भारत ने देसी धान की किस्मों को बचाने वाले एक अनमोल किसान को खो दिया है। केरल के वायनाड के रहने वाले पद्मश्री चेरुवायल रमन का 74 साल की उम्र में निधन हो गया। दिल की बीमारी के इलाज के दौरान उन्होंने कोझिकोड मेडिकल कॉलेज अस्पताल में अंतिम सांस ली।
तीन एकड़ जमीन पर बचाईं 45 से ज्यादा किस्में
चेरुवायल रमन को बचपन से ही खेती से लगाव था। उन्होंने अपनी तीन एकड़ जमीन पर 45 से ज्यादा पारंपरिक धान की किस्मों को उगाकर उनके बीज सुरक्षित रखे। इनमें थोंडी, कनाली, चेट्टुवेलियन और जीरकसल जैसी किस्में शामिल थीं। इसी काम के लिए उन्हें ‘भारत का जीवित धान जीन बैंक’ कहा जाता था।
किसानों को मुफ्त में देते थे बीज
रमन देसी बीजों को बचाने के साथ दूसरे किसानों तक भी पहुंचाना चाहते थे। इसलिए वे किसानों को मुफ्त में बीज देते थे। उनकी शर्त थी कि किसान जैविक तरीके से खेती करें और फसल कटने के बाद उतने ही बीज उन्हें वापस लौटा दें, ताकि यह सिलसिला आगे भी चलता रहे।
2023 में मिला पद्मश्री सम्मान
देसी धान की किस्मों और पारंपरिक खेती को बचाने में उनके योगदान के लिए केंद्र सरकार ने 2023 में उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया था। रमन ने अपना जीवन कृषि जैव विविधता को बचाने में लगा दिया और दिखाया कि एक किसान भी अपनी मेहनत से देश की खेती की विरासत को सुरक्षित रख सकता है। इसके अलावा उन्हें राष्ट्रीय प्लांट जीनोम सेवियर अवॉर्ड, 2016 में जीनोम कंजर्वेशन अवॉर्ड और केरल कृषि विभाग का कर्षक ज्योति अवॉर्ड भी मिला। 2011 में उन्होंने हैदराबाद में आयोजित अंतरराष्ट्रीय जैव विविधता सम्मेलन में भारतीय किसानों का प्रतिनिधित्व किया। उन्हें लंदन और सिंगापुर जैसे शहरों में भी अपने अनुभव साझा करने के लिए बुलाया गया था।
पीछे छोड़ गए अनमोल विरासत
चेरुवायल रमन के निधन से कृषि जगत ने एक ऐसे किसान को खो दिया, जिसने आने वाली पीढ़ियों के लिए देसी बीजों को सहेजकर रखा। उनके द्वारा बचाई गई धान की किस्में और पारंपरिक खेती का ज्ञान देश की कृषि विरासत का अहम हिस्सा हैं।





