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Economic Survey: कृषि क्षेत्र की आर्थिक सेहत कैसी है?

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने आज संसद में आर्थिक सर्वेक्षण पेश किया। आर्थिक सर्वेक्षण के मुताबिक सरकारी पूंजीगत व्यय (Capex), निर्यात वृद्धि और घरेलू खपत में सुधार की वजह से वित्‍तीय वर्ष 2024-25 मे

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Jalish· Correspondent

31 जनवरी 2025· 3 min read

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Economic Survey: कृषि क्षेत्र की आर्थिक सेहत कैसी है?

Economic Survey: कृषि क्षेत्र की आर्थिक सेहत कैसी है?

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने आज संसद में आर्थिक सर्वेक्षण पेश किया। आर्थिक सर्वेक्षण के मुताबिक सरकारी पूंजीगत व्यय (Capex), निर्यात वृद्धि और घरेलू खपत में सुधार की वजह से वित्‍तीय वर्ष 2024-25 में भारत की वास्तविक जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) 6.4% की दर से बढ़ने का अनुमान है। खरीफ फसल की अच्छी पैदावार और सरकार की ग्रामीण विकास योजनाओं के कारण कृषि क्षेत्र में 3.8% वृद्धि होने का अनुमान सर्वे में लगाया गया है। जबकि सर्वेक्षण के मुताबिक उद्योग क्षेत्र में 6.2% की वृद्धि के साथ निर्माण और विनिर्माण क्षेत्र में सुधार दिखेगा।

सर्वेक्षण में दावा किया गया है कि, पिछले एक दशक में कृषि आय सालाना 5.23% की दर से बढ़ी है। इस दौरान गैर-कृषि आय में हर साल 6.24 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है। सर्वेक्षण में इस बात पर जोर दिया गया है कि, कृषि क्षेत्र में उत्पादकता बढ़ाने और अर्थव्यवस्था में सरकारी हस्तक्षेप कम करने की जरूरत है। इसमें कहा गया है कि भारत दुनिया का प्रमुख अनाज उत्पादक देश है और विश्व उत्पादन में 11.6 प्रतिशत योगदान करता है, लेकिन फसलों की उत्पादकता अनेक देशों की तुलना में बहुत कम है। साल 2012-13 से 2021-22 के दौरान फसल क्षेत्र में सालाना 2.1 प्रतिशत की ही वृद्धि हुई है। वह भी मुख्य रूप से फल, सब्जियों और दालों के कारण। खाद्य तेलों में आयात पर निर्भरता होने के बावजूद इसकी वृद्धि दर सिर्फ 1.9 प्रतिशत है जो चिंता की बात है।

सर्वेक्षण में कहा गया है कि, बागवानी, मवेशी और मछली पालन जैसे हाई वैल्यू सेक्टर में ज्यादा ग्रोथ रही है। वर्ष 2014-15 से 2022-23 के दौरान (मौजूदा मूल्यों पर) फिशरीज में सालाना औसतन 13.67 प्रतिशत और मवेशी क्षेत्र में 12.99 प्रतिशत की दर से बढ़ोतरी हुई है।

कृषि क्षेत्र

सर्वेक्षण के अनुसार मौजूदा वित्त वर्ष की पहली छमाही में कृषि क्षेत्र की वृद्धि स्थिर रही। दूसरी तिमाही में 3.5 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई, जो पिछले चार तिमाहियों से अधिक थी। अच्छे खरीफ उत्पादन, सामान्य से अधिक मानसून और पर्याप्त जलाशय स्तर से इस सेक्टर को मदद मिली। पहले अग्रिम अनुमान के मुताबिक इस साल कुल खरीफ खाद्यान्न उत्पादन 1647.05 लाख मीट्रिक टन होने का अनुमान है, जो 2023-24 की तुलना में 5.7 प्रतिशत और पिछले पांच सालों के औसत खाद्यान्न उत्पादन की तुलना में 8.2 प्रतिशत अधिक है। ये वृद्धि मुख्य रूप से चावल, मक्का, मोटे अनाज और तिलहन के उत्पादन में वृद्धि की वजह से हुई है।

सर्वेक्षण में बताया गया है कि 2011-12 से 2020-21 के बीच अलग-अलग राज्यों में फसलों में विविधता भी देखी गई। आंध्र प्रदेश कृषि और संबंधित क्षेत्र (वानिकी और लकड़ी कटाई को छोड़कर) में 8.8 प्रतिशत सालाना की वृद्धि के साथ सबसे आगे रहा। मध्य प्रदेश 6.3 फीसदी की वृद्धि दर के साथ दूसरे और तमिलनाडु 4.8 प्रतिशत के साथ तीसरे स्थान पर रहा। इन राज्यों ने उन फसलों की ओर विविधीकरण किया जिनमें उत्पादकता अधिक है। उदाहरण के लिए आंध्र प्रदेश ने ज्वार, मध्य प्रदेश ने मूंग और तमिलनाडु ने मक्का की ओर विविधीकरण किया। इसके बावजूद वैश्विक औसत की तुलना में उत्पादकता बढ़ाने और उपज के अंतर को कम करने की काफी संभावनाएं मौजूद हैं। भविष्य को देखते हुए यह समझना महत्वपूर्ण है कि लोगों की बढ़ती आय के कारण खान-पान की प्राथमिकताएं बदल रही हैं। ये कृषि क्षेत्र के विकास प्रभावित करेंगी। बागवानी उत्पादों के साथ पशुधन और फिशरीज प्रोडक्ट की खपत बढ़ेगी। इनके उच्च मूल्य वाले उत्पाद नष्ट भी जल्दी होते हैं। इसलिए मजबूत फसल प्रबंधन और मार्केटिंग इन्फ्रास्ट्रक्चर की आवश्यक होगी। इस प्रयास में किसान उत्पादक संगठन (FPOs), सहकारी समितियों और स्वयं सहायता समूहों (SHGs) की सक्रिय भागीदारी महत्वपूर्ण

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