"जिस तरह से मुर्गियों का खाना महंगा हो रहा है, आने वाले समय में हमारे लिए यह धंधा बेहद नुकसानदायक साबित होगा। कच्चा माल मिल नहीं रहा। अगर मिल भी रहा है तो कीमत ज्यादा है। एक महीने के अंदर लागत 15 से 25% बढ़ चुकी है जबकि उस हिसाब से अंडे या मुर्गे का भाव नहीं बढ़ा पा रहे हैं।"
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से लगभग 300 किलोमीटर दूर आजमगढ़ के मुर्गीपालक चंदन राय फोन पर न्यूज पोटली को यह भी बताते हैं कि बढ़ी लागत का बोझ ग्राहकों पर डाल नहीं सकते लेकिन खुद आखिर कब तक नुकसान उठाएंगे।
जिस मुर्गी के अंडे और चिकन को आम लोगों के लिए प्रोटीन का सस्ता विकल्प जाता है, अब उस मुर्गी को पालना किसानों के लिए महंगा सौदा बनता जा रहा है। पोल्ट्री फार्म में मुर्गियों को दाना खिलाने से लेकर उन्हें बाजार तक पहुंचाने की लागत लगातार बढ़ रही है। एक रिपोर्ट का दावा है कि पोल्ट्री किसानों को इस समय लगभग 15 फीसदी क नुकसान उठाना पड़ रहा है। सरसों की खली से लेकर चावल की भूसी, मक्का और पशु आहार में इस्तेमाल होने वाले कई कच्चे माल की कीमतों में भारी बढ़ोतरी हुई है। लेकिन दूसरी तरफ पोल्ट्री कारोबार से जुड़े किसान और व्यापारियों का कहना है कि इस हिसाब से अंडे से जुड़े उत्पादों की कीमत में बढ़ोतरी नहीं हो रही है।

अब सवाल यह है कि पोल्ट्री फीड इतना महंगा क्यों हो रहा है? इसके लिए एक नहीं, कई वजहें हैं। मौसम की अनिश्चितता और मक्का उत्पादन पर पड़ा असर,कमजोर और सूखे जैसी परिस्थितियों ने कुछ प्रमुख मक्का उत्पादक राज्यों में उत्पादन को प्रभावित किया है। दूसरी तरफ पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने के लिए मक्के की बढ़ती मांग भी इसकी कीमतों में बढ़ोतरी की एक प्रमुख वजह है। यानी एक तरफ पोल्ट्री उद्योग को मुर्गियों के दाने के लिए मक्का चाहिए तो दूसरी तरफ एथेनॉल बनाने वाली कंपनियां भी इसी मक्के की बड़ी खरीदार बनकर सामने आई हैं। इसका असर मक्के की कीमतों पर पड़ रहा जिसकी वजह से पोल्ट्री किसान अब परेशान हैं।
महंगे फीड ने बिगाड़ा पोल्ट्री का गणित
महंगाई सिर्फ मक्के तक सीमित नहीं है। पोल्ट्री फीड में इस्तेमाल होने वाली दूसरी चीजें भी तेजी से महंगी हुई है। एक रिपोर्ट के अनुसार सरसों की खली की कीमत 75 फीसदी, डी-ऑयल्ड राइस ब्रान मील की 68 फीसदी, कॉर्न DDGS की 66 फीसदी और मूंगफली की खली की कीमत 43 फीसदी तक बढ़ चुकी है। वहीं मक्के के दाम में भी लगभग 8 फीसदी तक बढ़ोतरी हुई है। चूंकि पोल्ट्री उत्पादन की कुल लागत का करीब 60 फीसदी हिस्सा खाने यानी फीड पर खर्च होता है, इसलिए कीमतों में बढ़ोतरी का सीधा असर किसानों के मुनाफे पर पड़ रहा है। तो आने वाले समय में पोल्ट्री कारोबार और संकट में होगा?
यूपी पॉल्ट्री एसोसिएशन के अध्यक्ष अकबर अली बताते हैं कि मुर्गी पालन से जुड़े किसान इस समय दोहरी चिंता में हैं। आने वाले समय में अगर पोल्ट्री फीड महंगा हुआ तो चिकन और अंडे का रेट बढ़ाना होगा। अगर ऐसा हुआ तो बाजार में मांग कम हो सकती है। अगर मांग कम हुई तो भी किसानों को नुकसान उठाना पड़ सकता है। कुल मिलाकर स्थिति सही नहीं है।
फाइनेंशियल एक्सप्रेस की जुलाई 2026 की एक रिपोर्ट बताती है कि पोल्ट्री फीड की कीमत एक साल में करीब 3600 रुपए प्रति क्विंटल से बढ़कर 4400 रुपए प्रति क्विंटल तक पहुंच गई थी। मतलब लगभग 22 फीसदी की बढ़ोतरी। इस रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि ब्रॉयलर चिकन के उत्पादन खर्च में फीड की हिस्सेदारी लगभग 65 है। मतलब है कि फीड की कीमतों में बढ़ोतरी का असर उत्पादन लागत पर पड़ना तय है।
ऐसे में इन सब का असर अंडे और मुर्गे की बिक्री पर पड़ेगा। अकबर अली आगे बताते हैं कि किसान या व्यापारी अपनी मर्जी से चिकन की कीमत नहीं बढ़ा सकता। उन्हें बाजार की मांग और बिक्री के भाव के हिसाब से ही रेट तय करने होते हैं। खतरा यह है कि अगर कीमत बढ़ी तो खपत और आपूर्ति प्रभावित हो सकती है। ऐसे में विकल्प यही है कि या तो किसान इस कारोबार से बाहर हो जाए या कम उत्पादन के साथ नुकसान उठाते हुए इसमें बना रहे।
मौसम की मार ने बढ़ाई मुश्किल
पोल्ट्री फीड की कीमतों पर मौसम का असर साफ है। कंपाउंड लाइवस्टॉक फीड मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (CLFMA) के अध्यक्ष दिव्या कुमार गुलाटी के मुताबिक देश में पोल्ट्री फीड की सालाना जरूरत लगभग 3 करोड़ टन है और इसमें हर साल करीब 30 से 35 लाख टन की बढ़ोतरी हो रही है। ऐसे में मक्के का उत्पाद या उपलब्धता में थोड़ी सी कमी भी पोल्ट्री कारोबार के लिए बड़ी चुनौती बन सकती है। इस साल महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे प्रमुख मक्का उत्पादक राज्यों में कमजोर मानसून और सूखे की परिस्थितियों ने उत्पादन प्रभावित किया है। पोल्ट्री उत्पादों के महंगा होने की एक वजह यह भी है।
सितंबर महीने की 29 तारीख को महाराष्ट्र में मक्के की कीमत पिछले साल के 18-20 रुपए प्रति किलो से बढ़कर करीब 28 रुपए प्रति किलो पहुंच गई थी। मक्के की कीमतों में तेजी नवंबर महीने में भी जारी रही। 5 नवंबर की इकोनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, मक्के का भाव नवंबर 2025 में करीब 18 रुपये प्रति किलो था, जो नवंबर 2026 में बढ़कर लगभग 34 रुपये प्रति किलो पहुंच गया। यानी एक साल में कीमत लगभग दोगुनी हो गई। रिपोर्ट के मुताबिक, महाराष्ट्र और कर्नाटक में कमजोर मानसून के कारण खरीफ मक्का उत्पादन में 15-16 फीसदी गिरावट का उद्योग का अनुमान है।
एथेनॉल भी एक बड़ी वजह
बताया जा रहा है कि मक्के की बढ़ी कीमतों के पीछे एथेनॉल उद्योग की बढ़ती मांग भी है। दरअसल केंद्र सरकार ने पेट्रोल में एथेनॉल मिश्रण बढ़ाने की नीति पर काम कर रही है। इसके लिए
गन्ने के अलावा मक्के का भी इस्तेमाल किया गया। ऐसे में एथेनॉल बनाने कंपनियों की मक्के की मांग बढ़ गई। ऐसे में पशु आहार से जुड़े कारोबारियों की लागत बढ़ गई। जब उनकी लागत बढ़ी तो उत्पाद भी महंगे हो गये।

APEDA के जुलाई 2025 के मक्का मार्केट इंटेलिजेंस डैशबोर्ड के मुताबिक, एथेनॉल उत्पादन के लिए मक्के का इस्तेमाल 2023-24 में 76 लाख टन था, जो 2024-25 में बढ़कर 92 लाख टन हो गया। 2025-26 के लिए इसके 128 लाख टन तक पहुंचने का अनुमान लगाया गया था। यानी दो साल में एथेनॉल उद्योग के लिए मक्के के इस्तेमाल में करीब 68 फीसदी बढ़ोतरी का अनुमान था।
ये तो अनुमान रहा। लेकिन अब मक्के की कीमत और उससे बने उत्पादों की कीमत और बढ़ने वाली है। क्योंकि एथेनॉल उत्पादन के लिए गन्ने के इस्तेमाल पर रोक लगाने के बाद केंद्र सरकार ने अब चावल के इस्तेमाल पर भी सीमा तय कर दी है। सरकार के इस फैसले से एथेनॉल बनाने वाली कंपनियों की निर्भरता मक्के पर बढ़ सकती है। उद्योग जगत के अनुमान के मुताबिक, 2026-27 में एथेनॉल उत्पादन के लिए मक्के की मांग करीब 1.6 करोड़ टन तक पहुंच सकती है, जबकि चालू आपूर्ति वर्ष में यह लगभग 1.3 करोड़ टन रहने का अनुमान है।
महंगा हो सकता है चिकन और अंडा
चिकन और अंडे पर महंगाई की मार पड़ने लगी है और आने वाले समय में कीमत और बढ़ सकती है। पांच नवंबर को इकोनॉमिक टाइम्स ने अपनी एक रिपोर्ट में बताया कि दिसंबर तक चिकन और अंडों की कीमतों में 25 से 30 फीसदी तक बढ़ सकती है। रिपोर्ट में दिए गए उद्योग के अनुमानों के अनुसार, थोक बाजार में अंडे की कीमत 6-7 रुपए प्रति अंडे से बढ़कर 7-8 रुपए तक पहुंच सकती है। वहीं, बिना खाल वाले ड्रेस्ड चिकन की थोक कीमत 225-250 रुपए प्रति किलो से बढ़कर 260-275 रुपए प्रति किलो होने का अनुमान है।
फीड की महंगाई का असर केवल पोल्ट्री किसानों तक सीमित नहीं है। डेयरी किसानों के सामने भी चारे की उपलब्धता और बढ़ती लागत की चुनौती है। खासकर सूखे से प्रभावित इलाकों में हरे चारे की कमी और खरीद की बढ़ती कीमतों ने पशुपालन का खर्च बढ़ा दिया है। यानी मौसम की मार का असर पोल्ट्री के साथ-साथ डेयरी कारोबार पर भी पड़ रहा है।
बढ़ती लागत और मक्के की उपलब्धता को लेकर पोल्ट्री उद्योग अब सरकार से राहत की मांग कर रहा है। उद्योग से जुड़े संगठनों ने मक्के के आयात को आसान बनाने और शुल्क मुक्त आयात की अनुमति देने की मांग उठाई है। इसके अलावा, भारतीय खाद्य निगम (FCI) के ऐसे अनाज को भी पशु आहार के लिए उपलब्ध कराने की मांग की गई है, जो मानव उपभोग के योग्य नहीं हैं। इससे पोल्ट्री और डेयरी उद्योग को सस्ते कच्चे माल का एक विकल्प मिल सकता है।





