काजू का नाम आते ही सबसे पहले हमारे दिमाग में काजू की गिरी आती है, लेकिन काजू का पेड़ इससे कहीं ज्यादा खास है। काजू की गिरी के साथ-साथ इसके Cashew Apple का भी इस्तेमाल कई तरह के products बनाने में किया जा सकता है। यही वजह है कि काजू सिर्फ खाने की चीज नहीं, बल्कि processing और value addition के लिहाज से भी एक अहम फसल है।
काजू की खास बात यह है कि जिस हिस्से को हम काजू का फल समझते हैं, वह असल में Cashew Apple होता है, जबकि इसके नीचे लगा बीज ही काजू की गिरी होती है। Cashew Apple को आमतौर पर ज्यादा इस्तेमाल नहीं किया जाता, लेकिन processing के जरिए इससे कई तरह के products तैयार किए जा सकते हैं। ICAR के मुताबिक, इससे herbal tea, liquid sweetener, cider, cookies और pomace powder जैसे products बनाए जा सकते हैं। यानी काजू की खेती में सिर्फ गिरी ही नहीं, बल्कि Cashew Apple से भी value addition और कमाई की संभावना है।
भारत में काजू की खेती मुख्य रूप से तटीय और गर्म जलवायु वाले इलाकों में होती है। आंध्र प्रदेश, ओडिशा, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र, गोवा, कर्नाटक और केरल जैसे राज्यों में इसकी खेती बड़े पैमाने पर की जाती है। काजू की गिरी में करीब 21% protein, 47% fat और 22% carbohydrates पाए जाते हैं। इसके अलावा इसमें phosphorus, calcium और iron जैसे पोषक तत्व भी होते हैं।
काजू की खेती में अब पारंपरिक तरीके के साथ नई तकनीकों पर भी जोर दिया जा रहा है। High Density और Ultra Density Planting जैसी तकनीकों के जरिए कम जमीन में ज्यादा पौधे लगाकर productivity बढ़ाने की कोशिश की जा रही है। ICAR-Directorate of Cashew Research, Puttur काजू की खेती और processing से जुड़ी तकनीकों पर लगातार काम कर रहा है।
काजू को लेकर एक दिलचस्प बात यह भी है कि साल 2022 में ICAR-Directorate of Cashew Research, Puttur के वैज्ञानिकों ने पहली बार काजू के genome का sequence तैयार किया था। इससे काजू की अलग-अलग किस्मों, उनके गुणों और बेहतर varieties विकसित करने से जुड़े शोध में मदद मिल सकती है।
काजू की खेती कैसे होती है और इससे किसान कैसे कमाई कर सकते हैं, यह समझने के लिए आप यह वीडियो देख सकते हैं-





