भारत में गेहूं सिर्फ एक फसल नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों के भोजन और लाखों किसानों की कमाई का अहम आधार है। देश के कई राज्यों में रबी सीजन के दौरान बड़े पैमाने पर गेहूं की खेती होती है। ऐसे में बदलते मौसम, तापमान में उतार-चढ़ाव और जलवायु परिवर्तन के बीच ऐसी किस्मों की जरूरत बढ़ रही है, जो मुश्किल मौसम में भी अच्छी और स्थिर पैदावार दे सकें। इसी जरूरत को ध्यान में रखते हुए ICAR-Indian Agricultural Research Institute (IARI), नई दिल्ली ने गेहूं की नई किस्म NICRA Pusa Wheat 3471 (HD 3471) विकसित की है।
मौसम की चुनौती को ध्यान में रखकर तैयार हुई किस्म
Pusa Wheat 3471 को बदलती जलवायु परिस्थितियों में गेहूं की पैदावार को स्थिर रखने के उद्देश्य से विकसित किया गया है। यह HD 3086 का बेहतर संस्करण है। इसे Marker-Assisted Backcross Breeding (MABB) तकनीक की मदद से तैयार किया गया है।
इस किस्म को इस तरह विकसित किया गया है कि बदलती जलवायु परिस्थितियों के बीच भी गेहूं की खेती में उत्पादन को बनाए रखने में मदद मिल सके।
समय पर बुवाई और सिंचाई वाले खेतों के लिए
ICAR के मुताबिक, HD 3471 को समय पर बोई जाने वाली और सिंचाई वाली गेहूं की खेती के लिए सुझाया गया है। यह किस्म खास तौर पर उत्तर-पश्चिमी मैदानी क्षेत्र (North Western Plains Zone-NWPZ) के लिए अनुशंसित है।
इस क्षेत्र में पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, राजस्थान के कुछ हिस्से और आसपास के इलाके गेहूं उत्पादन के प्रमुख क्षेत्र हैं।
HD 3086 का बेहतर संस्करण
Pusa Wheat 3471 को पहले से प्रचलित HD 3086 के बेहतर संस्करण के तौर पर विकसित किया गया है। इसके विकास में आधुनिक प्रजनन तकनीक का इस्तेमाल किया गया है, ताकि बदलते मौसम के बीच गेहूं की उत्पादकता को बेहतर तरीके से बनाए रखा जा सके।
किसानों के लिए इसका महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि गेहूं की फसल का उत्पादन मौसम पर काफी निर्भर करता है। तापमान में अचानक बढ़ोतरी या मौसम में बदलाव फसल की पैदावार पर असर डाल सकता है।
किसानों के लिए क्यों अहम है यह किस्म?
भारत में गेहूं की खेती बड़े पैमाने पर होती है और यह देश की खाद्य सुरक्षा के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण फसल है। ऐसे में जलवायु परिवर्तन के दौर में ऐसी किस्मों का विकास जरूरी है, जो मौसम की चुनौतियों के बीच भी बेहतर प्रदर्शन कर सकें।
NICRA Pusa Wheat 3471 इसी दिशा में विकसित की गई किस्म है। यह खासतौर पर उन किसानों के लिए उपयोगी हो सकती है, जो उत्तर-पश्चिमी मैदानी क्षेत्र में समय पर गेहूं की बुवाई और सिंचाई की सुविधा के साथ खेती करते हैं।
हालांकि, किसानों को किसी भी नई किस्म की बुवाई से पहले अपने क्षेत्र के लिए इसकी आधिकारिक सिफारिश, उपलब्धता और कृषि विभाग/कृषि वैज्ञानिकों की सलाह जरूर देखनी चाहिए।





