उत्तर प्रदेश देश के प्रमुख आलू उत्पादक राज्यों में शामिल है। यहां बड़ी संख्या में किसान आलू की खेती पर निर्भर हैं। आलू ऐसी फसल है जिसकी मांग सालभर बनी रहती है और घर की रसोई से लेकर चिप्स, फ्रेंच फ्राइज और दूसरे खाद्य उत्पादों तक इसका इस्तेमाल होता है। लेकिन अच्छी पैदावार और बेहतर दाम के लिए सिर्फ आलू की बुवाई कर देना काफी नहीं है। खेत की तैयारी, सही समय पर बुवाई, अच्छे बीज, सिंचाई और खाद का संतुलित इस्तेमाल बेहद जरूरी है।
बहराइच के प्रगतिशील किसान जय सिंह पिछले 40 साल से आलू और केले की खेती कर रहे हैं। लंबे अनुभव के दौरान उन्होंने आलू की खेती का ऐसा तरीका विकसित किया है, जिसमें खेत की तैयारी से लेकर सिंचाई और खाद देने तक हर काम एक तय तरीके से किया जाता है। जय सिंह का दावा है कि इन तकनीकों को अपनाकर वह आलू की पैदावार को सामान्य से करीब दोगुना तक ले जाते हैं। उनका मानना है कि आलू की खेती में मुनाफा मेहनत के साथ-साथ सही समय और सही तकनीक पर निर्भर करता है।
सबसे पहले खेत की तैयारी
जय सिंह के मुताबिक आलू की अच्छी फसल की शुरुआत बुवाई से पहले ही हो जाती है। वह केले की फसल लेने के बाद खेत की अच्छी तरह तैयारी करते हैं। इसके लिए खेत में तीन बार रोटावेटर चलाया जाता है, ताकि मिट्टी अच्छी तरह भुरभुरी हो जाए और खेत में नमी भी बनी रहे। इसके बाद प्रति एकड़ करीब 500 से 600 घनफुट गोबर की खाद डाली जाती है। इससे मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने में मदद मिलती है।
11 इंच ऊंची क्यारियों में बुवाई
खेत तैयार होने के बाद जय सिंह करीब 11 इंच ऊंची क्यारियां बनाते हैं। उनका कहना है कि क्यारियों की सही ऊंचाई से पानी का निकास बेहतर रहता है और फसल के आसपास नमी भी नियंत्रित रहती है। क्यारियां बनाने के लिए कल्टीवेटर और लेवलर का इस्तेमाल किया जाता है।
21 अक्टूबर से 10 नवंबर तक बुवाई
आलू की बुवाई के समय को लेकर भी जय सिंह काफी सावधानी बरतते हैं। उनके मुताबिक 21 अक्टूबर से 10 नवंबर के बीच आलू की बुवाई करना बेहतर रहता है। इस समय बुवाई करने से फसल को बढ़वार के लिए अनुकूल मौसम मिल जाता है और पैदावार भी अच्छी रहती है।
रोग-मुक्त बीज का चयन जरूरी
जय सिंह के मुताबिक आलू की खेती में बीज का चुनाव सबसे अहम है। वह 40 से 50 ग्राम वजन वाले अच्छे और रोग-मुक्त बीज आलू इस्तेमाल करने की सलाह देते हैं। एक एकड़ में करीब 12 से 15 क्विंटल की जरूरत पड़ती है।
बुवाई से पहले बीज का ट्रीटमेंट भी किया जाता है। इसके लिए वह बीज पर पहले Emesto Prime का छिड़काव करते हैं। इसके बाद Dithane M-45 और Plaster of Paris से उपचार करके बीज को छांव में सुखाया जाता है। इसके बाद ही इसकी बुवाई की जाती है।
जरूरत के हिसाब से सिंचाई
आलू की फसल में सिंचाई को लेकर भी जय सिंह का अपना तरीका है। पहली सिंचाई में वह खेत में इतना ही पानी देते हैं कि क्यारी की ऊंचाई का करीब एक-तिहाई हिस्सा यानी लगभग 35 प्रतिशत ही भीगे। उनके मुताबिक इससे जरूरत के मुताबिक नमी बनी रहती है और पानी की बर्बादी कम होती है।
जय सिंह बताते हैं कि 15 दिसंबर के बाद जब फसल की छतरी अच्छी तरह बन जाती है, तब सिंचाई पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है। फसल की स्थिति देखकर पानी दिया जाता है, जिससे पौधों की बढ़वार बेहतर रहती है।
खाद की तय मात्रा
पौधों की अच्छी बढ़वार और बेहतर पैदावार के लिए जय सिंह खाद की मात्रा भी तय रखते हैं। वह एक एकड़ में NPK 12:32:16 के तीन बोरे इस्तेमाल करते हैं। इसके अलावा शुरुआत में एक बोरा यूरिया और करीब 45 दिन बाद एक बोरा यूरिया दिया जाता है।
इसके साथ ही मैग्नीशियम और जिंक 20-20 किलो प्रति एकड़ देने की बात भी वह बताते हैं। उनका कहना है कि संतुलित पोषण से पौधों की बढ़वार अच्छी होती है और फसल की पैदावार बढ़ाने में मदद मिलती है।
जय सिंह के लिए आलू की खेती सिर्फ एक फसल नहीं, बल्कि 40 साल के अनुभव से तैयार किया गया खेती का मॉडल है। उनका कहना है कि किसान अगर खेत की तैयारी से लेकर बीज चयन, बुवाई, सिंचाई और खाद देने तक हर काम सही समय पर और सही तरीके से करें, तो आलू की खेती से अच्छी पैदावार हासिल की जा सकती है।
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