भारत में अमरूद की खेती का रकबा और कुल उत्पादन तेजी से बढ़ा है। पिछले 7 साल में देश में अमरूद का उत्पादन करीब 40 प्रतिशत बढ़ गया है। लेकिन इसकी वजह खेती की तकनीक या प्रति हेक्टेयर पैदावार में बढ़ोतरी नहीं, बल्कि अमरूद की खेती का दायरा बढ़ना है। यानी अब पहले के मुकाबले ज्यादा जमीन पर अमरूद उगाया जा रहा है, लेकिन एक हेक्टेयर से मिलने वाली पैदावार लगभग उतनी ही बनी हुई है।
इस दौरान अमरूद की खेती का रकबा करीब 2.60 लाख हेक्टेयर से बढ़कर 3.60 लाख हेक्टेयर हो गया है। यानी इसमें लगभग 38 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। दूसरी ओर, प्रति हेक्टेयर उत्पादन 14.6 से 14.8 टन के आसपास ही बना हुआ है। इससे साफ है कि कुल उत्पादन बढ़ने के बावजूद खेती की उत्पादकता में खास सुधार नहीं हुआ है।
अमरूद के निर्यात में भी हुई बढ़ोतरी
देश में अमरूद की बढ़ती पैदावार के साथ इसके निर्यात में भी इजाफा हुआ है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, 2018-19 में भारत से करीब 957 टन अमरूद का निर्यात हुआ था, जो 2022-23 में बढ़कर लगभग 5,681 टन हो गया। यानी इस दौरान निर्यात करीब 6 गुना बढ़ा है।
हालांकि, कुल उत्पादन के मुकाबले निर्यात अभी भी काफी कम है। अमरूद जल्दी खराब होने वाला फल है। इसके आकार और पकने की स्थिति में भी अंतर होता है, जिससे दूर के बाजारों तक पहुंचने के दौरान इसकी क्वालिटी प्रभावित हो सकती है। पर्याप्त Cold Storage और Cold Chain की कमी भी इसके निर्यात में एक चुनौती है।
बेहतर किस्मों और आधुनिक बागवानी से बढ़ सकती है कमाई
विशेषज्ञों का मानना है कि अब सिर्फ अमरूद की खेती का रकबा बढ़ाने से काम नहीं चलेगा। किसानों को ऐसी किस्मों और तकनीकों को अपनाना होगा, जिनसे एक ही जमीन पर ज्यादा और अच्छी क्वालिटी के फल मिल सकें।
ICAR के केंद्रीय उपोष्ण बागवानी संस्थान, लखनऊ ने CISH-Dhawal, CISH-Lalima और CISH-Shweta जैसी किस्में विकसित की हैं। वहीं, ICAR-IARI की Pusa Aarushi और Pusa Pratiksha जैसी किस्मों में 37 से 43 टन प्रति हेक्टेयर तक उत्पादन की क्षमता बताई गई है। यह मौजूदा औसत पैदावार से काफी ज्यादा है।
इसके अलावा High Density Planting यानी सघन बागवानी तकनीक से भी उत्पादन बढ़ाया जा सकता है। सामान्य तरीके से एक हेक्टेयर में करीब 278 पौधे लगाए जाते हैं, जबकि सघन बागवानी में यह संख्या 1,666 से 2,222 पौधों तक हो सकती है। इससे कम जमीन में अधिक पौधे लगाकर बेहतर उत्पादन लेने की संभावना बढ़ती है।
किसानों को बेहतर बाजार दिलाने में Farmer Producer Organisations (FPOs) भी मदद कर सकते हैं। इनके जरिए किसान अपनी उपज को एक साथ बेच सकते हैं, जिससे उन्हें खरीदारों से बेहतर कीमत मिलने और बड़े बाजारों तक पहुंच बनाने में मदद मिल सकती है।





