भारत में सोयाबीन की खेती बड़े पैमाने पर होती है और यह देश की प्रमुख तिलहनी फसलों में शामिल है। सोयाबीन से खाद्य तेल के साथ-साथ सोया मील जैसे उत्पाद भी तैयार किए जाते हैं। देश में खाद्य तेल की बढ़ती जरूरत को देखते हुए सोयाबीन का उत्पादन बढ़ाना भी अहम है। ऐसे में किसानों के लिए ऐसी किस्में महत्वपूर्ण हो जाती हैं, जिनमें अच्छी उपज के साथ दाने का आकार भी बेहतर हो।
इसी को देखते हुए NRC 270 सोयाबीन किस्म किसानों के लिए एक विकल्प हो सकती है। ICAR-राष्ट्रीय सोयाबीन अनुसंधान संस्थान, इंदौर के मुताबिक इस किस्म की खासियत इसके बड़े दाने और अच्छी उत्पादकता है।
NRC 270 में क्या खास है?
NRC 270 की खासियत इसके बड़े दाने और अच्छी उपज है। संस्थान के मुताबिक इसकी औसत उपज 2,568 किलो यानी करीब 25.68 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है। बड़े दानों के साथ अच्छी उत्पादकता इसे सोयाबीन की खेती करने वाले किसानों के लिए एक उपयोगी विकल्प बनाती है।
भारत में सोयाबीन की खेती
भारत में सोयाबीन की खेती मुख्य रूप से मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान, कर्नाटक, तेलंगाना, गुजरात और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में होती है। इनमें मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र सोयाबीन के प्रमुख उत्पादक राज्य हैं।
कृषि मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक 2024-25 में देश में सोयाबीन का उत्पादन 152.68 लाख टन रहा। इससे पहले 2023-24 में सोयाबीन का उत्पादन 130.62 लाख टन था। यानी एक साल में उत्पादन में करीब 22 लाख टन की बढ़ोतरी हुई।
खाद्य तेल के लिए भी अहम है सोयाबीन
सोयाबीन सिर्फ किसानों के लिए एक प्रमुख खरीफ फसल नहीं है, बल्कि देश की खाद्य तेल जरूरत को पूरा करने में भी इसकी अहम भूमिका है। सोयाबीन से तेल निकाला जाता है और इसके बाद बचने वाले सोया मील का इस्तेमाल भी किया जाता है।
भारत में खाद्य तेल की जरूरत का एक बड़ा हिस्सा आयात से पूरा होता है। इसी वजह से सरकार ने National Mission on Edible Oils–Oilseeds (NMEO-Oilseeds) शुरू किया है। इसके तहत सोयाबीन समेत दूसरी तिलहनी फसलों का उत्पादन और उत्पादकता बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है।
किसानों के लिए क्यों अहम है NRC 270?
सोयाबीन की खेती में किसानों के लिए सिर्फ उत्पादन ही नहीं, बल्कि दाने की गुणवत्ता और आकार भी मायने रखता है। NRC 270 में बड़े दाने और करीब 25.68 क्विंटल प्रति हेक्टेयर की औसत उपज बताई गई है। ऐसे में जिन किसानों के इलाके और खेती की परिस्थितियां इस किस्म के लिए अनुकूल हों, वे इसे सोयाबीन की अन्य किस्मों के साथ एक विकल्प के तौर पर देख सकते हैं।
हालांकि, किसी भी किस्म का चुनाव करने से पहले किसान को अपने क्षेत्र की मिट्टी, मौसम, पानी की उपलब्धता और स्थानीय कृषि विशेषज्ञ की सलाह को ध्यान में रखना चाहिए।
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