सोचिए, 1,800 से 2,000 की आबादी वाला एक ऐसा गांव, जहां पक्की सड़कें, बैंक, कृषि सेवा केंद्र, टिश्यू कल्चर डीलर, रिपनिंग चैंबर और केले की पैकिंग के लिए कैरेट बनाने की फैक्ट्री तक मौजूद है। सुनने में यह किसी बड़े शहर जैसा लगता है, लेकिन यह तस्वीर है मध्य प्रदेश के बुरहानपुर जिले के नाचनखेड़ा गांव की। यहां के लोग अपने गांव की इस समृद्धि की सबसे बड़ी वजह केले की खेती को मानते हैं।

केले की खेती ने इस गांव की सिर्फ अर्थव्यवस्था ही नहीं बदली, बल्कि किसानों की जीवनशैली और रहन-सहन का स्तर भी बेहतर किया है। गांव का लगभग हर किसान केले की खेती करता है और हर साल यहां करीब 9 लाख टिश्यू कल्चर केले के पौधे लगाए जाते हैं।

यहां करीब 100 फीसदी बेड कल्टीवेशन और ड्रिप इरिगेशन के जरिए केले की खेती होती है। यही वजह है कि नाचनखेड़ा गांव ने केले की खेती में अपनी अलग पहचान बनाई है। यहां से बड़े पैमाने पर केला दुबई और दूसरे देशों में भी निर्यात किया जाता है।

खास बात यह है कि केले की हार्वेस्टिंग के बाद किसान खेत खाली नहीं छोड़ते। इसके बाद खेतों में डॉलर चने की खेती की जाती है, जिससे किसान एक ही खेत से दूसरी फसल लेकर भी अच्छी कमाई करते हैं।

केले की खेती ने नाचनखेड़ा को सिर्फ एक केला उत्पादक गांव नहीं बनाया, बल्कि यहां खेती से जुड़ा पूरा इन्फ्रास्ट्रक्चर और कारोबार का नेटवर्क खड़ा कर दिया है।
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