देश में सरसों की खेती का रकबा पिछले पांच साल में करीब 40 फीसदी बढ़ा है। साल 2020-21 में जहां 67 लाख हेक्टेयर में सरसों की खेती हुई थी, वहीं 2025-26 में इसका रकबा बढ़कर 94.2 लाख हेक्टेयर हो गया। अब रबी सीजन 2026-27 में भी सरसों की खेती का रकबा बढ़ने की उम्मीद है। इसकी वजह न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) में बढ़ोतरी, बेहतर बीजों की उपलब्धता और बाजार में सरसों की मांग को माना जा रहा है।
इस साल 95 लाख हेक्टेयर तक पहुंच सकता है रकबा
राजस्थान के भरतपुर स्थित ICAR-भारतीय सरसों अनुसंधान संस्थान के निदेशक विजय वीर सिंह के मुताबिक, रबी सीजन 2026-27 में सरसों की खेती का रकबा बढ़कर 95 लाख हेक्टेयर तक पहुंच सकता है। पिछले साल 94.2 लाख हेक्टेयर में इसकी खेती हुई थी।
अगर इस साल भी सरसों की औसत पैदावार पिछले साल के बराबर रहती है, तो उत्पादन बढ़कर करीब 1.39 करोड़ टन हो सकता है। पिछले साल सरसों का उत्पादन लगभग 1.377 करोड़ टन था। हालांकि, इस साल उत्पादन कितना होगा, यह मौसम, खेतों में नमी और फसल की पैदावार पर निर्भर करेगा।
MSP में 413 रुपये की बढ़ोतरी
सरकार ने रबी विपणन सीजन 2027-28 के लिए सरसों और रेपसीड का MSP बढ़ाकर 6,613 रुपये प्रति क्विंटल कर दिया है। यह पिछले साल के मुकाबले 413 रुपये प्रति क्विंटल ज्यादा है। MSP में बढ़ोतरी से किसानों को सरसों की खेती के लिए प्रोत्साहन मिलने की उम्मीद है।
हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय, हिसार के आंकड़ों के मुताबिक, साल 2020-21 में देश में 67 लाख हेक्टेयर में सरसों की खेती हुई थी। पांच साल में इसका रकबा करीब 40.6 फीसदी बढ़कर 2025-26 में 94.2 लाख हेक्टेयर हो गया। इस दौरान सरसों की खेती का रकबा लगातार बढ़ा है।
खाद्य तेल के आयात पर निर्भरता कम करने पर जोर
भारत अपनी जरूरत का करीब 60 फीसदी खाद्य तेल दूसरे देशों से आयात करता है। देश में खाद्य तेल की मांग लगातार बढ़ रही है। अनुमान है कि वित्त वर्ष 2026-27 में इसकी मांग बढ़कर 2.65 करोड़ टन हो सकती है, जबकि पिछले वित्त वर्ष में यह करीब 2.57 करोड़ टन थी।
ऐसे में घरेलू स्तर पर सरसों जैसी तिलहन फसलों का उत्पादन बढ़ाना जरूरी है। इससे विदेशों से खाद्य तेल मंगाने पर निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है। पश्चिम एशिया में जारी युद्ध के कारण तेल के आयात और ढुलाई से जुड़ी चुनौतियां भी बढ़ी हैं।
धान की कटाई के बाद खाली खेतों में भी सरसों की खेती
सरसों का रकबा बढ़ाने के लिए धान की कटाई के बाद खाली रहने वाले खेतों का इस्तेमाल करने पर भी जोर दिया जा रहा है। खासकर पूर्वी भारत में कम समय में तैयार होने वाली सरसों की किस्मों को इन खेतों में उगाया जा सकता है।
ICAR के सरसों अनुसंधान निदेशालय के विजन 2050 के मुताबिक, पूर्वी और पूर्वोत्तर राज्यों में धान की कटाई के बाद करीब 1.165 करोड़ हेक्टेयर जमीन खाली रहती है। रिपोर्ट के अनुसार, अगर इस जमीन के सिर्फ 10 फीसदी हिस्से में सरसों और रेपसीड की खेती की जाए, तो तिलहन उत्पादन में कम से कम 10 लाख टन की बढ़ोतरी हो सकती है।
इस तरह पिछले पांच साल में सरसों की खेती का रकबा करीब 40 फीसदी बढ़ने के बाद इस साल भी इसमें बढ़ोतरी की उम्मीद है। MSP, बेहतर बीज, बाजार में मांग और खेतों में पर्याप्त नमी इसकी खेती का रकबा तय करने में अहम भूमिका निभाएंगे।





