इस खरीफ सीजन में मध्य प्रदेश में मक्के की बुवाई में अच्छी बढ़ोतरी दर्ज की गई है। राज्य में पिछले साल के मुकाबले करीब 23 प्रतिशत अधिक क्षेत्र में मक्का बोया गया है। लेकिन इसके बावजूद देश में मक्के का कुल उत्पादन घटने की आशंका जताई जा रही है। इसकी वजह है कर्नाटक, महाराष्ट्र समेत कई बड़े उत्पादक राज्यों में कम बारिश और मानसून की देरी से बुवाई प्रभावित होना।
मध्य प्रदेश में सबसे ज्यादा बढ़ी बुवाई
कृषि मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, 17 जुलाई तक मध्य प्रदेश में 23.37 लाख हेक्टेयर में मक्के की बुवाई हो चुकी है, जबकि पिछले साल इसी अवधि में यह आंकड़ा 19 लाख हेक्टेयर था। यानी इस बार राज्य में मक्के का रकबा करीब 23 प्रतिशत बढ़ा है।
देशभर में घटा मक्के का रकबा
मध्य प्रदेश में बढ़ोतरी के बावजूद देशभर में मक्के की कुल बुवाई कम हुई है। 17 जुलाई तक देश में 67.89 लाख हेक्टेयर में मक्का बोया गया, जबकि पिछले साल इसी समय यह 71.50 लाख हेक्टेयर था। यानी कुल रकबे में करीब 5 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है।
किन राज्यों में सबसे ज्यादा असर?
कम बारिश और मानसून की देरी का सबसे ज्यादा असर कर्नाटक में देखने को मिला, जहां मक्के की बुवाई करीब 30 प्रतिशत घटकर 9.43 लाख हेक्टेयर रह गई।
वहीं महाराष्ट्र में मक्के का रकबा 5.1 प्रतिशत घटकर 9.59 लाख हेक्टेयर रह गया। इसके अलावा राजस्थान, तेलंगाना और उत्तर प्रदेश में भी मक्के की बुवाई कम हुई है। हालांकि आंध्र प्रदेश और बिहार में मामूली बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
ये भी पढ़ें- आखिर क्यों कहा जाता है हरियाणा के इस किसान को 'नर्सरी का बादशाह'?
फिर क्यों घट सकता है उत्पादन?
विशेषज्ञों का कहना है कि इस बार अल नीनो के असर और कई राज्यों में कम बारिश के कारण किसान समय पर बुवाई नहीं कर पाए। खासकर कर्नाटक और महाराष्ट्र जैसे बड़े मक्का उत्पादक राज्यों में बुवाई का समय लगभग खत्म हो चुका है। ऐसे में अब वहां रकबा बढ़ने की संभावना बहुत कम है।
इसी वजह से अनुमान लगाया जा रहा है कि इस साल देश में खरीफ मक्के का उत्पादन पिछले साल के बराबर नहीं पहुंच पाएगा।
कुछ किसानों ने सोयाबीन की ओर किया रुख
जानकारों का कहना है कि पिछले साल कई जगहों पर मक्के के दाम न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) से नीचे चले गए थे। वहीं इस समय सोयाबीन की कीमतें बेहतर होने के कारण कुछ किसानों ने मक्के की जगह सोयाबीन की खेती को प्राथमिकता दी है।
पशु चारा उद्योग पर भी पड़ेगा असर
मीडिया रिपोर्टस् के मुताबिक सीएलएफएमए ऑफ इंडिया के उपाध्यक्ष और कर्नाटक पोल्ट्री फार्मर्स एंड ब्रीडर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष नवीन पशुपति का कहना है कि मक्के की कम बुवाई पशु चारा उद्योग के लिए भी चिंता का विषय है।
उन्होंने बताया कि बुवाई में देरी के कारण इस साल मक्के की नई फसल सामान्य समय से करीब एक महीने बाद, यानी दिसंबर में मंडियों में आने की संभावना है। इससे पशु चारा उद्योग को कच्चे माल की उपलब्धता और कीमत, दोनों को लेकर चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।





