नई दिल्ली। मखाना अब सिर्फ बिहार की पहचान नहीं रह गया है, बल्कि देश-विदेश में इसकी मांग तेजी से बढ़ रही है। कम पानी में होने वाली इस जलीय फसल से किसानों को अच्छी आमदनी मिल रही है और अब सरकार भी इसकी खेती, उत्पादन और निर्यात को बढ़ावा देने पर जोर दे रही है। इसी बीच देश में मखाना उत्पादन 80 हजार टन के पार पहुंच गया है। किसानों की पैदावार बढ़ाने के लिए आईसीएआर ने ‘स्वर्ण वैदेही’ नाम की नई किस्म विकसित की है, जिसकी उत्पादन क्षमता पारंपरिक खेती के मुकाबले करीब दोगुनी बताई गई है। इसके अलावा मखाने के साथ मछली पालन और फसल के बाद सिंघाड़े की खेती जैसे विकल्पों से किसानों की कमाई बढ़ाने की कोशिश की जा रही है।
2025-26 में 80,590 टन हुआ मखाना उत्पादन
कृषि एवं किसान कल्याण विभाग की हॉर्टिकल्चर स्टैटिस्टिक्स यूनिट ने 2024-25 से मखाना उत्पादन के आंकड़े अलग से दर्ज करना शुरू किया है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, 2024-25 में देश में कुल 63,910 टन मखाने का उत्पादन हुआ था। इस दौरान औसत उत्पादकता 2.03 टन प्रति हेक्टेयर रही।
वहीं, 2025-26 के दूसरे अग्रिम अनुमान के अनुसार देश में मखाना उत्पादन बढ़कर 80,590 टन पहुंच गया है। इस दौरान औसत उत्पादकता भी बढ़कर 2.34 टन प्रति हेक्टेयर हो गई। यानी एक साल में उत्पादन के साथ प्रति हेक्टेयर औसत उत्पादकता में भी बढ़ोतरी हुई है।कृषि एवं किसान कल्याण राज्य मंत्री रामनाथ ठाकुर ने राज्यसभा में लिखित जवाब में ये जानकारी दी।
बिहार सबसे बड़ा उत्पादक
मखाना उत्पादन में बिहार देश में सबसे आगे है। 2025-26 में राज्य में करीब 60,000 टन मखाने का उत्पादन हुआ। बिहार में इसकी औसत उत्पादकता 2 टन प्रति हेक्टेयर रही। राज्य के किसानों के लिए मखाना लंबे समय से आमदनी का महत्वपूर्ण जरिया रहा है और अब बढ़ते बाजार के साथ इसकी व्यावसायिक संभावनाएं भी बढ़ रही हैं।
मखाने के निर्यात का अब अलग रिकॉर्ड
मखाने के कारोबार को लेकर सरकार ने 2025 में एक अहम कदम उठाया। इससे पहले मखाना सामान्य HSN कोड के तहत दर्ज किया जाता था, जिसके कारण इसके निर्यात का अलग उत्पाद-विशिष्ट आंकड़ा उपलब्ध नहीं था। अब विदेश व्यापार महानिदेशालय (DGFT) ने 2025 में पॉप्ड मखाना और दूसरे मखाना उत्पादों के लिए अलग HSN कोड जारी किया है।
इसके बाद 2025-26 में भारत से 7,264.89 टन मखाना उत्पादों का निर्यात हुआ, जिसकी कीमत 192.96 करोड़ रुपये रही। इसमें बिहार से 39.20 टन मखाना उत्पादों का निर्यात हुआ, जिसकी कीमत 4.03 करोड़ रुपये रही।
‘स्वर्ण वैदेही’ से दोगुनी पैदावार की उम्मीद
किसानों की पैदावार बढ़ाने के लिए आईसीएआर-राष्ट्रीय मखाना अनुसंधान केंद्र, दरभंगा ने नई किस्म ‘स्वर्ण वैदेही’ विकसित की है। केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण राज्य मंत्री भागीरथ चौधरी के अनुसार, इस किस्म की औसत उत्पादन क्षमता 28-30 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है।
इसके मुकाबले पारंपरिक मखाना खेती में औसतन 14-16 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उत्पादन मिलता है। इस तरह ‘स्वर्ण वैदेही’ की उत्पादन क्षमता पारंपरिक खेती की तुलना में करीब दोगुनी है। इस किस्म के साथ किसानों के लिए बेहतर खेती की पूरी तकनीकी जानकारी भी विकसित की गई है, ताकि उत्पादन को और बेहतर किया जा सके।
मखाने के बाद सिंघाड़े की खेती
मखाना किसानों की आमदनी बढ़ाने के लिए आईसीएआर ने ‘स्वर्ण हरित’ और ‘स्वर्ण लोहित’ नाम की दो बिना कांटे वाली सिंघाड़े की किस्में भी विकसित की हैं। इन किस्मों को मखाने की फसल की कटाई के बाद उसी क्षेत्र में उगाया जा सकता है।
इससे किसान एक ही जल क्षेत्र का बेहतर इस्तेमाल कर सकेंगे। साथ ही फसल सघनता बढ़ेगी और किसानों को अतिरिक्त आमदनी का मौका मिलेगा।
मखाना के साथ मछली पालन से 40-50% ज्यादा आय
आईसीएआर ने मखाना-सह-मछली पालन का मॉडल भी विकसित किया है। खासकर चौर क्षेत्रों में यह मॉडल प्रभावी पाया गया है। सरकारी जानकारी के मुताबिक, केवल मखाना खेती की तुलना में मखाना के साथ मछली पालन करने से किसानों की आय 40-50 फीसदी तक अधिक हो सकती है।
इस मॉडल की खास बात यह है कि किसान एक ही जल क्षेत्र से मखाना और मछली, दोनों से कमाई कर सकते हैं। इससे उपलब्ध संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल भी होता है।
मखाना उत्पादन और निर्यात बढ़ने के साथ इसकी खेती में नई किस्मों और तकनीकों को बढ़ावा दिया जा रहा है। ‘स्वर्ण वैदेही’, मखाना-सह-मछली पालन और सिंघाड़े की खेती जैसे विकल्प किसानों की आमदनी बढ़ाने में मदद कर सकते हैं।





