भारत दुनिया में दालों का सबसे बड़ा उत्पादक देश है, लेकिन घरेलू जरूरतों को पूरा करने के लिए देश को अब भी दालों का आयात करना पड़ता है। ऐसे में सरकार ने दालों का उत्पादन बढ़ाने और आयात पर निर्भरता कम करने के लिए ‘दलहन में आत्मनिर्भरता मिशन’ शुरू किया है। इस मिशन के तहत अगले छह वर्षों में 11,440 करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे। सरकार का लक्ष्य 2030-31 तक दालों का उत्पादन बढ़ाकर 350 लाख टन करना है। इसके लिए किसानों को बेहतर बीज उपलब्ध कराने, दलहन की खेती का रकबा बढ़ाने, दालों की खरीद सुनिश्चित करने और प्रसंस्करण सुविधाएं विकसित करने पर जोर दिया जा रहा है।
11 अक्टूबर 2025 को शुरू हुए इस मिशन का एक साल 11 अक्टूबर 2026 को पूरा हो गया। आइए जानते हैं कि इस मिशन के तहत क्या लक्ष्य तय किए गए हैं और इससे किसानों को कैसे फायदा मिल सकता है।
2030-31 तक 350 लाख टन उत्पादन का लक्ष्य
सरकार ने दलहन में आत्मनिर्भरता मिशन के तहत उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ खेती की उत्पादकता में सुधार का भी लक्ष्य रखा है। इसके लिए कई स्तरों पर काम किया जाएगा।
- उत्पादन बढ़ाना: वर्ष 2030-31 तक दालों का उत्पादन बढ़ाकर करीब 350 लाख टन करने का लक्ष्य है।
- पैदावार में सुधार: प्रति हेक्टेयर औसत उत्पादन को बढ़ाकर 1,130 किलोग्राम करने की योजना है।
- खेती का रकबा बढ़ाना: दलहन की खेती का क्षेत्र 35 लाख हेक्टेयर बढ़ाकर कुल 310 लाख हेक्टेयर तक पहुंचाने का लक्ष्य है।
- प्रमुख फसलों पर ध्यान: तूर यानी अरहर, उड़द और मसूर के उत्पादन को बढ़ावा दिया जाएगा।
- बेहतर बीज उपलब्ध कराना: छह वर्षों में 87.5 लाख मुफ्त बीज किट और 126 लाख क्विंटल प्रमाणित बीज वितरित करने की योजना है।
- दाल मिलें स्थापित करना: देशभर में 1,000 दाल प्रसंस्करण इकाइयां स्थापित की जाएंगी।
- जिलों में उत्पादन बढ़ाना: 489 जिलों में क्लस्टर आधारित खेती को बढ़ावा दिया जाएगा।
इस योजना के तहत जलवायु के अनुकूल बीजों और बेहतर गुणवत्ता वाली किस्मों को बढ़ावा देने पर भी जोर दिया जाएगा, ताकि किसानों को मौसम की चुनौतियों के बीच उत्पादन बढ़ाने में मदद मिल सके।
भारत में कितना बढ़ा दालों का उत्पादन?
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, देश में दालों का उत्पादन, खेती का रकबा और प्रति हेक्टेयर पैदावार तीनों में बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
- उत्पादन: वर्ष 2024-25 में दालों का उत्पादन 256.83 लाख टन था, जो 2025-26 में बढ़कर 274.09 लाख टन हो गया। यह 2025-26 का तीसरा अग्रिम अनुमान है।
- खेती का रकबा: दलहन की खेती का क्षेत्र 277.20 लाख हेक्टेयर से बढ़कर 286.46 लाख हेक्टेयर हो गया।
- पैदावार: औसत उत्पादकता 926 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर से बढ़कर 957 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर हो गई।
मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, गुजरात, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, झारखंड, ओडिशा और पश्चिम बंगाल देश के प्रमुख दलहन उत्पादक राज्यों में शामिल हैं।
इन आंकड़ों से पता चलता है कि देश में दालों का उत्पादन बढ़ रहा है। हालांकि, 2030-31 तक तय लक्ष्य हासिल करने के लिए उत्पादन और उत्पादकता में लगातार सुधार करना होगा।
अरहर, उड़द और मसूर की खरीद की व्यवस्था
दलहन मिशन में किसानों को बेहतर बीज देने के साथ उनकी उपज की खरीद सुनिश्चित करने पर भी ध्यान दिया गया है। इसके तहत भारतीय राष्ट्रीय कृषि सहकारी विपणन संघ (NAFED) और भारतीय राष्ट्रीय उपभोक्ता सहकारी संघ (NCCF) को अरहर, उड़द और मसूर की खरीद के लिए अधिकृत किया गया है।
यह व्यवस्था 2025-26 से 2028-29 तक के लिए बनाई गई है। इसके तहत पंजीकृत और इच्छुक किसानों से इन फसलों की खरीद की जानी है।
सरकार का उद्देश्य है कि किसानों को अपनी उपज बेचने के लिए बेहतर व्यवस्था मिले और उन्हें बाजार में उचित दाम पाने में मदद मिले। हालांकि, खरीद का लाभ उन्हीं किसानों को मिलेगा जो निर्धारित नियमों और पंजीकरण की शर्तों को पूरा करते हैं।
अरहर, उड़द और मसूर के MSP में कितनी बढ़ोतरी हुई?
सरकार ने दलहन किसानों को प्रोत्साहित करने के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) में भी बढ़ोतरी की है। दिए गए सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, 2024-25 की तुलना में 2026-27 के लिए इन फसलों के MSP में बदलाव इस प्रकार है।
- उड़द: MSP 7,400 रुपये से बढ़ाकर 8,200 रुपये प्रति क्विंटल किया गया।
- अरहर (तूर): MSP 7,550 रुपये से बढ़ाकर 8,450 रुपये प्रति क्विंटल किया गया।
- मसूर: MSP 6,700 रुपये से बढ़ाकर 7,000 रुपये प्रति क्विंटल किया गया।
MSP में बढ़ोतरी से किसानों को इन फसलों की खेती के लिए प्रोत्साहन मिल सकता है। लेकिन किसानों को वास्तविक लाभ इस बात पर भी निर्भर करेगा कि उन्हें खरीद केंद्रों तक पहुंच, समय पर भुगतान और उपज बेचने की सुविधा कितनी आसानी से मिलती है।
दालों के आयात में कमी, निर्यात में बढ़ोतरी
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2025-26 में भारत के दाल आयात पर होने वाला खर्च घटा, जबकि निर्यात बढ़ा।
- आयात खर्च: 2024-25 में दालों के आयात पर 46,427.60 करोड़ रुपये खर्च हुए थे, जो 2025-26 में घटकर 31,793.59 करोड़ रुपये रह गए। इसमें 31.52 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई।
- निर्यात में बढ़ोतरी: दालों का निर्यात 855 मिलियन अमेरिकी डॉलर से बढ़कर 969.53 मिलियन डॉलर हो गया।
- निर्यात की मात्रा: वर्ष 2025-26 में कुल 10.01 लाख टन दालों का निर्यात किया गया।
- प्रमुख बाजार: चीन, संयुक्त अरब अमीरात, बांग्लादेश, अमेरिका और श्रीलंका भारतीय दालों के प्रमुख निर्यात बाजारों में शामिल रहे।
आयात खर्च में कमी से विदेशी मुद्रा की बचत हो सकती है। हालांकि, आयात खर्च पर दालों की अंतरराष्ट्रीय कीमतों और आयात की मात्रा का भी असर पड़ता है। इसलिए इसे केवल घरेलू उत्पादन बढ़ने का परिणाम नहीं माना जा सकता।
किसानों को कैसे मिलेगा फायदा?
दलहन मिशन के तहत खेती से लेकर प्रसंस्करण तक की सुविधाएं बढ़ाने की योजना है।
- दाल मिलों की स्थापना: देशभर में 1,000 प्रसंस्करण इकाइयां स्थापित करने का लक्ष्य है। पहले चरण में राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को 528 इकाइयां आवंटित की गई हैं।
- प्रसंस्करण परियोजनाएं: प्रधानमंत्री किसान संपदा योजना के तहत दाल प्रसंस्करण की 23 इकाइयों को मंजूरी दी गई, जिनमें से 18 का काम पूरा होने की जानकारी दी गई है।
- बीज किट का वितरण: वर्ष 2025-26 में 9.25 लाख बीज किट वितरित किए गए। छह वर्षों में कुल 87.5 लाख किट वितरित करने का लक्ष्य है।
- धान के बाद दलहन की खेती: धान की कटाई के बाद खाली खेतों में दालों की खेती को बढ़ावा दिया जाएगा। इससे उपलब्ध जमीन का बेहतर इस्तेमाल करने में मदद मिल सकती है।
दाल प्रसंस्करण इकाइयां बढ़ने से स्थानीय स्तर पर दालों की सफाई, प्रसंस्करण और बाजार तक पहुंच की सुविधाएं बेहतर हो सकती हैं। इससे किसानों को अपनी उपज बेचने के नए अवसर भी मिल सकते हैं।
डिजिटल तकनीक से होगी निगरानी
सरकार मिशन के तहत बीजों की गुणवत्ता, खेती के रकबे और योजनाओं के क्रियान्वयन की निगरानी के लिए डिजिटल प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल कर रही है।
- कृषि मैपर: खेतों की जियो-टैगिंग और फसल के प्रदर्शन की निगरानी में मदद करेगा।
- साथी पोर्टल: बीज उत्पादन से लेकर प्रमाणन और बिक्री तक उनकी पहचान और गुणवत्ता का रिकॉर्ड रखने में मदद करेगा।
- एग्रीस्टैक और डिजिटल फसल सर्वेक्षण: किसान पहचान, खेतों और फसलों से जुड़े आंकड़ों को जोड़ने में मदद करेंगे।
- ई-समृद्धि और विस्तार: खरीद, भुगतान और बाजार से जुड़ी जानकारी को व्यवस्थित बनाने के लिए इस्तेमाल किए जा रहे हैं।
इन व्यवस्थाओं का उद्देश्य योजनाओं को सही किसानों तक पहुंचाना, बीजों की आपूर्ति में पारदर्शिता बढ़ाना और खरीद प्रक्रिया को व्यवस्थित करना है।
क्या 2030-31 तक दालों में आत्मनिर्भर बन पाएगा भारत?
दलहन में आत्मनिर्भरता मिशन के तहत सरकार ने उत्पादन बढ़ाने, बेहतर बीज उपलब्ध कराने, MSP पर खरीद और प्रसंस्करण सुविधाओं को मजबूत करने की योजना बनाई है। वर्ष 2025-26 में उत्पादन बढ़कर 274.09 लाख टन पहुंचना इस दिशा में एक सकारात्मक संकेत है।
हालांकि, 2030-31 तक 350 लाख टन उत्पादन का लक्ष्य हासिल करना आसान नहीं होगा। इसके लिए दलहन की खेती का रकबा बढ़ाने के साथ प्रति हेक्टेयर पैदावार में भी सुधार करना होगा। मौसम की अनिश्चितता, किसानों को लाभकारी दाम, गुणवत्तापूर्ण बीजों की उपलब्धता और बाजार तक पहुंच जैसी चुनौतियों पर भी ध्यान देना होगा।
अगर मिशन की योजनाओं को प्रभावी ढंग से लागू किया जाता है, तो इससे देश में दालों की उपलब्धता बढ़ाने, आयात पर निर्भरता कम करने और किसानों की आमदनी को सहारा देने में मदद मिल सकती है।





