चंडीगढ़। पंजाब में फसल विविधीकरण की कोशिशों के बावजूद इस खरीफ सीजन में धान की खेती का रकबा अब तक के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गया है। पंजाब कृषि विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, इस साल राज्य में 32.76 लाख हेक्टेयर में धान बोया गया है। इसमें बासमती और गैर-बासमती दोनों शामिल हैं।
पंजाब में खरीफ सीजन में कुल करीब 36 लाख हेक्टेयर जमीन पर खेती होती है। यानी इस बार 90 फीसदी से ज्यादा खरीफ क्षेत्र में धान है। यह स्थिति ऐसे समय में है, जब राज्य में लगातार गिरते भूजल स्तर को देखते हुए किसानों को धान से दूसरी फसलों की ओर जाने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है।
तीन साल में ऐसे बढ़ा धान का रकबा
धान का कुल रकबा 2023-24 में 31.79 लाख हेक्टेयर था, जो 2024-25 में बढ़कर 32.43 लाख हेक्टेयर हो गया। इस साल यह और बढ़कर 32.76 लाख हेक्टेयर पहुंच गया है।
गैर-बासमती धान का रकबा 2023-24 में 25.83 लाख हेक्टेयर था। 2024-25 में यह घटकर 25.63 लाख हेक्टेयर हुआ, लेकिन इस साल फिर बढ़कर 25.90 लाख हेक्टेयर हो गया।
वहीं, बासमती का रकबा लगातार बढ़ा है। यह 2023-24 में 6.39 लाख हेक्टेयर, 2024-25 में 6.80 लाख हेक्टेयर और इस साल 6.86 लाख हेक्टेयर हो गया है।
बासमती बढ़ी, लेकिन धान का कुल रकबा भी बढ़ा
बासमती का रकबा बढ़ना कुछ हद तक सकारात्मक माना जा सकता है। इसकी फसल अवधि सामान्य धान की तुलना में करीब एक महीने कम होती है और इसमें पानी की जरूरत भी अपेक्षाकृत कम हो सकती है। इसके अलावा बासमती को निर्यात बाजार से बेहतर दाम मिलने की संभावना रहती है।
लेकिन समस्या यह है कि बासमती बढ़ने के बावजूद पंजाब में धान का कुल रकबा कम नहीं हुआ। यहां तक कि 2015 में बासमती करीब 7.63 लाख हेक्टेयर में बोई गई थी, जबकि इस साल इसका रकबा 6.86 लाख हेक्टेयर है।
कपास और मक्का जैसी फसलें पीछे छूटीं
धान से दूसरी फसलों की ओर जाने की कोशिशों के बीच कपास, मक्का और गन्ने का रकबा उम्मीद के मुताबिक नहीं बढ़ा है।
कपास का रकबा 2015 में करीब 3.35 लाख हेक्टेयर था, जो इस साल घटकर लगभग 80 हजार हेक्टेयर रह गया है। यानी इसमें 76 फीसदी से ज्यादा की गिरावट आई है।
इसी तरह मक्का का रकबा 2015-16 में 1.26 लाख हेक्टेयर था, लेकिन हाल के वर्षों में यह एक लाख हेक्टेयर से नीचे बना हुआ है। गन्ने का रकबा भी 2015-16 से अब तक करीब 90-95 हजार हेक्टेयर के आसपास ही रहा है।
इसका मतलब है कि कपास जैसी फसलों के घटते रकबे की भरपाई दूसरी वैकल्पिक फसलें नहीं कर पाई हैं।
ज्यादा रकबे के बावजूद उत्पादकता में बड़ा सुधार नहीं
धान का रकबा बढ़ने के बावजूद उत्पादकता में उसी अनुपात में सुधार नहीं हुआ है। गैर-बासमती धान की औसत पैदावार 2023-24 में 7,172 किलो प्रति हेक्टेयर थी, जो 2024-25 में घटकर 7,101 किलो प्रति हेक्टेयर रह गई।
इस दौरान गैर-बासमती धान का उत्पादन भी 185.3 लाख टन से घटकर 182 लाख टन रह गया।
दूसरी ओर, बासमती की औसत पैदावार 4,866 किलो प्रति हेक्टेयर से बढ़कर 5,047 किलो प्रति हेक्टेयर हुई।
भूजल पर बढ़ रहा दबाव
पंजाब में धान का लगातार बढ़ता रकबा सबसे बड़ी चिंता भूजल को लेकर है। राज्य के कई हिस्सों में खेती के लिए भूजल का लगातार दोहन हो रहा है। विशेषज्ञ लंबे समय से चेतावनी देते रहे हैं कि अगर फसल चक्र में बड़ा बदलाव नहीं किया गया तो आने वाले वर्षों में पानी का संकट और गंभीर हो सकता है।
कृषि विशेषज्ञ डॉ. सरदारा सिंह जौहल भी लंबे समय से पंजाब में फसल विविधीकरण की जरूरत पर जोर देते रहे हैं। उनका कहना है कि किसानों से सिर्फ धान छोड़ने की अपील करने से बदलाव नहीं आएगा। दूसरी फसलों के लिए भी पक्का बाजार, बेहतर दाम और आय की सुरक्षा जरूरी है।
किसानों को MSP और खरीद की गारंटी चाहिए
पंजाब कृषि विभाग के संयुक्त निदेशक नरिंदर सिंह बेनीपाल के मुताबिक, सरकार बासमती का रकबा बढ़ाने पर काम कर रही है। उन्होंने बताया कि इस साल डायरेक्ट सीडेड राइस (DSR) का क्षेत्र भी 36 फीसदी बढ़ा है, जिससे पानी की बचत में मदद मिल सकती है।
हालांकि, उनका कहना है कि किसान तभी बड़े स्तर पर दूसरी फसलों की ओर जाएंगे, जब उन्हें MSP और सरकारी खरीद की गारंटी मिलेगी। यानी पंजाब में फसल विविधीकरण की चुनौती सिर्फ किसानों की पसंद की नहीं है। असली सवाल यह है कि क्या धान के मुकाबले दूसरी फसलों को भी उतना ही भरोसेमंद बाजार, कीमत और आय की सुरक्षा मिल पा रही है? यही तय करेगा कि पंजाब धान के बढ़ते रकबे को रोककर टिकाऊ खेती की ओर कितना आगे बढ़ पाता है।
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