गन्ना किसान चाहते हैं कि उन्हें सरकार की ओर से तय गन्ने का पूरा दाम मिले और चीनी मिलें उसमें से कटाई और ढुलाई का खर्च न काटें। कर्नाटक के गन्ना किसानों ने केंद्र सरकार की ओर से बनाई गई प्रो. रमेश चंद समिति के सामने यह मांग रखी है। किसानों का कहना है कि खेती की लागत लगातार बढ़ रही है, लेकिन गन्ने का दाम उस हिसाब से नहीं मिल रहा। ऐसे में सरकार को गन्ने की कीमत तय करने के तरीके में बदलाव करना चाहिए, ताकि किसानों को उनकी फसल का पूरा पैसा मिल सके।
कर्नाटक में हाल ही में गन्ने के दाम को लेकर हुए किसान आंदोलन के बाद केंद्र सरकार ने नीति आयोग के पूर्व सदस्य प्रो. रमेश चंद की अध्यक्षता में एक समिति बनाई थी। यह समिति किसानों की समस्याओं पर विचार कर सरकार को सुझाव देगी। गुरुवार को बेंगलुरु में गन्ना किसानों ने समिति से मुलाकात कर गन्ने की कीमत और खेती की लागत से जुड़ी अपनी मांगें रखीं।
गन्ने का दाम 4,500 से 5,500 रुपये प्रति टन करने की मांग
किसान गन्ने का उचित और लाभकारी मूल्य (FRP) बढ़ाकर कम से कम 4,500 से 5,500 रुपये प्रति टन करने की मांग कर रहे हैं। इसके अलावा, चीनी की न्यूनतम बिक्री कीमत मौजूदा 31 रुपये प्रति किलो से बढ़ाकर 60 रुपये प्रति किलो करने की मांग भी की गई है।
केंद्र सरकार ने अक्टूबर 2026 से शुरू हुए पेराई सत्र 2026-27 के लिए गन्ने का FRP 3,650 रुपये प्रति टन तय किया है। किसानों का कहना है कि यह कीमत उनकी खेती की बढ़ती लागत के मुकाबले पर्याप्त नहीं है।
कटाई और ढुलाई के नाम पर न कटे किसानों का पैसा
भारतीय गन्ना किसान संघ के प्रदेश अध्यक्ष कुर्बुर शांतकुमार ने कहा कि चीनी मिलें किसानों को भुगतान करते समय गन्ने की कटाई और ढुलाई का खर्च काट लेती हैं। इससे किसानों को सरकार की ओर से तय कीमत का पूरा पैसा नहीं मिल पाता।
किसानों की मांग है कि गन्ने का भाव खेत पर ही तय किया जाए और उसी के हिसाब से पूरा भुगतान मिले। इससे कटाई और ढुलाई के नाम पर होने वाली कटौती से राहत मिल सकती है।
किसानों ने समिति को दिए ज्ञापन में कहा कि बीज, खाद, मजदूरी, सिंचाई, बिजली, डीजल, कटाई और ढुलाई समेत खेती के लगभग सभी खर्च बढ़ गए हैं। इसके बावजूद गन्ने का दाम लागत के हिसाब से नहीं बढ़ा है। सूखा, फसल का नुकसान और कर्ज का बोझ भी किसानों की परेशानी बढ़ा रहे हैं।
एक टन गन्ना उगाने की लागत 4,450 रुपये
शांतकुमार ने कर्नाटक के गन्ना विकास आयुक्त की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि पिछले साल राज्य में एक टन गन्ना पैदा करने की लागत करीब 4,450 रुपये आई थी। ऐसे में किसानों ने 10.25 फीसदी चीनी रिकवरी के आधार पर गन्ने का FRP कम से कम 4,500 रुपये प्रति टन करने की मांग की है।
चीनी रिकवरी का मतलब है कि गन्ने से कितनी मात्रा में चीनी निकाली जा सकती है। किसानों का कहना है कि गन्ने की कीमत तय करते समय इस बात का ध्यान रखा जाना चाहिए कि उत्पादन पर वास्तविक खर्च कितना आ रहा है।
चीनी मिलों के मुनाफे में भी मिले किसानों को हिस्सा
गन्ना किसानों ने चीनी मिलों से निकलने वाले दूसरे उत्पादों से होने वाली कमाई में भी हिस्सा मांगा है। उनका कहना है कि चीनी बनाने के अलावा मिलें शीरा (Molasses), खोई (Bagasse), एथेनॉल और बिजली उत्पादन से भी कमाई करती हैं। इसलिए इन उत्पादों से होने वाली अतिरिक्त कमाई का कुछ हिस्सा किसानों को भी मिलना चाहिए।
किसानों ने सरकार से यह भी मांग की है कि हर किसान के खेत में पैदा हुए गन्ने की चीनी रिकवरी की वैज्ञानिक तरीके से जांच हो। अभी मिलें सभी किसानों से मिले गन्ने की औसत रिकवरी के आधार पर भुगतान करती हैं। किसानों का कहना है कि इससे बेहतर गुणवत्ता वाला गन्ना पैदा करने वाले किसानों को नुकसान हो सकता है।
मशीन से कटाई में गन्ने का वजन काटने पर भी जताई आपत्ति
किसानों ने मशीन से गन्ने की कटाई के दौरान 8 से 10 फीसदी वजन की कटौती करने की प्रथा को खत्म करने की मांग की है। उनका कहना है कि बिना वैज्ञानिक जांच या तय नियमों के गन्ने के वजन में कटौती करना किसानों के साथ अन्याय है।
किसानों ने केंद्र और राज्य सरकार से गन्ने की कीमत तय करने की व्यवस्था में बदलाव करने और खेती को लाभकारी बनाने के लिए ठोस कदम उठाने की अपील की है।





