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धान-गेहूं छोड़ किन्नू की खेती की ओर बढ़ रहे किसान, जानिए क्यों

उत्तर भारत में कई किसान अब धान-गेहूं की जगह किन्नू की खेती अपना रहे हैं, क्योंकि इसमें कम पानी की जरूरत होती है और बेहतर मुनाफा मिलता है। हरियाणा के सिरसा के किसान रोहित विश्नोई किन्नू के साथ तरबूज की सहफसली, ग्रेडिंग, वैक्सिंग और सही मार्केटिंग के जरिए अपनी आय बढ़ा रहे हैं।

Pooja Rai

Pooja Rai·06 Aug 2026

हरियाणा के सिरसा के किसान रोहित विश्नोई किन्नू के साथ तरबूज की सहफसली, ग्रेडिंग, वैक्सिंग और सही मार्केटिंग के जरिए अपनी आय बढ़ा रहे हैं।

हरियाणा के सिरसा के किसान रोहित विश्नोई किन्नू के साथ तरबूज की सहफसली, ग्रेडिंग, वैक्सिंग और सही मार्केटिंग के जरिए अपनी आय बढ़ा रहे हैं।

सिरसा(हरियाणा)। उत्तर भारत के कई किसान अब पारंपरिक धान-गेहूं की खेती के बजाय बागवानी की ओर रुख कर रहे हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह है बेहतर मुनाफा, कम पानी की जरूरत और बाजार में बढ़ती मांग। इन्हीं फसलों में किन्नू भी किसानों के लिए कमाई का अच्छा विकल्प बनकर उभरा है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, देश में करीब 4.73 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में किन्नू की खेती हो रही है, जिसमें सबसे बड़ा हिस्सा पंजाब और हरियाणा का है।

विशेषज्ञों के अनुसार, किन्नू की खेती स्थानीय जलवायु के अनुकूल है और धान की तुलना में कम पानी में भी अच्छी पैदावार देती है। यही कारण है कि पंजाब और हरियाणा के कई किसान अब पारंपरिक फसलों से हटकर किन्नू के बाग लगाने लगे हैं।

किन्नू की खेती को बढ़ावा देने के लिए केंद्र सरकार ने भी सहायता बढ़ाई है। मिशन फॉर इंटीग्रेटेड डेवलपमेंट ऑफ हॉर्टिकल्चर (MIDH) के तहत अब संतरा और किन्नू के बाग लगाने के लिए किसानों को पहले से अधिक वित्तीय सहायता मिलेगी। नए दिशा-निर्देशों के अनुसार सामान्य दूरी (Regular Spacing) पर बाग लगाने के लिए 1.25 लाख रुपये प्रति हेक्टेयर, हाई डेंसिटी बाग के लिए 2 लाख रुपये प्रति हेक्टेयर और अल्ट्रा हाई डेंसिटी बाग के लिए 3 लाख रुपये प्रति हेक्टेयर की लागत मान्य की गई है। इस पर सामान्य राज्यों में 40% और पूर्वोत्तर व पहाड़ी राज्यों में 50% तक सब्सिडी दी जाएगी। पहले हाई डेंसिटी बाग के लिए यह लागत 1 से 1.5 लाख रुपये प्रति हेक्टेयर तक ही निर्धारित थी।

हरियाणा के सिरसा जिले के किसान रोहित विश्नोई भी ऐसे ही किसानों में शामिल हैं। उन्होंने किन्नू के बाग में तरबूज की सहफसली (Intercropping) अपनाई है। उनका कहना है कि इससे बाग पूरी तरह तैयार होने से पहले भी खेत से अतिरिक्त आय मिलने लगती है और खेती अधिक लाभदायक बन जाती है।

रोहित विश्नोई के अनुसार, किन्नू की अच्छी पैदावार के लिए उपयुक्त जलवायु, सही सिंचाई और पौधों की देखभाल बेहद जरूरी है। उनका मानना है कि जहां संभव हो, नहर के पानी से सिंचाई करना फायदेमंद रहता है, क्योंकि इससे फलों की गुणवत्ता बेहतर रहती है।

वे बताते हैं कि केवल अच्छी फसल उगा लेना ही काफी नहीं है। बाजार में बेहतर दाम पाने के लिए ग्रेडिंग और वैक्सिंग भी बेहद महत्वपूर्ण है। इससे फलों की चमक, गुणवत्ता और शेल्फ लाइफ बढ़ती है, जिससे व्यापारी और बड़े खरीदार बेहतर कीमत देने को तैयार रहते हैं।

रोहित का कहना है कि खेती में कमाई बढ़ाने के लिए मार्केटिंग पर ध्यान देना भी उतना ही जरूरी है, जितना उत्पादन पर। यदि किसान अपनी उपज की सही ग्रेडिंग, पैकिंग और मार्केटिंग करें, तो किन्नू की खेती से अच्छी आय हासिल की जा सकती है।

किन्नू की खेती, सहफसली मॉडल, सिंचाई, ग्रेडिंग, वैक्सिंग और बेहतर मार्केटिंग से जुड़ी पूरी जानकारी आप इस वीडियो में विस्तार से देख और समझ सकते हैं।

वीडियो देखिए-

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