भारत में बागवानी की अपनी अलग पहचान है। देश के अलग-अलग हिस्सों की जलवायु और मिट्टी के हिसाब से यहां कई तरह के फल, सब्जियां, मसाले और दूसरी बागवानी फसलें उगाई जाती हैं। कश्मीर और हिमाचल के सेब-अखरोट, उत्तर प्रदेश के आम, महाराष्ट्र के संतरे, बिहार की लीची और दक्षिण भारत के नारियल-मसाले इसकी विविधता को दिखाते हैं। अब बदलती जलवायु और खेती की बढ़ती चुनौतियों के बीच बागवानी को आगे बढ़ाने के लिए पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक विज्ञान और तकनीक से जोड़ने पर जोर दिया जा रहा है।
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के महानिदेशक डॉ. एम. एल. जाट ने भारतीय बागवानी की इसी ताकत का जिक्र करते हुए कहा है कि किसानों के पीढ़ियों पुराने अनुभव को वैज्ञानिक अनुसंधान और नई तकनीक के साथ जोड़ना जरूरी है। उनके मुताबिक, बागवानी केवल उत्पादन बढ़ाने का जरिया नहीं है, बल्कि यह प्रकृति, स्थानीय जलवायु और संसाधनों के साथ तालमेल की लंबी परंपरा से भी जुड़ी है।
बदलती जलवायु में देसी ज्ञान आएगा काम
किसानों के पास स्थानीय मिट्टी, मौसम और पौधों को लेकर लंबे समय से अनुभव मौजूद है। बदलते मौसम और जलवायु से जुड़ी चुनौतियों के बीच इस ज्ञान का महत्व और बढ़ गया है। ऐसे में जरूरत है कि इस पारंपरिक जानकारी को वैज्ञानिक शोध के साथ जोड़ा जाए।
ICAR और उसके संस्थान ऐसी किस्मों और पौध सामग्री पर काम कर रहे हैं, जो बदलती जलवायु में भी बेहतर उत्पादन दे सकें। इसके साथ फल और सब्जियों की तुड़ाई के बाद होने वाले नुकसान को कम करने के लिए पोस्ट-हार्वेस्ट मैनेजमेंट तकनीकों पर भी जोर दिया जा रहा है।
देसी किस्मों को बचाना भी जरूरी
बागवानी की पुरानी और देसी किस्मों को संरक्षित करना भी इस दिशा में अहम है। इनके जर्मप्लाज्म को सुरक्षित रखने से देश की जैव विविधता और महत्वपूर्ण आनुवंशिक संसाधनों को भविष्य के लिए बचाया जा सकता है।
तकनीक का फायदा तभी, जब खेत तक पहुंचे
डॉ. जाट ने कहा कि कृषि अनुसंधान का असली फायदा तभी है, जब लैब में विकसित तकनीक किसानों के खेत तक पहुंचे। ऐसी तकनीकों पर जोर देने की जरूरत है, जो पानी की बचत करें, लागत घटाएं और उत्पादन व गुणवत्ता बेहतर करने में मदद करें।
इसके लिए आधुनिक सिंचाई तकनीक, डिजिटल कृषि सेवाएं और मौसम के हिसाब से बागवानी के तरीके किसानों के लिए उपयोगी हो सकते हैं।
प्रोसेसिंग से बढ़ सकती है किसानों की कमाई
बागवानी उत्पादों में ग्रेडिंग, पैकेजिंग, प्रोसेसिंग और मार्केटिंग को बढ़ावा देने पर भी जोर दिया जा रहा है। किसान अगर फल-सब्जियों को सीधे कच्चे उत्पाद के रूप में बेचने के बजाय वैल्यू एडिशन से जोड़ते हैं, तो उन्हें बेहतर कीमत मिलने के अवसर बढ़ सकते हैं। इससे उपज की बर्बादी कम होने के साथ ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के नए अवसर भी बन सकते हैं।
बागवानी से रोजगार और आत्मनिर्भरता को बढ़ावा
डॉ. जाट के मुताबिक, बागवानी पोषण सुरक्षा, ग्रामीण रोजगार और किसानों की आय बढ़ाने में अहम भूमिका निभा सकती है। युवाओं और महिलाओं के लिए भी इस क्षेत्र में नए अवसर पैदा किए जा सकते हैं।
ऐसे में पारंपरिक ज्ञान, वैज्ञानिक अनुसंधान और आधुनिक तकनीक को साथ लेकर चलना भारतीय बागवानी को नई दिशा दे सकता है।
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