भारत में मिट्टी की सेहत सुधारने और किसानों को खाद का सही इस्तेमाल करने के लिए जागरूक बनाने के मकसद से सरकार जल्द ही भारत सॉइल हेल्थ पॉलिसी ला सकती है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के महानिदेशक एमएल जाट ने बताया कि इस नीति का पहला ड्राफ्ट तैयार हो चुका है। इसके तहत देश में 1 लाख सॉइल हेल्थ उद्यमी तैयार करने का लक्ष्य है।
एमएल जाट ने यह जानकारी नीति से जुड़े थिंक टैंक ICRIER की ओर से आयोजित एक चर्चा के दौरान दी। उन्होंने बताया कि पिछले एक साल से इस नीति को लेकर अलग-अलग विशेषज्ञों और संबंधित लोगों से बातचीत की जा रही है। अलग-अलग क्षेत्रों में भी चर्चा की गई है। हालांकि, उन्होंने कहा कि नीति तैयार करने के साथ-साथ इसे जमीन पर लागू करना भी एक बड़ी चुनौती होगी।
किसानों तक पहुंचेंगे सॉइल हेल्थ उद्यमी
एमएल जाट के मुताबिक, सरकार का लक्ष्य है कि मिट्टी की सेहत से जुड़ी जानकारी हर किसान तक पहुंचे। इसके लिए स्थानीय स्तर पर सॉइल हेल्थ उद्यमी तैयार किए जाएंगे। शुरुआत में ऐसे कम से कम 1,000 उद्यमियों को तैयार करने की योजना है। आगे चलकर इस काम को पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (PPP) और कंपनियों की CSR फंडिंग की मदद से बढ़ाया जा सकता है।
इन उद्यमियों के जरिए किसानों को मिट्टी की जरूरत के मुताबिक खाद डालने और खाद का संतुलित इस्तेमाल करने के बारे में जागरूक किया जाएगा।
नैनो खाद को लेकर जल्दबाजी और सही जानकारी की कमी रही
नैनो खाद के इस्तेमाल को लेकर किसानों की हिचकिचाहट पर एमएल जाट ने कहा कि इसे लागू करने में जल्दबाजी हुई थी। उनके मुताबिक, नैनो खाद को लेकर लोगों तक सही जानकारी पहुंचाने में भी कमी रही। खासकर, एक बोतल नैनो यूरिया की तुलना यूरिया की एक पूरी बोरी से करने वाले संदेश ने भ्रम पैदा किया।
गौरतलब है कि 2021 में इफको (IFFCO) ने नैनो यूरिया लॉन्च किया था। उस समय दावा किया गया था कि 500 मिलीलीटर नैनो यूरिया की एक बोतल, 45 किलो की सामान्य यूरिया की एक बोरी की जगह इस्तेमाल की जा सकती है। जाट ने कहा कि नैनो खाद में संभावनाएं हैं, लेकिन इसका इस्तेमाल सही तरीके और सही जरूरत के हिसाब से होना चाहिए।
उन्होंने बताया कि ICAR ने पिछले साल देश के 15 स्थानों पर नैनो खाद को लेकर व्यवस्थित रिसर्च शुरू की थी। इसका मकसद इसके असर को लेकर ठोस वैज्ञानिक सबूत जुटाना है।
100 से ज्यादा जिलों में जरूरत से ज्यादा खाद का इस्तेमाल
एमएल जाट ने बताया कि देश के 100 से ज्यादा ऐसे जिलों की पहचान की गई है, जहां किसान फसल की जरूरत से दोगुने से भी ज्यादा खाद का इस्तेमाल कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि खाद का इस्तेमाल कम करने और सही मात्रा में पोषक तत्व देने के तरीकों पर ध्यान देने की जरूरत है।
उनके मुताबिक, खाद के इस्तेमाल को लेकर ICAR किसानों को सलाह देता रहा है, लेकिन इन सलाहों को खेतों तक पहुंचाने और उन पर अमल कराने के लिए एक मजबूत व्यवस्था बनाना जरूरी है।
देसी संसाधनों से खाद की जरूरत पूरी करने पर जोर
जाट ने कहा कि भारत में पोटाश जैसे पोषक तत्वों के लिए ग्लॉकोनाइट जैसे खनिजों और गोबर से जुड़े संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल करने की संभावनाएं हैं। इनसे फसलों को पोषक तत्व देने और रासायनिक खाद पर निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है।
उन्होंने कहा कि भारत अपनी रासायनिक खाद की जरूरत का करीब एक-तिहाई हिस्सा जैविक संसाधनों से पूरा कर सकता है। बाकी जरूरत को भी खाद के संतुलित इस्तेमाल और दूसरे विकल्पों के जरिए कम किया जा सकता है। इसके लिए किसानों को प्रोत्साहन देने और उचित नीति बनाने की जरूरत है।
जाट ने यह भी कहा कि जैविक सूक्ष्मजीवों और अन्य जैविक संसाधनों की क्षमता का अभी पूरी तरह इस्तेमाल नहीं हो पाया है। भारत में इनकी काफी विविधता है, जिसका फायदा खेती में उठाया जा सकता है।
खाद नीति में बदलाव की जरूरत
एमएल जाट के मुताबिक, अब खाद नीति में दो बड़े बदलावों पर ध्यान दिया जा रहा है। पहला, केवल सब्सिडी देने के बजाय खाद का सही और प्रभावी इस्तेमाल बढ़ाना। दूसरा, आयात पर निर्भरता घटाकर देश में उपलब्ध संसाधनों से फसलों को पोषक तत्व देने के विकल्प तलाशना।
उन्होंने बताया कि ICAR अब फसल की ऐसी किस्में विकसित करने पर भी ध्यान दे रहा है, जो पोषक तत्वों का बेहतर इस्तेमाल कर सकें। पहले फसल अनुसंधान में मुख्य जोर पैदावार बढ़ाने पर था, लेकिन अब खाद के पोषक तत्वों का अधिक कुशल इस्तेमाल भी अहम लक्ष्य बन रहा है।





