भारत में सरसों तिलहन की प्रमुख फसलों में शामिल है। देश में खाद्य तेल की मांग को पूरा करने और किसानों की कमाई बढ़ाने के लिए सरसों का उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ बेहतर गुणवत्ता वाली किस्मों को अपनाना भी जरूरी है। इसी दिशा में पूसा डबल जीरो मस्टर्ड-36 एक खास किस्म है, जिसे तेल और खली की गुणवत्ता बेहतर बनाने के उद्देश्य से विकसित किया गया है। इसकी खासियत है कि इसके तेल में इरुसिक एसिड और बीज की खली में ग्लूकोसिनोलेट्स की मात्रा काफी कम है।
तेल में 0.45% इरुसिक एसिड
ICAR के अनुसार, पूसा डबल जीरो मस्टर्ड-36 के तेल में इरुसिक एसिड की मात्रा 0.45 प्रतिशत है। वहीं, इसके बीज से तेल निकालने के बाद बचने वाली खली में ग्लूकोसिनोलेट्स की मात्रा 19.50 पीपीएम बताई गई है। इसके मुकाबले पारंपरिक सरसों की किस्मों में इरुसिक एसिड 40 प्रतिशत से अधिक और ग्लूकोसिनोलेट्स 120 पीपीएम से अधिक हो सकते हैं।
इरुसिक एसिड कम होना क्यों अच्छा है?
सरसों के तेल में इरुसिक एसिड की मात्रा कम होना खाद्य तेल की गुणवत्ता के लिहाज से बेहतर माना जाता है। वहीं, अधिक मात्रा में इरुसिक एसिड का सेवन स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है। पशुओं पर किए गए अध्ययनों में इसकी अधिक मात्रा का संबंध हृदय की मांसपेशियों पर पड़ने वाले प्रभावों से पाया गया है।
तेल और खली, दोनों की गुणवत्ता पर जोर
इस किस्म की खासियत सिर्फ तेल की गुणवत्ता तक सीमित नहीं है। सरसों से तेल निकालने के बाद बचने वाली खली का इस्तेमाल पशु आहार में भी किया जाता है। खली में ग्लूकोसिनोलेट्स की कम मात्रा पशु आहार के लिहाज से फायदेमंद हो सकती है। इस तरह यह किस्म खाद्य तेल और पशु आहार, दोनों की गुणवत्ता सुधारने की दिशा में महत्वपूर्ण है।
किसानों को क्या हो सकता है फायदा?
बेहतर गुणवत्ता वाले सरसों के तेल और खली की बाजार में मांग किसानों के लिए नए अवसर पैदा कर सकती है। हालांकि, इस किस्म से किसानों को कितना आर्थिक लाभ मिलेगा, यह इसकी उपज, खेती की लागत, बाजार में मांग और मिलने वाले मूल्य पर निर्भर करेगा। इसलिए इसकी खेती करने से पहले किसान अपने क्षेत्र के कृषि विज्ञान केंद्र या संबंधित कृषि संस्थान से इसकी उपयुक्तता, बीज की उपलब्धता और उत्पादन क्षमता की जानकारी जरूर लें।





