भारत में भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं है, बल्कि यह हमारी सोच, अनुभव और ज्ञान को समाज से जोड़ने की ताकत भी है। कृषि के क्षेत्र में इसका महत्व और बढ़ जाता है, क्योंकि मौसम, मिट्टी, बीज, जल, कीट-रोग, जैविक खेती, ड्रोन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और जलवायु-अनुकूल खेती जैसी तकनीकों की जानकारी तभी किसानों तक सही मायने में पहुंच सकती है, जब वह उनकी समझ और भाषा में हो।
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) की भी यही कोशिश है कि कृषि अनुसंधान से मिलने वाला ज्ञान किसानों तक आसानी से पहुंचे। इसके लिए ICAR का विशाल विस्तार तंत्र काम कर रहा है। कृषि विज्ञान केंद्रों के जरिए किसानों, ग्रामीण युवाओं और कृषि से जुड़े लोगों को प्रशिक्षण, प्रदर्शन, परामर्श और नई तकनीकों की जानकारी दी जाती है। डिजिटल माध्यमों ने इस संपर्क को और मजबूत किया है। किसान सारथी जैसे प्लेटफॉर्म के जरिए कृषि संबंधी सलाह किसानों तक उनकी जरूरत के अनुसार पहुंचाई जा रही है।
किसान की भाषा में विज्ञान की जरूरत
कृषि उत्पादकता और किसान की आय से विज्ञान का सीधा संबंध है। किसान के लिए वैज्ञानिक सलाह तभी उपयोगी होती है, जब वह सही समय पर और आसानी से समझ आने वाली भाषा में मिले। स्थानीय भाषा के माध्यम से कृषि तकनीक को किसानों तक पहुंचाना इसलिए जरूरी है, क्योंकि इससे वैज्ञानिक ज्ञान केवल संस्थानों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि खेत तक पहुंचता है।
हिंदी दिवस के मौके पर भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के सचिव एवं महानिदेशक डॉ. एम.एल. जाट ने भी कृषि विज्ञान को किसानों की भाषा में पहुंचाने की जरूरत पर जोर दिया। उनका कहना है कि कृषि विज्ञान केंद्रों के माध्यम से किसानों को नई तकनीकों और वैज्ञानिक जानकारी से जोड़ा जा रहा है, लेकिन इस प्रक्रिया में भाषा की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है।
हिंदी में कृषि ज्ञान को बढ़ाने की जरूरत
हिंदी दिवस पर अपने संदेश में डॉ. एम.एल. जाट ने कहा कि विज्ञान की शक्ति तभी पूरी होती है, जब उसकी भाषा समाज की भाषा बनती है। किसान अगर अपनी भाषा में विज्ञान को समझेगा, युवा अपनी भाषा में नई तकनीक सीखेगा और विद्यार्थी अपनी भाषा में सवाल पूछने का साहस करेगा, तभी कृषि ज्ञान-आधारित, आत्मनिर्भर और भविष्य-सक्षम बन सकेगी।
उन्होंने कहा कि केवल अंग्रेजी से हिंदी या दूसरी भारतीय भाषाओं में अनुवाद कर देना पर्याप्त नहीं है। वैज्ञानिक जानकारी को ऐसी भाषा में उपलब्ध कराना जरूरी है, जिसे किसान आसानी से समझ सके और अपने खेत में इस्तेमाल कर सके।
इसी दिशा में ICAR वैज्ञानिक ज्ञान को हिंदी सहित भारतीय भाषाओं में उपलब्ध कराने पर लगातार जोर दे रहा है। कृषि से जुड़ी हिंदी पत्रिकाओं और प्रकाशनों के जरिए खेती, बागवानी और कृषि तकनीक से जुड़ी जानकारी किसानों और कृषि में रुचि रखने वाले पाठकों तक पहुंचाई जा रही है।
डिजिटल माध्यम बन रहे बड़ा जरिया
आज कृषि जानकारी सिर्फ किताबों और पत्रिकाओं तक सीमित नहीं है। किसान, विद्यार्थी, शोधार्थी और युवा डिजिटल माध्यमों के जरिए भी वैज्ञानिक जानकारी हासिल कर रहे हैं। ICAR की वेबसाइट के आंकड़ों के मुताबिक, एक वर्ष में 4,613 पृष्ठ अपडेट किए गए और 41.89 लाख से अधिक पेज-व्यू दर्ज हुए। यह बताता है कि कृषि से जुड़ी वैज्ञानिक जानकारी की मांग तेजी से डिजिटल माध्यमों पर भी बढ़ रही है।
डिजिटल कृषि के क्षेत्र में यह एक बड़ा अवसर है। अगर वैज्ञानिक जानकारी किसान की अपनी भाषा में उपलब्ध हो, तो इसका इस्तेमाल और प्रभाव दोनों बढ़ सकते हैं।
कृषि शिक्षा में भी जरूरी है स्थानीय भाषा
हिंदी दिवस का एक महत्वपूर्ण पहलू कृषि शिक्षा से भी जुड़ा है। आज के कृषि विद्यार्थी ही आने वाले समय में वैज्ञानिक, कृषि उद्यमी, शिक्षक, नीति-निर्माता और कृषि-तकनीकी क्षेत्र के नेतृत्वकर्ता बनेंगे। ऐसे में कृषि शिक्षा में भारतीय भाषाओं का इस्तेमाल उन्हें किसानों और स्थानीय परिस्थितियों से बेहतर तरीके से जोड़ सकता है।
अगर भारत की अगली पीढ़ी की कृषि को केवल पारंपरिक आजीविका के रूप में नहीं, बल्कि विज्ञान, नवाचार और उद्यमिता के क्षेत्र के रूप में देखना है, तो किसानों और वैज्ञानिकों के बीच भाषा की दूरी कम करनी होगी।
ICAR की Handbook of Agriculture इसका एक उदाहरण है। कृषि विज्ञान से जुड़े विद्यार्थियों, शोधार्थियों, वैज्ञानिकों और नीति-निर्माताओं के लिए यह एक महत्वपूर्ण संदर्भ ग्रंथ है और इसकी लगभग दो लाख प्रतियां बिक चुकी हैं।
किसान तक ज्ञान पहुंचाना ही असली लक्ष्य
कृषि में वैज्ञानिक शोध तभी सार्थक है, जब उसका फायदा खेत तक पहुंचे। इसके लिए जरूरी है कि वैज्ञानिक, शोधकर्ता और किसान एक-दूसरे से ऐसी भाषा में संवाद करें, जिसे दोनों आसानी से समझ सकें।
इसलिए आने वाले समय में कृषि ज्ञान को अधिक डिजिटल, बहुभाषी और किसान-केंद्रित बनाने की जरूरत है। जब विज्ञान किसान की भाषा में बोलेगा, तभी उसका असली लाभ खेत और किसान तक पहुंचेगा।





