केंद्र सरकार ने पैराक्वाट डाइक्लोराइड नाम के खरपतवारनाशक (हर्बिसाइड) पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाने की तैयारी शुरू कर दी है। कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय ने इसके लिए ड्राफ्ट नोटिफिकेशन जारी किया है। सरकार का कहना है कि यह रसायन इंसानों और जानवरों की सेहत के लिए बेहद खतरनाक है। प्रस्ताव पर सरकार ने 30 दिनों के भीतर किसानों, कंपनियों और अन्य हितधारकों से सुझाव और आपत्तियां मांगी हैं। इसके बाद ही अंतिम फैसला लिया जाएगा।
क्या है पैराक्वाट डाइक्लोराइड?
पैराक्वाट डाइक्लोराइड एक कॉन्टैक्ट हर्बिसाइड (खरपतवारनाशक) है, जिसका इस्तेमाल खेतों में खरपतवार खत्म करने के लिए किया जाता है। यह खरपतवार की कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाकर कुछ ही घंटों में उन्हें सुखा देता है।
भारत में इसका इस्तेमाल चाय, कॉफी, कपास, धान, गन्ना, मक्का, रबर, अंगूर और गेहूं समेत कई फसलों में किया जाता है।
सरकार इसे बैन क्यों करना चाहती है?
सरकार ने जनवरी 2026 में इसके इस्तेमाल की समीक्षा के लिए एक विशेषज्ञ समिति बनाई थी। समिति ने 12 जून 2026 को अपनी रिपोर्ट सौंपी। इसके बाद पंजीकरण समिति की सिफारिश के आधार पर इस पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने का प्रस्ताव तैयार किया गया।
सरकार के मुताबिक, इस पर प्रतिबंध लगाने की प्रमुख वजहें हैं—
- दुनिया के70 से अधिक देशों में इस पर पहले से प्रतिबंध या कड़ी पाबंदी है।
- इसके संपर्क में आने से किडनी और फेफड़ों को गंभीर नुकसान हो सकता है। कुछ अध्ययनों में इसे पार्किंसन बीमारी के बढ़े हुए खतरे से भी जोड़ा गया है।
- इस जहर का कोई विशेष एंटीडोट (काटने की दवा) उपलब्ध नहीं है।
अगर बैन लागू हुआ तो क्या होगा?
अगर यह प्रस्ताव अंतिम रूप लेता है, तो देशभर में पैराक्वाट डाइक्लोराइड के आयात, निर्माण, बिक्री, परिवहन, वितरण और इस्तेमाल पर पूरी तरह रोक लग जाएगी।
भारत में कितना बड़ा है इसका इस्तेमाल?
2023-24 के व्यापारिक आंकड़ों के अनुसार, पैराक्वाट बनाने के लिए इस्तेमाल होने वाला तकनीकी कच्चा माल ताइवान, चीन और यूनाइटेड किंगडम से भारत आयात किया जाता है। देश में 1,500 से अधिक कंपनियों के पास इसके निर्माण और बिक्री का लाइसेंस है। ऐसे में इस प्रस्तावित प्रतिबंध का कृषि रसायन उद्योग पर बड़ा असर पड़ सकता है।
उद्योग ने क्या कहा?
हालांकि, बिजनेस स्टैंडर्ड की रिपोर्ट के मुताबिक, प्रस्तावित प्रतिबंध पर एग्रो केम फेडरेशन ऑफ इंडिया ने चिंता जताई है। संगठन का कहना है कि इस फैसले से किसानों और कृषि क्षेत्र को मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है। उसके अनुसार, पैराक्वाट खरपतवार नियंत्रण, मजदूरी का खर्च कम करने और समय पर खेती की तैयारी में मदद करता है।
संगठन का यह भी दावा है कि इससे जुड़े ज्यादातर गंभीर मामले जानबूझकर इसके सेवन के कारण होते हैं, न कि खेती में नियमों के अनुसार इसके इस्तेमाल से। उद्योग का कहना है कि पैराक्वाट पहले से ही'रिस्ट्रिक्टेड यूज़ पेस्टिसाइड' की श्रेणी में है और इसके घरेलू इस्तेमाल की अनुमति नहीं है।
पैराक्वाट डाइक्लोराइड पर किसानों की मिली-जुली राय
यूपी के पीलीभीत के प्रगतिशील किसान जगदीश वर्मा, जो बड़े पैमाने पर गन्ने की खेती करते हैं, पैराक्वाट डाइक्लोराइड का भी इस्तेमाल करते हैं। उन्होंने कहा कि सरकार के इस फैसले की वजह उन्हें समझ नहीं आ रही। उनके मुताबिक, खरपतवार हटाने के लिए यह काफी असरदार दवा है। उन्होंने बताया कि इसका इस्तेमाल फसल पर नहीं, बल्कि खेत की मेड़ों और उन जगहों पर किया जाता है, जहां खरपतवार उग आते हैं। साथ ही, इसका छिड़काव करते समय वे मास्क और दस्ताने जैसे सुरक्षा उपकरणों का इस्तेमाल करते हैं, इसलिए उन्हें इससे कभी कोई नुकसान नहीं हुआ।
हालांकि, उन्होंने ऐसे मामलों का भी जिक्र किया, जिनमें लोगों ने इसे जहर के रूप में पी लिया और उनकी मौत हो गई। उनका कहना है कि इस लिहाज से यह खतरनाक जरूर है, लेकिन खेती में सही तरीके से इस्तेमाल करने पर उन्हें कभी कोई परेशानी नहीं हुई।
वहीं, बुलंदशहर के किसान दुष्यंत जाट भी खरपतवार नियंत्रण के लिए इसका इस्तेमाल करते हैं। उनका कहना है कि उन्हें इससे कभी कोई दिक्कत नहीं हुई। हालांकि, अगर सरकार इस पर प्रतिबंध लगाती है, तो वे खरपतवार हटाने के लिए मैनुअल तरीके या मशीनों का इस्तेमाल करेंगे।
दूसरी ओर, लखीमपुर खीरी के प्रगतिशील किसान यदुनंदन सिंह का कहना है कि वे पैराक्वाट का इस्तेमाल बहुत कम करते हैं। उनका अधिकतर काम मैनुअल तरीकों और कृषि मशीनों से ही होता है।




