भारत में सोयाबीन की खेती करने वाले किसानों के लिए इस बार मौसम और बाजार, दोनों चुनौती बने हुए हैं। बुवाई के समय बारिश में अनियमितता और खेती का रकबा घटने की वजह से 2026-27 में देश का सोयाबीन उत्पादन कम रहने का अनुमान है। वहीं, बेहतर भाव और ज्यादा कमाई की उम्मीद में कुछ किसान सोयाबीन की जगह कपास और मक्का की खेती की ओर भी जा रहे हैं।
अमेरिका के कृषि विभाग की विदेश कृषि सेवा यानी USDA FAS की नई रिपोर्ट के मुताबिक, 2026-27 में भारत का सोयाबीन उत्पादन करीब 96 लाख टन रहने का अनुमान है। पहले यह आंकड़ा 104 लाख टन था। यानी उत्पादन के अनुमान में करीब 8 फीसदी की कमी की गई है।
सोयाबीन का रकबा भी घटा
उत्पादन कम होने की एक बड़ी वजह इसकी खेती का रकबा घटना है। रिपोर्ट के मुताबिक, 2026-27 में देश में सोयाबीन की खेती करीब 1.05 करोड़ हेक्टेयर में होने का अनुमान है। पहले इसका अनुमान 1.12 करोड़ हेक्टेयर था। यानी खेती का क्षेत्र करीब 6 फीसदी कम रहने की उम्मीद है।
सोयाबीन की बुवाई के समय बारिश का ठीक से न होना किसानों के लिए परेशानी बना। कई जगह बुवाई में देरी हुई, जबकि कुछ इलाकों में किसानों को दोबारा बुवाई करनी पड़ी।
महाराष्ट्र में बदली किसानों की पसंद
देश के प्रमुख सोयाबीन उत्पादक राज्यों में शामिल महाराष्ट्र में मौसम का असर ज्यादा देखने को मिला। यहां कुछ किसानों ने सोयाबीन की जगह कपास और मक्का की खेती को प्राथमिकता दी।
कपास की कीमतों में मजबूती और मक्का से बेहतर कमाई की उम्मीद इसकी बड़ी वजह रही। मक्का की मांग खास तौर पर इथेनॉल उत्पादन और पशु चारे में बढ़ रही है। ऐसे में किसानों को यह फसल ज्यादा फायदेमंद नजर आ रही है।
हालांकि, जुलाई में अच्छी बारिश होने के बाद महाराष्ट्र के कुछ हिस्सों में सोयाबीन की बुवाई में सुधार हुआ। लेकिन शुरुआती मौसम की परेशानी का असर पूरे सीजन के रकबे पर पड़ा है।
मध्य प्रदेश में मौसम ने दिया साथ
महाराष्ट्र के मुकाबले मध्य प्रदेश में सोयाबीन की खेती के लिए मौसम बेहतर रहा। पूरे सीजन में अच्छी बारिश होने से यहां किसानों को राहत मिली।
रिपोर्ट के मुताबिक, मानसून की शुरुआत में देरी और एल नीनो के असर की वजह से खरीफ सीजन में सोयाबीन की बुवाई धीमी रही। इसके बाद जुलाई में हुई बारिश से स्थिति में कुछ सुधार जरूर हुआ, लेकिन शुरुआत में हुई कमी पूरी तरह नहीं भर पाई।
नई किस्मों से उत्पादन बढ़ने की उम्मीद
कम रकबे के बावजूद सोयाबीन की कुछ नई और अधिक उत्पादन देने वाली किस्में किसानों को राहत दे सकती हैं। रोगों से बचाव वाली बेहतर किस्मों से कम जमीन में भी ज्यादा उत्पादन लिया जा सकता है।
लेकिन रिपोर्ट में कहा गया है कि कई किसान अभी भी पुरानी किस्मों पर निर्भर हैं। इनमें जेएस 9560 जैसी किस्म शामिल है। नई किस्मों की तुलना में इन पुरानी किस्मों से उत्पादन कम मिलने की बात सामने आई है।
सोयाबीन की पेराई भी घट सकती है
कम उत्पादन का असर सोयाबीन की पेराई पर भी पड़ेगा। 2026-27 में करीब 87 लाख टन सोयाबीन की पेराई होने का अनुमान है। पहले इसका अनुमान 93 लाख टन था। यानी इसमें करीब 6 फीसदी की कमी की गई है।
सोयाबीन की पेराई से तेल और खली तैयार होती है। इसलिए इसकी उपलब्धता कम होने पर इन उत्पादों के उत्पादन पर भी असर पड़ सकता है।
खाने में सोयाबीन की मांग बढ़ेगी
एक तरफ सोयाबीन का उत्पादन घटने का अनुमान है, तो दूसरी तरफ खाने के लिए इसकी मांग बढ़ रही है। रिपोर्ट के मुताबिक, 2026-27 में खाद्य इस्तेमाल के लिए सोयाबीन की खपत करीब 4 फीसदी बढ़ सकती है।
टोफू, सोया दूध और सोया आटा जैसे उत्पादों की मांग बढ़ने से इसकी खपत में बढ़ोतरी की उम्मीद है।
मुर्गी पालन में सोयामील की मांग बढ़ी
सोयाबीन से निकलने वाली सोयामील यानी खली की मांग भी बढ़ने का अनुमान है। खासकर मुर्गी पालन करने वाली कंपनियां इसका ज्यादा इस्तेमाल कर सकती हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक, 2026-27 में पशु आहार के लिए सोयामील की मांग पहले के अनुमान से करीब 25 फीसदी ज्यादा रह सकती है। इसकी एक वजह मक्के की बढ़ती मांग है।
मक्का का इस्तेमाल इथेनॉल बनाने में बढ़ने से पशु और मुर्गी चारे के लिए इसकी उपलब्धता पर दबाव बढ़ रहा है। ऐसे में मुर्गी पालन उद्योग प्रोटीन के लिए सोयामील का इस्तेमाल बढ़ा रहा है।
हालांकि, इसके बावजूद 2026-27 में पशु आहार के लिए सोयामील की खपत 2025-26 के मुकाबले करीब 18 फीसदी कम रहने का अनुमान है।
सोयामील का उत्पादन भी घटेगा
कम सोयाबीन उत्पादन और कम पेराई का असर सोयामील पर भी पड़ेगा। 2026-27 में इसका उत्पादन करीब 70 लाख टन रहने का अनुमान है, जो पहले लगाए गए अनुमान से करीब 6 फीसदी कम है।
इसका असर देश से होने वाले सोयामील के निर्यात पर भी पड़ सकता है। रिपोर्ट में इसके निर्यात के अनुमान में करीब 29 फीसदी की कटौती की गई है।
चार साल के निचले स्तर पर जा सकता है निर्यात
देश में सोयामील की कीमत बढ़ने और उपलब्धता कम होने की वजह से इसका निर्यात चार साल के सबसे निचले स्तर पर पहुंच सकता है।
महंगे दाम के कारण विदेशी खरीदारों ने भारत की जगह ब्राजील और अर्जेंटीना जैसे देशों से सस्ता माल खरीदना शुरू कर दिया है। इससे भारतीय सोयामील की विदेशों में मांग पर असर पड़ा है।
सोयाबीन का आयात बढ़ने का अनुमान
दूसरी तरफ, भारत में सोयाबीन का आयात बढ़ सकता है। रिपोर्ट में 2026-27 के लिए आयात का अनुमान बढ़ाकर 5 लाख टन कर दिया गया है। पहले यह अनुमान सिर्फ 2 लाख टन था।
यह आयात मुख्य रूप से अफ्रीकी देशों में अच्छी फसल होने पर निर्भर करेगा। बेनिन, नाइजर और टोगो भारत के लिए गैर-आनुवंशिक रूप से संशोधित सोयाबीन के प्रमुख स्रोत हैं।
इन देशों से आने वाली कुछ सोयाबीन पर कम विकसित देशों के लिए बनी व्यापार व्यवस्था के तहत शुल्क नहीं लगता। इसलिए वहां से भारत को सोयाबीन मिलना आसान रहता है।
हालांकि, आने वाले समय में अफ्रीकी देशों में सोयाबीन की पेराई और प्रसंस्करण की क्षमता बढ़ने से भारत के लिए वहां से आने वाली मात्रा कम हो सकती है।





