग राज्यों में मल्टी-लोकेशन ट्रायल के दौर से गुजर रहे हैं। इन परीक्षणों का उद्देश्य अलग-अलग जलवायु वाले क्षेत्रों के लिए ज्यादा उत्पादन देने वाली, बेहतर गुणवत्ता वाली और रोग प्रतिरोधी किस्में विकसित करना है।

ज्यादा पैदावार और बीमारी से बचाव पर जोर

संस्थान के निदेशक डॉ. पी. गोविंदराज के अनुसार, नई किस्में विकसित करते समय केवल अधिक पैदावार पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है। कोशिश ऐसी किस्में तैयार करने की है, जिनमें अधिक चीनी रिकवरी, रेड रॉट जैसी बीमारियों के प्रति प्रतिरोधक क्षमता, सूखा सहने की क्षमता और जलवायु परिवर्तन के अनुसार बेहतर प्रदर्शन जैसी खूबियां हों। उनका कहना है कि अधिक चीनी वाली किस्में भविष्य में एथेनॉल उत्पादन बढ़ाने में भी मदद करेंगी।

एथेनॉल उत्पादन को भी मिलेगा फायदा

फिलहाल ICAR एथेनॉल उत्पादन के लिए अलग से कोई विशेष गन्ना किस्म विकसित नहीं कर रहा है। हालांकि वैज्ञानिकों का कहना है कि जिन किस्मों में चीनी की मात्रा ज्यादा होती है, उनसे स्वाभाविक रूप से एथेनॉल उत्पादन भी अधिक होता है। इसलिए अधिक चीनी और ज्यादा पैदावार देने वाली नई किस्में एथेनॉल उद्योग के लिए भी फायदेमंद साबित होंगी।

जलवायु परिवर्तन को ध्यान में रखकर बदली गई रणनीति

अब गन्ना सुधार कार्यक्रम में जलवायु परिवर्तन और किसानों की बदलती जरूरतों को भी प्राथमिकता दी जा रही है। नई किस्मों में सूखा सहन करने की क्षमता, मशीन से कटाई के लिए उपयुक्त पौधे, कम कांटेदार पत्तियां, बेहतर बायोमास उत्पादन और गुड़ उद्योग के लिए बेहतर गुणवत्ता जैसी विशेषताओं को शामिल किया जा रहा है। वैज्ञानिकों का मानना है कि भविष्य में इन नई किस्मों से खेती ज्यादा टिकाऊ और लाभदायक बनेगी।

क्या भविष्य में कम पानी में होगी गन्ने की खेती?

वैज्ञानिकों का मानना है कि गन्ना ऐसी फसल है जिसे अच्छी पैदावार के लिए स्वाभाविक रूप से काफी पानी की जरूरत होती है। लेकिन भविष्य में कम पानी में अधिक उत्पादन देने वाली (Water Use Efficient - WUE) गन्ना किस्मों के विकास पर तेजी से काम किया जा रहा है। इसके साथ ही ड्रिप सिंचाई और सब-सर्फेस ड्रिप सिंचाई जैसी आधुनिक तकनीकों को अपनाकर गन्ने की खेती में पानी की खपत को काफी हद तक कम किया जा सकता है। इससे किसानों की सिंचाई लागत भी घटेगी और पानी का बेहतर उपयोग हो सकेगा।

रेड रॉट सबसे बड़ा खतरा, दक्षिण भारत में भी कई बीमारियां बनी चुनौती

वैज्ञानिकों के अनुसार, इस समय भारत में गन्ने की खेती के लिए सबसे बड़ा खतरा रेड रॉट (लाल सड़न) बीमारी है। खासकर उत्तर भारत में इसका नया स्ट्रेन Cf13 तेजी से फैल रहा है, जिसने कई लोकप्रिय गन्ना किस्मों को प्रभावित किया है। इसके अलावा दक्षिण भारत के कई राज्यों में पोक्का बोइंग (Pokkah Boeng) और क्राउन मिलीबग (Crown Mealy Bug) भी किसानों के लिए बड़ी समस्या बने हुए हैं। यही वजह है कि नई गन्ना किस्मों में इन बीमारियों के प्रति प्रतिरोधक क्षमता विकसित करने पर विशेष जोर दिया जा रहा है।

Co 0238 किस्म से मिली बड़ी सीख

एक समय Co 0238 देश की सबसे लोकप्रिय गन्ना किस्म थी। उत्तर प्रदेश में अकेले इसकी खेती करीब 82 प्रतिशत क्षेत्र में होने लगी थी। लेकिन लगातार एक ही किस्म की खेती, समय पर बीज नहीं बदलना, जलभराव वाले क्षेत्रों में इसकी खेती और रेड रॉट के नए स्ट्रेन Cf13 के फैलने से यह किस्म बड़े पैमाने पर बीमारी की चपेट में आ गई। इससे किसानों और चीनी उद्योग दोनों को नुकसान उठाना पड़ा।
वैज्ञानिकों का कहना है कि किसी भी एक किस्म पर पूरी तरह निर्भर नहीं रहना चाहिए। हर क्षेत्र में कम से कम 5 से 6 अलग-अलग गन्ना किस्मों की खेती होनी चाहिए। साथ ही समय-समय पर रोगमुक्त बीज का उपयोग, बीज उपचार, जैविक खाद का इस्तेमाल, मिट्टी की सेहत सुधारने और कीट-रोगों की नियमित निगरानी जैसी अच्छी कृषि पद्धतियों को अपनाना जरूरी है।

किसानों के लिए क्या है सलाह?

ICAR का मानना है कि आने वाले समय में गन्ने की खेती को सफल बनाने के लिए केवल नई किस्में ही काफी नहीं होंगी। किसानों को बेहतर बीज, आधुनिक सिंचाई तकनीक, फसल विविधीकरण और वैज्ञानिक सलाह को भी अपनाना होगा। यदि नई किस्मों के साथ सही खेती तकनीकों का उपयोग किया जाए, तो गन्ने की पैदावार बढ़ाने के साथ-साथ बीमारी, पानी की कमी और जलवायु परिवर्तन से होने वाले नुकसान को भी काफी हद तक कम किया जा सकता है। यही वजह है कि ICAR लगातार ऐसी नई किस्में विकसित करने में जुटा है, जो किसानों और चीनी उद्योग दोनों की जरूरतों को एक साथ पूरा कर सकें।

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